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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


उसने खिड़की खोली और जितनी भी दूर तक निगाह जा सकती थी अंधेरे में अपनी अपलक आंखों से टकटकी लगाए देखती रही। इसी तरह काफी देर बीत गई।

सहसा भीषण कड़कड़ाहट के साथ ही शायद कहीं पास ही बिजली गिरी और उसकी ही चमचमाती हुई विद्युत शिखा में केवल पलभर के लिए आकाश और धरातल को उद्भासित करके एक बार डॉक्टर के अंतिम दर्शन करा दिए।

इस भयानक समय में मकान से बाहर निकलकर इन लोगों की गतिविधि पर नजर रखने का पागलपन शायद किसी भी पुलिस कर्मचारी में नहीं था। फिर भी बड़ी सड़क को छोड़कर मैदान के दक्षिणी छोर से घूमकर दोनों धीरे-धीरे चलने लगे। बीच-बीच में झाड़-झंखाड़ और कंटीले पौधों का बना टेढ़ा मार्ग मिलता गया। इस सूची भेद्य अंधकार में कीचड़ भरे पथहीन पथ से एक पथिक भारी बोझ अपने ऊपर लाद लेने के कारण कुछ झुककर सावधानी से बढ़ता चला जा रहा है। और दूसरा-अपनी पगड़ी पर वर्षा के प्रचंड वेग को सहता हुआ यथासम्भव अपने सिर को बचाकर उसका अनुसरण कर रहा है।

पलभर बाद सब लुप्त था। केवल घोर अंधकार ही शेष रह गया।

अचानक एक गहरी सांस लेकर शशि ने कहा, दुर्दिन के मित्र सरदार जी तुम्हें नमस्कार।

उसी समय सहसा अपूर्व ने भी अपने दोनों हाथ उठाकर सरदार को लक्ष्य करके नमस्कार किया। लगा जैसे उसके हृदय का एक बोझ उतर गया हो।

भारती उसी प्रकार पत्थर की मूर्ति के समान अंधेरे में ताकती हुई खड़ी रह गई। शशि की बात भी जैसे उसके कानों में नहीं पहुंची। वैसे ही वह यह भी नहीं समझ सकी कि ठीक उसी की तरह एक नारी की आंखों से भी आंसुओं की धारा प्रवाहित हो रही है।

।। समाप्त ।।

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