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ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर चुपचाप नाव चलाने लगे। इतने विनय भरे अनुरोध का उन्होंने उत्तर नहीं दिया।
अंधेरे के कारण भारती उनका चेहरा नहीं देख पाई, लेकिन उनके मौन से उसे आशा बंधी। इस बार उसकी आवाज में स्नेह पूर्ण निवेदन की विविड़ वेदना उभरकर ऊपर तक चली आई। बोली, “ले चलोगे भैया, अपने साथ? तुम्हारे अतिरिक्त इस अंधकार में बूंद भर भी प्रकाश मुझे कहीं नहीं दिखाई पड़ता।”
डॉक्टर बोले, “असम्भव है भारती। तुम्हारी बातों ने आज मुझे जोआ की याद दिला दी। तुम्हारी तरह ही उसका अमूल्य जीवन भी अकारण नष्ट हो गया था। भारत की स्वाधीनता के अतिरिक्त मेरा और कोई भी लक्ष्य नहीं है। जीवन में इससे बढ़कर और कोई कामना नहीं है - ऐसी भूल मुझसे कभी नहीं हुई है। स्वाधीनता का अंत नहीं है। धर्म, शांति, काव्य, आनंद, यह सब और भी है। इनके चरम विकास के लिए ही तो स्वाधीनता चाहिए। नहीं तो उसका मूल्य क्या है? इसके लिए मैं तुम्हारी हत्या नहीं कर सकता बहिन। तुम्हारे अंदर जो हृदय-स्नेह, प्रेम, करुणा और माधुर्य से लबालब भर उठा है कि वह मेरे प्रयोजन को पार करके बहुत ऊंचाई तक चला गया है। हाथ बढ़ाने पर भी मैं वहां तक नहीं पहुंच सकता।”
भारती का सर्वांग पुलकित होकर रोमांचित हो उठा। सव्यसाची के गम्भीर हृदय की एक अनुरूप मूर्ति मानो सहसा उसने देख ली। मुक्ति और आनंद से विगलित होकर बोली, “मैं भी तो यही सोचती रही हूं भैया कि तुम्हारे लिए इस संसार का कौन-सा विषय अज्ञात है और अगर ऐसी बात है तो तुम इस षडयंत्र में लुप्त होकर क्यों पड़े हो? मानव का चरम कल्याण तो इनके द्वारा कभी हो ही नहीं सकता।”
डॉक्टर बोले, “ठीक, यही बात है। लेकिन चरम कल्याण का भार हम विधाता के हाथों में ही छोड़कर क्षुद्र मानव के लिए जो सामान्य कल्याण है उसी को करने की चेष्टा करते हैं। अपने देश में स्वाधीन भाव से बात करने, स्वाधीन भाव से चलने-फिरने के अधिकार का ही हमारा दावा है। हम इससे अधिक और कुछ नहीं चाहते भारती।”
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