|
ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
|||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
उसकी आवाज की गम्भीरता अनुभव करके डॉक्टर चुप हो गए। कुछ देर बाद धीरे से बोले, “भारती, तुमको व्यथा पहुंचाना मेरा अभिप्राय नहीं है। उनके राजनीतिक पांडित्य पर भी मेरी भक्ति कम नहीं है। लेकिन बात क्या है? तुम्हें इसकी वास्तविक जानकारी करा देता हूं बहिन। जब कोई गृहस्थ छोटी रस्सी से गाय को बांधता है तो उस छोटी रस्सी में केवल एक ही नीति रहती है। मैं केवल इतना ही जानता हूं। बिल्कुल पहुंच के बाहर रखे गए खाद्य पदार्थ की ओर जी-जान से मुंह बढ़ाकर उसे चाटने या खाने की गाय की चेष्टा में अवैधता कुछ भी नहीं है। वह नितांत वैधानिक और कानून सम्मत है। उत्साह देने योग्य हृदय हो तो दे सकती हो राजा की ओर से मनाही नहीं है। लेकिन गाय या बैल के इस उद्यम को जो लोग बाहर से देखते हैं, उनके लिए हंसी रोक पाना कठिन हो जाता है।”
भारती हंसकार बोली, “तुम बड़े दुष्ट हो भैया। लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि जिसके प्राण रात-दिन पतले धागे में लटक रहें हों वह दूसरों की बात पर हंसी-मजाक कैसे करता है?”
डॉक्टर ने स्वाभाविक स्वर में कहा, “इसका कारण यह है कि इस समस्या पर पहले ही विचार हो चुका है भारती, जिस दिन से मैंने क्रांतिकारी कामों में भाग लिया है। अब मुझे कुछ सोचना भी नहीं है, शिकायत भी नहीं है। मैं जानता हूं कि मुझे हाथ में पाकर भी जो राजशक्ति मुझे छोड़ देती है, वह तो असमर्थ है या फिर उनके पास फांसी देने के लिए रस्सी नहीं है।”
भारती बोली, “इसीलिए तो मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं, भैया। मेरे होते हुए तुम्हारे प्राण ले सके, ऐसी शक्ति संसार में कोई भी नहीं है। यह मैं किसी भी तरह नहीं होने दूंगी।”-कहते-कहते उसकी आवाज भारी हो उठी।
डॉक्टर को इसका पता चल गया। चुपचाप लम्बी सांस लेकर वह बोले, “नाव पर अब ज्वार लग रहा है भारती। अब हमें पहुंचने में देर नहीं होगी।”
भारती बोली, “हटाओ। जाने दो। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा।”
|
|||||











