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गंगा और देव

आशीष कुमार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :407
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9563
आईएसबीएन :9781613015872

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आज…. प्रेम किया है हमने….


सुबह के आठ बजे। अच्छा दिन। खिली-खिली धूप चारों ओर।

सुबह से ही शिवालय मे भक्तो का आना जाना शुरू हो गया था। मन्दिर के परिसर मे फूल वालो, धार्मिक किताबों व पूजन सामग्री बेचने वालों ने अपनी-अपनी दुकानें खोल ली थी। धक्का-मुक्की शुरू हो चुकी थी शिव के दर्शन के लिए।

‘ढम! ढम! ढम! ढम!....’ नगाड़े वाले लगातार नगाड़े बजा रहे थे। जो भक्त शिवालय मे प्रवेश करता था, वो द्वार पर लगे बड़े से कई कुन्तल भारी पीतल के घण्टे की रस्सी खींचकर बडा सा घंटा बजाता था.... इसलिए टन्न! टन्न! की ध्वनि कुछ-कुछ देर में इस घन्टे से उत्पन्न होती थी और सुनायी पड़ती थी पूरे गोशाला में। मैंने भी सुना...

सम्पूर्ण मन्दिर एक विशाल चबूतरे पर बना था जिस पर जाने के लिए सौ से ज्यादा सीढि़याँ चढ़नी पड़ती थी। अब वर्तमान समय में गोशाला के अमीर डाँक्टरों, व्यापारियों, व नेताओं से चन्दा देकर प्राचीन शिवालय को बिल्कुल आज के दौर का नया, चमचमाता मन्दिर बना दिया था। विशाल चबूतरे पर सफेद संगमरमर राजस्थान से मंगवाकर लगवा दिया था। मन्दिर की दीवारों को पीओपी करवाकर सफेद व लाल रंग के मिश्रण से रंगवा दिया गया था। मन्दिर की साफ सफाई पोछा लगाने, पानी से धोने के लिए चार लोगों को भी नियुक्त कर दिया गया था। इतना ही नहीं कुछ व्यापारी तो शिवालय के मुख्य कक्ष में एसी भी लगाना चाहते थे। पर उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली।

देव ने सौ सीढि़याँ चढ़ी और संगमरमर के चबूतरे पर पहुँचा। फिर देव ने मुख्य कक्ष में प्रवेश किया। विशाल शिवलिंग अपने नियत स्थान पर विराजमान थी...

देव ने बड़ी श्रद्वा से अपने दोनो हाथ जोड़े....

‘‘हे शिव!‘‘ मैंने बीएड का इक्जाम ठीक दो महीने पहले दिया था। आज रिजल्ट आने वाला है‘‘ देव ने शिव से कहा मन ही मन....

‘‘अगर अच्छी रैंक न आई, तो माँ क्या सोचेगी? कहेगी यह लडका खुद को कितना होशियार बताता है, फिर भी इस आसान से इक्जाम मे अच्छी रैंक नहीं ला पाया। इसलिए मेरी इज्जत बचाओ और मुझे एक अच्छी सी रैंक दिलाओ‘‘

‘‘पूरे एक सौ एक रू का प्रसाद चढाउँगा! पक्का बिल्कुल पक्का... कोई बेईमानी नहीं! कोई चीटिंग नहीं!‘‘ देव ने शिव से कहा।

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शिव की कृपा हुई। देव की बीएड में अच्छी रैंक आई।

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