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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


आज शशि और नवतारा का विवाह है। शशि की सविनय प्रार्थना थी कि रात को डॉक्टर भारती को साथ लेकर आ जाएं और उन लोगों को आशीर्वाद दे जाएं। भारती काले रेपर से अपने शरीर को ढंके चुपचाप कदम बढ़ाती हुई, घाट के किनारे जा खड़ी हुई। डॉक्टर नाव में उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

नाव में चढ़कर भारती बोली, “क्या-क्या बातें सोचती हुई आ रही थी, कोई ठिकाना नहीं है। मैं जानती थी कि मुझे बताए बिना तुम कभी नहीं जाओगे। फिर भी भय दूर नहीं होता। अभी दिन ही कितने बीते हैं लेकिन ऐसा लगता था जैसे कितने ही युगों से तुम्हें नहीं देखा है। भैया, मैं तुम्हारे साथ चीनियों के देश में चलूंगी। यह मैं बताए देती हूं।”

डॉक्टर ने हंसते हुए कहा, “मैं भी बताए देता हूं कि तुम इस तरह का कोई काम करने की कोशिश कभी न करना।” यह कहकर उन्होंने भाटे के बहाव में नाव छोड़ दी। बोले, 'इतनी दूर तक आराम से चले जाएंगे। लेकिन नदी में पहुंचकर उलटे बहाव को ठेलकर पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी।”

भारती बोली, “हो जाए तो क्या? कौन बड़े शुभ कार्य में भाग लेने जा रहे हो कि समय बीत जाने से हानि होगी। मेरी तो जाने की इच्छा ही नहीं थी। केवल तुम जा रहे हो, इस लिए चल रही हूं। कैसा गंदा काम हो रहा है, बताओ तो।”

पल भर मौन रहकर डॉक्टर ने कहा, “शशि का नवतारा के साथ विवाह बहुत से लोगों के संस्कार में खटक रहा है। शायद यह देश के कानून के भी विरुद्ध है, लेकिन यह दोष शशि का तो है नहीं। कानून और उसे बनाने के लिए जो लोग उत्तरदायी हैं उन्हीं का दोष है। मुझे केवल इतना ही क्षोभ है कि शशि ने किसी अन्य स्त्री को प्यार नहीं किया।”

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