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कटी पतंग
कटी पतंग
प्रकाशक :
भारतीय साहित्य संग्रह |
प्रकाशित वर्ष : 2016 |
पृष्ठ :427
मुखपृष्ठ :
ईपुस्तक
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पुस्तक क्रमांक : 9582
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आईएसबीएन :9781613015551 |
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एक ऐसी लड़की की जिसे पहले तो उसके प्यार ने धोखा दिया और फिर नियति ने।
15
बादलों की गरज और वर्षा के शोर ने आज नैनीताल की वादियों में तूफान मचा रखा था। कल तक जो सफेद बदलियां घाटियों को चूमती हुई दूर निकल जाती थी, आज काली घटाएं बनकर घनघोर वर्षा करने पर तुली हुई थीं।
कमल अपनी लाइब्रेरी में बैठा जंगलों के उन मानचित्रों को देख रहा था जो नये ठेकों के लिए खुलने वाले थे। उसने अपनी लाइब्रेरी में ही सोने का प्रबन्ध कर रखा था, क्योंकि शयन-कक्ष पर शालो और उसकी सहेलियों ने अधिकार जमा रखा था।
वह जैसे ही दफ्तर की किसी फाइल के लिए सदर कमरे तक गया, उसकी नजरें अपने शयन-कक्ष में सोई हुई उन लड़कियों के चेहरों पर जा पड़ीं जो उस तूफान के शोर से अचेत मीठी नींद सो रही थीं।
शालो की तीनों सहेलियां दिन-भर की थकान के बाद एक-दूसरे से चिपटी पड़ी सो रही थीं और बड़ी अजीब-सी लग रही थीं। उनके इस सोने के ढंग को देखकर कमल के होंठों पर मुस्कराहट आ गई, लेकिन दूसरे ही क्षण वह झेंपकर अपने-आप में आ गया।
शालिनी उसके लिए कॉफी का प्याला लेकर अन्दर आ गई थी। भइया को उस शयन-कक्ष में झांकते देखकर उससे रहा नहीं गया। वह व्यंग्यात्मक भाव से पूछ बैठी-''क्या देख रहे हो भइया?''
''कुछ नहीं, कुछ नहीं। हां, उस तूफान को देख रहा था।''
''बाहर के तूफान को या उस तूफान को जो तुम्हारे दिल में उठ रहा है?''
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