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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘तो क्या निश्चय किया है?’’

‘‘आप अपना परिचय देंगे तो बता सकता हूँ।’’

इस पर वह व्यक्ति खिलखिलाकर हँस पड़ा। हँसकर उसने कहा, ‘‘किसी नारद नाम के प्राणी से आपका परिचय है क्या?’’

नारद नाम लेते ही मैं पहचान गया। मैं विस्मित सा उठकर उसका मुख देखने लगा। इस पर नारद ने कहा, ‘‘बैठिये संजयजी! मेरी रुचि इस बात के जानने में क्यों है, आपको पीछे बताऊँगा। पहले यह बातइये कि आप करने क्या जा रहे है?’’

‘‘मैंने कंस के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा है। मैं चाहता हूँ कि वह अपनी बहन और बहनोई को छोड़ दे। वे अपने पुत्र को लेकर अपने राज्य में चले जायें। ऐसा करने से कंस को वृन्दावन वालों को तंग करने में कोई कारण नहीं रहेगा और उनको भी अपना राज्य छोड़ किसी अन्य राजा के अधीन जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी।’’

‘‘तो आप जानते हैं कि कृष्ण कौन है?’’

‘‘हाँ, मुझको बताया गया है कि वह देवकी और वसुदेव का आठवाँ पुत्र है।’’

नारद मुस्कराता रहा। मैं उसके मुस्कराने का अर्थ नहीं समझा। कुछ विचारकर नारद ने कहा, ‘‘मैं समझता हूँ कि देवेन्द्र ने आपको बताया था कि वृन्दावन में कौन पल रहा है?’’

‘‘उन्होंने केवल इतना ही कहा था कि एक महानात्मा वृन्दावन में पल रहा है और वह कुरु-वंश के नाश का कारण होगा।’’

इस पर नारद ने कहा, ‘‘अभी वसुदेव के छूटने का समय नहीं आया। मैं अभी कंस को बताकर आ रहा हूँ कि वसुदेव यहाँ से छूटते ही कृष्ण को साथ लेकर गुर्जर देश में चला जायेगा और फिर समय पर कंस के विनाश में कारण बन जायेगा।’’

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