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रंगभूमि (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :1153
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8600
आईएसबीएन :978-1-61301-119

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नौकरशाही तथा पूँजीवाद के साथ जनसंघर्ष का ताण्डव; सत्य, निष्ठा और अहिंसा के प्रति आग्रह, ग्रामीण जीवन में उपस्थित मद्यपान तथा स्त्री दुर्दशा का भयावह चित्र यहाँ अंकित है


मां–तू झूठ बोलती है।

सोफ़िया–अगर दिल में श्रद्धा न होती, तो जबान से कदापि न कहती।

माँ–तू प्रभु मसीह को अपना मुक्तिदाता समझती है। तुझे यह विश्वास है कि वही तेरी उद्धार करेंगे?

सोफ़िया–कदापि नहीं। मेरा विश्वास है कि मेरी मुक्ति, अगर मुक्ति हो सकती है, तो मेरे कर्मों से होगी।

मां–तेरे कर्मों से तेरे मुंह में कालिख लगेगी, मुक्ति न होगी।

यह कहकर मिसेज सेवक फिटन पर जा बैठीं। संध्या हो गई थी। सड़क पर ईसाइयों के दल-के-दल कोई ओवरकोट पहने, कोई माघ की ठंड से सिकुड़े हुए, खुश गिरजे चले जा रहे थे, पर सोफ़िया को सूर्य की मलिन ज्योति भी असह्य हो रही थी, वह एक ठंडी सांस खींचकर बैठ गई। ‘तेरे कर्मों से तेरे मुंह में कालिख लगेगी’–ये शब्द उसके अंतःकरण को भाले के समान बेधने लगे। सोचने लगी–मेरी स्वार्थ-सेवा का यही उचित दंड है। मैं भी केवल रोटियों के लिए अपनी आत्मा की हत्या कर रही हूं, अपमान और अनादर के झोंके सह रही हूं। इस घर में कौन मेरी हितैषी है? कौन है, जो मेरे मरने की खबर पाकर आंसू की चार बूंदे गिरा दे? शायद मेरे मरने से लोगों की खुशी होगी। मैं इनकी नजरों में इतनी गिर गई हूं। ऐसे जीवन पर धिक्कार है। मैंने देखे हैं हिंदू-घरानों में भिन्न-भिन्न मतों के प्राणी कितने प्रेम से रहते हैं। बाप सनातन-धर्मावलंबी है, तो बेटा आर्यसमाजी। पति ब्रह्मसमाज में है, तो स्त्री पाषाण-पूजकों में। सब अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। कोई किसी से नहीं बोलता। हमारे यहां आत्मा कुचली जाती है। फिर भी यह दावा है कि हमारी शिक्षा और सभ्यता विचार-स्वातंत्र्य के पोषक हैं। हैं तो हमारे यहां भी उदार विचारों के लोग प्रभु सेवक ही उनकी एक मिसाल है, पर इनकी उदारता यथार्थ में विवेकशून्यता है। ऐसे उदार प्राणियों से तो अनुदान ही अच्छे। इनमें कुछ विश्वास तो है, निरे बहुरूपिए तो नहीं हैं। आखिर मामा अपने दिल में क्या समझती है कि बात-बात पर वाग्बाणों से छेदने लगती हैं? उनके दिल में यही विचार होगा कि इसे कहीं और ठिकाना नहीं है, कोई इसका पूछनेवाला नहीं है। मैं इन्हें दिखा दूंगी कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हूं। अब इस घर में रहना नरकवास के समान है। इस बेहयाई की रोटियां खाने से भूखों मर जाना अच्छा है। बला से लोग हंसेगे, आजाद तो हो जाऊंगी। किसी के ताने-मेहने तो न सुनने पड़ेंगे।

सोफ़िया उठी, और मन में कोई स्थान निश्चित किए बिना ही अहाते से बाहर निकल आई। उस घर की वायु उसे दूषित मालूम होती थी। वह आगे बढ़ती जाती थी, पर दिल में लगातार प्रश्न हो रहा था, कहां जाऊं? जब वह घनी आबादी में पहुंची, तो शोहदों ने उस पर इधर-उधर से आवाजें कसनी शुरू कीं। किंतु वह शर्म से सिर नीचा करने के बदले उन आवाजों और कुवासनामयी दृष्टियों का जवाब घृणायुक्त नेत्रों से देती चली जाती थी, जैसे कोई सवेग जल-धारा पत्थरों को ठुकराती हुई आगे बढ़ती चली जाए। यहां तक कि वह उस खुली हुई सड़क पर आ गई, जो दशाश्वमेध घाट की ओर जाती है।

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