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उपन्यास >> परम्परा

परम्परा

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :400
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9592
आईएसबीएन :9781613011072

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भगवान श्रीराम के जीवन की कुछ घटनाओं को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास


कुलवन्त ने समाचार-पत्र ले पढ़ा और कह दिया, ‘‘यदि यह स्मोक स्कीन’ नहीं तो महा मूर्खता है।’’

‘‘पाकिस्तान में जितनी देर तक सैनिक तानाशाही चलती रहेगी तब तक भारत के साथ युद्ध की सम्भावना बनी रहेगी।’’

‘‘परन्तु युद्ध क्या खराब बात है?’’

‘‘नहीं, वोपत! यह खराब नहीं। यह तो देश के लिये वरदान होता है। युद्ध से जातियाँ पवित्र और सुदृढ़ होती है।’’

‘‘हारने पर भी?’’

‘‘हाँ। परन्तु शर्त यह है कि जाति में जीवन हो। मुर्दा जाति के लिये तो युद्ध अथवा शान्ति कुछ अर्थ नहीं रखते, परन्तु जीवित जातियों में युद्ध तो यज्ञ की भाँति पवित्र और समृद्ध करने वाला होता है।

‘‘भारत में अभी भी गांधी की मीमांसा कार्य कर रही प्रतीत होती है, जिसमें यह भावना बना दी गयी है कि देश अपमानित एवं लज्जित किये जाने पर भी शान्ति की लालसा करता रहे।’’

वोपत ने बात बदल दी। उसने कहा, ‘‘यदि युद्घ होना है तो यह बोझा हमारे कन्धों पर आ जाता है कि देश की रक्षा में हम भूल न करें।’’

‘‘पर मिस्टर वोपत! सुरक्षा मन्त्री का सन्देश आया है कि मिराज लड़ाकू जहाज़ो के खरीद की बात पक्की कर ली जाये।’’

‘‘पर वह तो अंग्रेजी नैटों से घटिया है।’’ वोपत ने कहा।

‘‘हाँ। मैं समझता हूँ कि ‘मिराज’ वालों से झगड़ा कर ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाये कि सुरक्षा मन्त्री स्वयंमेव नैट्स खरीदने के लिये तैयार हो जायें।’’

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