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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


भारती से पहले ही डॉक्टर बोल उठे, “जरूर...चलो क्या है देखूं,” यह कहकर वह उसे अंदर ले गए।

शशि ने अंदर जाते हुए कहा, “और एक सूचना है डॉक्टर, अपूर्व बाबू लौट आए हैं।”

डॉक्टर आश्चर्य से बोले, “यह क्या कहते हो शशि? किससे सुना?”

शशि ने कहा, “कल बंगाल बैंक में अचानक भेंट हो गई थी। उनकी मां बीमार हैं।”

शशि ने बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहा था। कमरे में पहुंचते ही देखा-खाने-पीने की ढेर सारी चीजें रखी थीं। कमरे का दक्षिणी भाग एकदम ठसा-ठस भरा हुआ है।

डॉक्टर का उल्लास सहसा कहकहा बनकर फट पड़ा, “ह:, ह:, ह:, ह:-गृहस्थ का जय-जयकार हो। शशि! कवि! ह: ह: ह: ह:।”

भारती और न सह सकी। मुंह फेरकर सजल आंखों से नाराजगी के साथ देखती हुई बोली, “भैया, क्या तुम्हारे मन में जरा भी दया-माया नहीं? क्या कर रहे हो बताओ तो?”

“वाह! जिनकी कृपा से अच्छी-अच्छी चीजें आज पेट भरकर खाऊंगा उनको थोड़ा-सा आशीर्वाद, वाह, ह: ह: ह: ह:।”

भारती रूठकर बरामदे में चली गई। दो-तीन मिनट बीतने पर शशि जाकर उसे लौटा लाया तो उसने प्लेट में मांस, फल-फूल, पुलाव, मिठाई आदि सजाकर डॉक्टर के सामने रख दिए और बनावटी नाराजगी से बोली, “लो, अब दांत निकालकर राक्षस की तरह खाओ। हंसी तो बंद हो जाए। नहीं तो मुहल्ले वालों की नींद टूट जाएगी।”

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