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नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :462
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706
आईएसबीएन :9781613012505

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


पर रेखा चुप रही। बल्कि उसने आँखें बन्द करके क्षण-भर हथेलियों से चेहरा ढँक लिया। गौरा स्थिर दृष्टि से उसे देखती रही, और इस समय सुविधा पाकर सिर से पैर तक देख गयी। फिर उसकी आँखें रेखा के हाथों पर टिक गयीं।

रेखा के हाथ सुन्दर नहीं कहे जा सकते, पर उसकी उँगलियों में एक संवेदन-क्षमता थी; और उँगलियों के जोड़ स्पष्ट ही एक चिन्तनशील स्वभाव के सूचक थे। छिगुनियों की सिरेवाली पोर थोड़ी-सी भीतर की ओर मुड़ी हुई थी। एक हाथ की अनामिका पर अँगूठी थी-सफेद धातु, चाँदी या प्लेटिनम?-जिसमें एक बड़ा-सा कटहला जड़ा हुआ था, रेखा के साँवले रंग पर वह फबता था। अँगूठी उँगली में ढीली थी, नगीना एक ओर को खिसक गया था। चिन्तनशील उँगलियों की यही मुश्किल होती है-जोड़ बड़े होते हैं, अँगूठी चढ़ाने में दिक्कत होती है और इसलिए ढीली अँगूठी पहननी पड़ती है...।

सहसा रेखा ने हाथ हटा लिए, आँखें खोली, और पूछा, “गौरा जी, हमारे जर्नलिस्ट साहब हम दोनों को मिलाने को बहुत उत्सुक थे। और अब निस्सन्देह आप सोच रही होंगी कि हम लोग जो मिलीं, सो आखिर क्यों?”

गौरा ने अपने को सँभालते हुए कहा, “नहीं, मिलना तो मैं भी चाहती थी”

“और मैं भी चाहती थी। और मिलना हुआ, यह बड़ी खुशी की बात है। पर स्त्रियाँ जो चाहती हैं उसके होने के लिए प्रतीक्षा करती हैं। और-”रेखा रुक गयी, मानो अपने शब्द तौल रही हो, और तय कर रही हो कि बात कही जाये या नहीं, “और यह भी है कि आप मुझसे-आपका मेरे बारे में कौतूहल भुवन जी की मारफ़त ही रहा होगा-हम दोनों के बीच भी कड़ी वही हैं, चन्द्र तो नहीं।”

गौरा चुप रह गयी।

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