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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
तब तो शायद मृत्यु भी काली होने के कारण कुत्सित नहीं है; एक दिन जब वह मुझे दर्शन देने आवेगी तब शायद उसके इस प्रकार के, कभी समाप्त न होने वाले, सुन्दर रूप से मेरी दोनों आँखें जुड़ा जाँयगी। और वह अगर दर्शन देने का दिन आज ही आ गया हो, तो है सुन्दर मेरे काले! ओ मेरी समीपस्थ पदध्वनि! हे मेरे सर्व-दु:ख भय-व्यथाहारी अनन्त सुन्दर! तुम अपने अनादि अन्धकार से सर्वांग भरकर मेरी इन दोनों आँखों की दृष्टि में प्रत्यक्ष होओ, मैं तुम्हारे इस अन्धा-अन्धकार से घिरे हुए निर्जग मृत्यु-मन्दिर के द्वार पर, तुम्हें निर्भयता से वरण करके बड़े आनन्द से तुम्हारा अनुकरण करता हूँ। सहसा मेरे मन में आया - तब उसके इस निर्वाक् आह्नान की उपेक्षा करके अत्यन्त ही अन्त:वासी के समान, मैं यहाँ बाहर किसलिए बैठा हूँ? एक दफा भीतर बीच में क्यों न जा बैठूँ!
नीचे उतरकर मैं श्मशान के ठीक बीचों-बीच बिल्कु्ल जमकर बैठ गया। कितनी देर तक इस तरह स्थिर बैठा रहा, इसका मुझे उस समय होश नहीं था। होश आने पर देखा कि उतना अन्धकार अब नहीं रहा है - आकाश का एक प्रान्त मानो स्वच्छ हो गया है; और उसके पास ही शुक्र तारा चमक रहा है। कुछ दबी हुई-सी बातचीत का कोलाहल मेरे कानों में पहुँचा। अच्छी तरह निरीक्षण करके देखा, कि दूर पर सेमर के वृक्ष की आड़ में, बाँध के ऊपर से होकर कुछ लोग चले आ रहे हैं; और उनकी दो-चार लालटेनों का प्रकाश भी आसपास इधर-उधर हिल-डुल रहा है। फिर से, बाँध के ऊपर चढ़कर, उस प्रकाश में ही मैंने देखा कि दो बैलगाड़ियों के आगे-पीछे कुछ लोग इसी ओर बढ़े आ रहे हैं। समझ पड़ा कि कुछ लोग इस रास्ते होकर स्टेशन की ओर जा रहे हैं।
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