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आचार्य श्रीराम किंकर जी >> देवदास देवदासशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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कालजयी प्रेम कथा
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दो वर्ष हुए पार्वती महेन्द्र का विवाह करके निश्चिन्त हुई है। जलदबाला बुद्धिमती और कार्य-पटु है। अब पार्वती के बदले गृहस्थी का बहुत-कुछ काम-काज वही करती है। पार्वती ने अब अपना मन दूसरी ओर लगाया है। आज पांच वर्ष हुए उसका विवाह हुआ था; किन्तु अभी तक उसके कोई सन्तान नहीं हुई। अपने लडकी-लडके के न रहने के कारण वह दूसरों के लडकी-लड़कों को बहुत प्यार करती है। गरीब-गुरबे की बात को छोड़िये जिनके पास कुछ रुपये पैसे भी हैं, उनके पुत्र-पुत्रियों का भी अधिकांश भार वही वहन करती है। इसके अतिरिक्त ठाकुरबाडी के काम-काज, साधु-सन्यासियों की सेवा, लंगडे-लूलों की शुश्रूषा में अपना सारा दिन बिता देती थी। इसका व्यसन स्वामी को लगाकर पार्वती ने एक और अतिथिशाला भी निर्माण किया है। उसमें निराश्रय और असहाय लोग अपनी इच्छा के अनुकूल रह सकते हैं। जमीदार के घर से उन लोगों को खाना-पीना मिलता है। और एक काम पार्वती बहुत छिपाकर करती है, स्वामी को भी नहीं जानने देती। वह ऊंचे घराने के दरिद्र लोगों को गुप्त रूप से रुपये-पैसे से सहायता देती है। यही उसका निजी खर्च है। स्वामी के पास से प्रति मास जो कुछ उसको मिलता है, सब इसी में खर्च कर देती है। किन्तु चाहे जिस तरह से जो कुछ व्यय होता था वह सदर कचहरी के नायब और गुमाश्ता से नहीं छिपा रहता था। वे लोग आपस में इस विषय पर बक-बक झक-झक किया करते थे। दासियां लुक-छिपकर सुन आती हैं कि गृहस्थी का व्यय आजकल पहले की अपेक्षा दूना हो गया है; तहवील खाली पड़ गई, कुछ भी बचने नहीं पाता। गृहस्थी के बेजा खर्च बढ़ने से दास-दासियों को मर्मान्तक पीड़ा होती है। वे लोग ये सब बातें जलदबाला को सुना आती हैं। एक दिन रात में उसने स्वामी से कहा-'तुम क्या इस घर के कोई नहीं हो?'
महेन्द्र ने कहा-'क्यों, क्या बात है?'
स्त्री ने कहा-'दास-दासियां जानती हैं और तुम नहीं जानते? ससुर को तो नई मां प्राणों से बढ़कर हैं, वे तो कुछ कहेंगे ही नहीं, परन्तु तुम्हें तो कहना उचित है!'
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