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अंतिम संदेश

खलील जिब्रान

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :74
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9549
आईएसबीएन :9781613012161

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विचार प्रधान कहानियों के द्वारा मानवता के संदेश

(15)


सात दिन औऱ सात रात तक कोई आदमी बगीचे के निकट भी नहीं आया, और अपनी स्मृतियों और पीडा़ओं के साथ वह अकेला ही बना रहा, क्योंकि वे भी, जिन्होंने उसकी बातें प्यार तथा घैर्यपूर्वक सुनी थीं, उससे विमुख होकर दूसरे दिनों की खोज में चले गए थे।

केवल करीमा आई, उसके चेहरे पर खामोशी एक आवरण की तरह फैली हुई थी। उसके हाथ में प्याला और तश्तरी थी, उसके एकाकीपन औऱ भूख के लिए मदिरा तथा खाना था। और ये वस्तुएं उसके सामने सजाकर वह अपने रास्ते वापस लौट गई।

औऱ अलमुस्तफा ने फिर श्वेत चिनार के वृक्षों का साथ ग्रहण कर लिया, औऱ सड़क की ओर देखता हुआ बैठा रहा। जरा देर बाद उसने देखा, मानो एक धूल ऊपर उठकर बादल बन गई है औऱ वह बादल उसकी ओर चला आ रहा है। उस बादल में से निकलकर वे नौ के नौ शिष्य बाहर आते दिखाई पडे़ और उनके आगे-आगे करीमा पथ प्रदर्शक बनी चली आ रही थी।

और अलमुस्तफा ने आगे बढ़कर सड़क पर ही उनसे भेंट की, औऱ वे दरवाजे के अन्दर दाखिल हुए। सबकुछ ठीक था, मानो वे अभी एक घण्टे पहले ही अपने-अपने रास्ते पर गये हों।

वे अन्दर आ गए और उन्होंने उसके साथ उसके सस्ते आसन पर भोजन किया, जबकि करीमा ने उनके लिए रोटी और सब्जी परोसी और अंतिम मदिरा प्यालों में ढाली। जब वह ढाल रही थी तो उसने प्रभु से पूछा और कहा, "यदि मुझे आज्ञा दें तो मैं नगर जाकर आपके प्यालों को फिर से भरने के लिए मदिरा ले आऊं, क्योंकि वह समाप्त हो गई है?"

और उसने करीमा की ओर देखा। उसकी आंखों में एक यात्रा तथा एक दूर देश बसा हुआ था और उसने कहा, "नहीं, क्योंकि इस समय के लिए तो यही काफी है।"

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