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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘क्या विशेषता है उनमें?’’ गान्धारी ने पूछा।

‘मैं भी उनको देखने गया था और उनसे पूछने पर विदित हुआ है कि वे शतश्रृंग पर्वत से आये है। यह वही स्थान है जहाँ महाराज के कनिष्ठ भ्राता पांडु तपस्या कर रहे थे। यह कहा जा रहा है कि बालक पांडु के पुत्र हैं और उनके साथ उनकी बड़ी माता राजकुमारी पृथा अर्थात् महारानी कुन्ती देवी है। महाराज पांडु का देहान्त हो गया है। उनकी छोटी पत्नी माद्री उनके साथ सती हो गई हैं।’’

‘‘ये बालक और उनकी माता यहाँ किसलिए आये हैं?’’

‘‘ऋषियों का कहना है कि पांडु का ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर आपके दुर्योधन से बड़ा है। अतः वही कुरु देश का राज्याधिकारी है और उसकी शिक्षा का भार राज्य को लेना चाहिए।’’

‘‘यह कैसे हो सकता है? दुर्योधन बड़े भाई का पुत्र है। इस कारण युधिष्ठिर से छोटा होता हुआ भी वही राज्याधिकारी होगी।’’

इस पर धृतराष्ट्र ने बताया, ‘‘भीष्मजी का यह आदेश था कि हम दोनों भाइयों का ज्येष्ठ पुत्र ही युवराज-पद पायेगा।’’

‘‘भीष्मजी ने कुछ कहा है तो मेरे विवाह के पूर्व ही कहा होगा। इस कारण मैं उनके कहने के अनुसार व्यवहार करने के लिए बाध्य नहीं हूँ।’’

इस पर धृतराष्ट्र कुछ नहीं कह सका। गान्धारी ने ताली बजाई तो एक दासी भीतर आ गई। गान्धारी ने कहा, ‘‘जाओ, दुर्योधन और शकुनि को तुरन्त बुला लाओ।’’

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