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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


भारती मन-ही-मन बोली - मानव की आवश्यकता के लिए अर्थात भारत की स्वाधीनता की आवश्यकता के लिए नए सत्य की सृष्टि करना ही भारतवासियों के लिए सबसे बड़ा सत्य है। अर्थात इसके सामने कोई भी असत्य नहीं है। कोई भी उपाय या कोई भी अभिसंधि हेय नहीं है। यह जो कारखानों के गंदे कुली-मजदूरों को सत्य मार्ग पर लाने का उद्यम है, यह जो उनकी संतान को विद्या-शिक्षा देने का आयोजन है, उनके लिए यह जो रात्रि पाठशालाएं हैं, इन सबका लक्ष्य कुछ और ही है। इस बात को निस्संकोच स्वीकार कर लेने में सव्यसाची को कोई दुविधा नहीं हुई। लज्जा मालूम नहीं हुई। पराधीन देश की मुक्ति-यात्रा में पथ चुनने की छानबीन कैसी?

एक दिन सव्यसाची ने कहा था, 'पराधीन देश में शासकों और शासितों की नैतिक बुद्धि जब एक हो जाती है तब देश के लिए इससे बढ़कर दुर्भाग्य की और कोई भी बात नहीं होती भारती।' उस दिन इस बात का अर्थ नहीं समझ सकी थी। आज वह मतलब उसके सामने स्पष्ट प्रकट हो गया।

घड़ी में तीन बज गए। इसके बाद वह कब सो गई, पता नहीं, लेकिन उसे यह याद रहा कि नींद के आवेश में उसने बार-बार यह दोहराया था कि भैया, तुम अति मानव हो। तुम्हारे ऊपर मेरी भक्ति, श्रद्धा और स्नेह हमेशा अचल बना रहेगा। लेकिन तुम्हारी इस विचार बुद्धि को मैं किसी तरह भी ग्रहण न कर सकूंगी। भगवान करे, तुम्हारे हाथों से ही देश को मुक्ति मिले। लेकिन अन्याय को कभी न्याय की मूर्ति बनाकर खड़ा मत करना। तुम महान पंडित हो। तुम्हारी बुद्धि की सीमा नहीं है। तर्क में तुमको जीता नहीं जा सकता। तुम सब कुछ कर सकते हो। विदेशियों के हाथ से, पराधीनों के हाथ से, पराधीनों को जितनी लांछना मिलती है, दु:ख के इस सागर में हमारा प्रयोजन कितना है। देश की लड़की होकर क्या मैं यह नहीं जानती भैया? इसलिए अगर आवश्यकता को ही सर्वोच्च स्थान देकर दुर्बल चित्त मनुष्यों के सामने अधर्म को ही धर्म बना डालोगे तो फिर इस दु:ख का तुम्हें कभी अंत ही नहीं मिलेगा।

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