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कटी पतंग
कटी पतंग
प्रकाशक :
भारतीय साहित्य संग्रह |
प्रकाशित वर्ष : 2016 |
पृष्ठ :427
मुखपृष्ठ :
ईपुस्तक
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पुस्तक क्रमांक : 9582
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आईएसबीएन :9781613015551 |
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एक ऐसी लड़की की जिसे पहले तो उसके प्यार ने धोखा दिया और फिर नियति ने।
6
कमल ने ज्योंही जीप गाड़ी लेक विव के सामने रोकी, अंजना का दिल धक्-धक् करने लगा। उसने फाटक के बाहर लगी हुई तख्ती पढ़ी जिस पर पूनम के ससुर का नाम मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था।
कमल ने पहले उस दरवाजे की ओर और फिर अंजना की ओर देखा। वह और भी घबरा गई। कमल उसके चेहरे के भावों को परखता हुआ बोला-''यही घर है लाला जगन्नाथजी का। कुर्सी तो छिन गई उनसे, लेकिन अब तक लोग उनकी वैसी ही इज्जत करते हैं।''
अंजना ने स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिलाया और फिर उस शानदार लौहद्वार की ओर देखा। उसकी बनावट और मजबूती देखकर उसे मालिक की मनोवृत्ति का कुछ-कुछ अनुमान हो गया।
कमल उसे वहीं रुकने के लिए कहकर अकेला फाटक की ओर बढ़ा। वह लालाजी को उनके जीवन की सबसे अनोखी भेंट देना चाहता था। उसने दरबान को फाटक खोलने का इशारा ही किया था कि अन्दर से पालतू कुत्तों के भूंकने की आवाजें आईं। उन आवाज़ों ने अंजना को कुछ भयभीत कर दिया। लेकिन वह संभल गई। नई जगह, नये लोग! न जाने उसे बहू मानने को तैयार भी होंगे या नहीं!
फाटक खुला। दो कुत्ते उछलते हुए आगे बढ़े और प्यार से कमल की टांगों से लिपटने लगे। उसने भी दोनों को प्यार किया और वे लौट गए। कमलजीप में लौट आया और उसे ड्राइव करके अन्दर ले गया।
जीप पार्लर में जा रुकी। सामने ही दालान में घर के मालिक लाला जगन्नाथ कुर्सी पर बैठे धूप सेंकने के साथ-साथ अखबार भी पढ़ रहे थे। उन्होंने अखबार से निगाहें हटाकर जीप की ओर देखा तो अंजना ने भी उनके चेहरे को तनिक ध्यान से देख लिया।
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