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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


सोचते-सोचते सहसा एक नया प्रश्न उसके मन में आ गया। कर्मदोष से जबकि सभी अपूर्व के विरुद्ध हैं, तब भी जिस मनुष्य की सहानुभूति उसे मिलती रही वह है सव्यसाची। लेकिन किसलिए? क्या केवल बहिन के प्रति संवेदना होने के कारण? उनका स्नेह पाने योग्य गुण क्या स्वयं अपूर्व में कुछ नहीं है? सचमुच ही क्या भारती ने इतने क्षुद्र व्यक्ति पर इतना अधिक प्रेम समर्पित कर दिया है? उस दुर्दिन में सावधान कर देने योग्य पूंजी - क्या उसके पास कुछ भी नहीं थी? उनका हृदय इतना कंगाल, ऐसा दिवालिया हो गया था!

इसी तरह एक ही स्थिति में बैठे-बैठे जब दो घंटे बीत गए तब दासी फिर आ गई। उस समय होटल के जरूरी कामों के कारण सभी आलोचनाएं समाप्त करके जाने का अवसर उसे नहीं मिला था। इस समय उसे कुछ छुट्टी मिल गई है। अपूर्व और भारती के बीच एक रहस्यमय मधुर संबंध है, यह बात आभास और चाल-ढाल से सभी जान गए थे। दासी से भी यह बात छिपी नहीं थी। तो अचानक ऐसी कौन-सी घटना हो गई जिससे अपूर्व की इतनी बड़ी विपत्ति के दिनों में इतनी बड़ी बात न मालूम कर लेने तक ज्ञाना को खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए वह किसी बहाने से पहुंच गई। पहले तो अवाक् हो गई, बाद को बोली कुछ भी तो तुमने नहीं छुआ, देख रही हूं।

भारती लज्जित होकर झटपट उठ खड़ी हुई और बोली, नहीं।

दासी से सिर हिलाकर आवाज़ में करुणा पैदा करके कहा, खाया नहीं जाता बहिन जी। मैंने तो सारा कांड अपनी आंखों से देखा है। विश्वास न हो तो चलकर देख लो। मुंह में मैंने एक भी कौर रखा है या नहीं। भात की थाली ज्यों की त्यों पड़ी हुई है।

उस अंवाछित संवेदना से भारती के संकोच की कोई सीमा नहीं रही। ज़ोर लगाकर हंसने की चेष्टा करती हुई बोली, किसी से एक गाड़ी मंगवा दो न दाई।

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