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संभोग से समाधि की ओर

ओशो

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :440
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 97
आईएसबीएन :9788171822126

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संभोग से समाधि की ओर...


और प्रेम निष्प्रयोजन है। प्रेम का कोई प्रयोजन नहीं। प्रेम अपने में ही अपना प्रयोजन है, 'वह बिल्कुल पर्पजलेस' है।
वृक्ष तो चौंक गया। उसने कहा तुम तभी आओगे, जब मैं कुछ तुम्हें दे सकूं। मैं तुम्हें सब दे सकता हूं। क्योंकि प्रेम कुछ भी रोकना नहीं चाहता है। जो रोक ले वह प्रेम नहीं है। अहंकार रोकता है। प्रेम तो बेशर्त दे देता है। लेकिन रुपए मेरे पास नहीं हैं। ये रुपए तो सिर्फ आदमी की ईजाद हैं। वृक्षों ने यह बीमारी नही पाली है।
उस वृक्ष ने कहा, इसीलिए तो हम इतने आनंदित होते है-इतने फूल खिलते हैं इतने फल लगते हैं, इतनी बड़ी छाया होती है। हम इतने नाचते हैँ आकाश में, हम इतने गीत गाते हैं। पक्षी उन पर आते हैं और संगीत का कलरव करते हैं; क्योंकि हमारे पास रुपए नहीं हैं। जिस दिन हमारे पास भी रुपए हो जाएंगे तो हम आदमी जैसा दीन-हीन मंदिरों में बैठकर सुनेंगे कि शांति कैसे पाई जाए, प्रेम कैसा पाया जाए। नहीं, नहीं, हमारे पास रुपए नहीं हैं।
तो उसने कहा फिर मैं क्या आऊं तुम्हारे पास। जहां रुपए हैं मुझे वहां जाना पड़ेगा। मुझे रुपयों की जरूरत है।
अहंकार रुपए मांगता है, क्योंकि रुपया शक्ति है। अहंकार शक्ति मांगता है।
उस वृक्ष ने बहुत सोचा, फिर उसे ख्याल आया: ''तो तुम एक काम करो, मेरे सारे फलों को तोड़कर ले जाओ और बेच दो तो शायद रुपए मिल जाएं।''
और उस लड़के को भी ख्याल आया। वह चढ़ा और उसने सारे फल तोड़ डाले। कच्चे भी गिरा डाले। शाखाएं भी टूटी पत्ते भी टूटे, लेकिन वृक्ष बहुत खुश हुआ, बहुत आनंदित हुआ।
टूटकर भी प्रेम आनंदित होता है।

अहंकार पाकर भी आनंदित नहीं होता है, पाकर भी दुःखी होता है। और उस लड़के ने तो धन्यवाद भी नहीं दिया पीछे लौटकर।
लेकिन उस वृक्ष को पता भी नहीं चला। उसे तो धन्यवाद मिल गया इसी में कि उसने उसके प्रेम को स्वीकार किया और उसके फलों को ले गया और बाजार में बेचा।
लेकिन फिर वह बहुत दिनों तक नहीं आया। उसके पास रुपए थे और रुपयों से रुपए पैदा करने की वह कोशिश में लग गया था। वह भूल गया। वर्ष बीत गए।

और वृक्ष उदास है और उसके प्राणों में रस बह रहा है कि वह आए उसका प्रेमी और उसके रस को ले जाए। जैसे किसी मां के स्तन में दूध भरा हो और उसका बेटा खो गया हो और उसके प्राण तड़प रहे हैं कि उसका बेटा कहां है जिसे वह खोजे जो उसे हल्का कर दे, निर्भार कर दे। ऐसे उस वृक्ष के प्राण पीड़ित होने लगे कि वह आए-आए, आए। उसकी सारी आवाज में यही गूंज गूंजने लगी कि आओ।

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