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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


सामान थोड़ा-सा ही था। गाड़ी पर रखने में आधा घंटा भी नहीं लगा। रास्ते में भारती ने पूछा, भैया नहीं आए?

अपूर्व बोला, नहीं, छुट्टी नहीं मिली।

यहां की नौकरी छोड़ दी तुमने?

हां, यही समझो।

मां का अंतिम संस्कार सम्पन्न करके क्या घर पर ही रहोगे?

अपूर्व बोला, नहीं। मां अब नहीं है। आवश्यकता से एक दिन भी अधिक मैं उस घर में नहीं रह सकता।

यह सुनकर भारती के मुंह से एक लम्बी सांस निकल गई।

घने जंगलों से घिरे निर्जन, परित्यक्त जीर्ण-शीर्ण जिस मठ में एक दिन अपूर्व के अपराध का निर्णय हुआ था। आज फिर उसी कमरे में पथ के दावेदारों की बैठक बुलाई गई है। उस दिन के बंदीगृह में जो दुर्जेय क्रोध, निर्मम प्रतिहिंसा की आग लपटें फेंकती हुई जली थी आज उसकी नन्हीं-सी चिनगारी भी नहीं है। आज न कोई वादी है न प्रतिवादी है। किसी के विरुद्ध किसी को कोई शिकायत नहीं है। आज तो आशंका और निराशा की दुस्सह वेदना से सारी सभा निष्प्रभ, उदास और मृत:प्राय-सी हो रही है।

भारती की आंखों के कोनों में आंसू की बूंदे हैं। सुमित्रा मुंह झुकाए स्थिर बैठी है। तलवलकर गिरफ्तार हुआ है खून से लथपथ शरीर के लिए वह जेल के अस्पताल में पड़ा है। आज भी उसे अच्छी तरह होश नहीं हुआ है। उसकी पत्नी अपनी बच्ची के साथ रास्ते में इधर-उधर भटकती रही। अनेक दु:ख भोगने के बाद कल शाम को एक महाराज विटूदन ब्राह्मण के घर में उसे शरण मिली है। सुमित्रा ने पता पूछकर उसके मैके आज तार भेज दिया है लेकिन अभी तक कोई उत्तर नहीं आया।

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