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खजाने का रहस्य

कन्हैयालाल

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :56
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9702
आईएसबीएन :9781613013397

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भारत के विभिन्न ध्वंसावशेषों, पहाड़ों व टीलों के गर्भ में अनेकों रहस्यमय खजाने दबे-छिपे पड़े हैं। इसी प्रकार के खजानों के रहस्य

लाला घसीटामल को अपने मित्र की यह बात बहुत बुरी लगी। उसने उसकी मक्कारी में शामिल होना मंजूर न किया। अब तो होटल वाले की जान मुसीबत में। इधर गिरे तो कुआँ और उधर गिरे तो खाई।'

उसने लाला को धमकी दी- 'लाला! मैं तेरी हर मुसीबत में साथ देता आया हूँ, आज तू जरा-सी मुसीबत में काम नहीं आ रहा है। ' लाला भी अकड़ गया- 'मेरी ही बिल्ली, और मुझसे ही म्याऊँ! साला डकैती का माल मेरे यहाँ छुपाने आया है और ऊपर से अकड़ता अलग है। जा-जा भाग जा यहाँ से।'

होटल वाले ने अपनी जेब में हाथ डाला। संयोग से उसमें पिस्तौल न था। फिर भी उसने धमकी दी- 'कमीने, आज की तारीख में ही तेरा खून न किया तो., हाँ....'

'अबे, तू तो शायद खून न भी करे, किन्तु मैं तुझे अभी जहन्नुम- रसीद किए देता हूँ।' उससे यों कहकर लाला ने अपने आदमियों को इशारा किया। उन्होंने होटल-मालिक को पकड़ लिया। लाला ने उसे एक कमरे में बन्द करा दिया।

लाला घसीटामल अपने भाग्य को धिक्कार रहा था। घर बैठे- बिठाये अजीब मुसीबत उसके गले आ लगी थी। होटलवाले के साथ वर्षों पुरानी मैत्री थी, वह तो समाप्त हुई ही, फिर भी पहाड़-सी परेशानी सिर पर सवार थी।

वह सोच ही रहा था कि क्या करे! हत्यारे को अपने यहाँ छिपाना भी अपराध है, इस बात को लाला खूब समझता था। वह बला को अपने सिर से टालने का उपाय सोचने लगा। कोई उपाय समझ में न आया तो उसने लालायन से सलाह-मशविरा किया!

लालायन की बुद्धि लाला से कुछ तेज थी। उसने अपने मस्तिष्क पर जोर डाला तो एक युक्ति उसे सूझ गई। उसने अपने पति के कान के पास मुँह ले जाकर कहा- 'उसे ष्यार से अपने पास विठावो। मैं कुछ देर में कुछ नमकीन और मिठाई लाती हूँ, उनमें नशीली दवा डाल दूँगी। जब मुए को नशा हो जाय तो उसे उसकी गाड़ी में ही लदबा कर होटल भिजवा देना।'

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