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नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :462
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706
आईएसबीएन :9781613012505

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


धीरे-धीरे एक-एक स्मृति उसके मन में उभरने लगी, और मानो तेजाब से एक-एक गहरी रेखा उसके चेतन-पट पर कोरने लगी...”आर यू रीएल-तुम हो, सचमुच हो, भुवन?...मैं तुम्हारी हूँ, भुवन, मुझे लो... रेखा, आओ...लेट अस गेट अप अर्ली टु द विनयार्डूस : देयर विल आइ गिव दी आफ़ माई लव्ज...महाराज ए कि साजे एले मम हृदयपुर माझे...भुवन, मेरी मोहलत कब तक की है? शुभाशंसा चूमती है भाल तेरा...पगली, पगली, तुम तो चाँदनी में ही जम गयी थी। और तुम? तुम पिघल गये थे?...लव मेड ए जिप्सी आउट आफ मी...लजाती हो - मुझ से-अब? तुम से नहीं तो और किस से लजाऊँगी?...वेट विदाउट होप, फ़ार होप वुड बी होप आफ़ द रांग थिंग...देबे कि गो वासा आमाय देबे कि एकटि धारे?...” एक अद्भुत भाव उसके मन में भर गया, जिसमें वात्सल्य भी था, करुणा भी, एक आतुर उत्कंठा भी और एक बहुत हलकी-सी जुगुप्सा भी। “न, मैं कुछ मागूँगी नहीं, तुम्हारे जीवन की बाधा नहीं बनूँगी, उलझन भी नहीं बनूँगी। सुन्दर से डरो मत...लेकिन भुवन, मुझे अगर तुमने प्यार किया है, तो प्यार करते रहना-मेरी यह कुंठित बुझी हुई आत्मा स्नेह की गरमाई चाहती है कि फिर अपना आकार पा सके, सुन्दर, मुक्त, ऊर्ध्वाकांक्षी...” क्यों नहीं माँगेगी रेखा कुछ भी? यों सब कुछ दे देगी, और फिर चुपचाप चली जाएगी - अपनी सबसे अधिक आवश्यकता के समय मूक? नहीं, इतना बड़ा दान वह नहीं ले सकेगा। उदार होकर देना कठिन है, होगा, पर उदार होकर ले लेना और भी कठिन है...”तुम ने मुझे एक बार भी नहीं बताया कि मेरे लिए तुम्हारे हृदय में क्या भाव हैं...” ठीक कहा था रेखा ने, उसने सचमुच कभी कुछ नहीं बताया, शायद स्वयं ही नहीं सोचा-और बिना एक प्रश्न तक भी पूछे रेखा ने - नहीं, यह एक-पक्षीय व्यापार वह नहीं सह सकेगा - घुट जाएगा इसके बोझ से...ऐसा दान वह नहीं लेगा जो पाने वाले का दम घोट दे, और देने वाले को-देने वाले को भी संकट में डाल दे...।

लेकिन दान वह नहीं लेगा, यह कहने के अब क्या मानी हैं जब वह दान ले चुका है? अब वह क्या करेगा, अब, यही उसे सोचना है, और स्पष्ट सोचना है, परिणाम तक ले जाकर सोचना है...।

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