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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
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शारदा ने मन में पक्का निश्चय कर लिया था कि वह इस जीवन के कार्यक्रम को बदलकर ही रहोगी। क्लब तो इस जीवन की पराकाष्ठा थी। यूँ तो घर में भी वह सरलता और सरसता विद्यमान नहीं थी, जो होनी चाहिये थी। जीवन में कृतिमता व्यापक होती जाती थी।
इस जीवन का आरम्भ हुआ था इन्द्रनारायण को नौकरी मिलने पर। उसे एक ऊँची पदवी मिल गयी थी। इन्द्र उस ऊँची पदवी पर पैर रखते ही अपने सरल जीवन का त्याग कर बैठा था। इस बलिदान में उसने शारदा को भी भागीदारी बना लिया था।
जब इन्द्रनारायण दौरे से लौटा तो आते ही वह चीफ़ सेक्रेटरी से मिलने के लिए चला गया। वहाँ से लौटा तो क्लब चला गया। क्लब से वापस आया तो उसके सोने का समय हो गया था। अगले दिन प्रातः उठा तो मिलने वालों का जमघट पहले ही बैठक में लगा था। बहुत कठिनाई से नौ बजे तक उनसे निपट पाया तो भोजन कर कार्यालय को चला गया। सायं पाँच बजे वह लौटा तो लखनऊ की मेडिकल कौंसिल का एक डैपुटेशन मिलने के लिए बैठा था। सरकार ने देशी चिकित्सकों का एक बोर्ड बनाया था। मेडिकल कौंसिल के लोग यह चाहते थे कि देशी रजिस्टर्ड चिकित्सकों का अधिकार उनके बराबर नहीं होना चाहिये।
यद्यपि डायरेक्टर स्वयं भी यही चाहता था, परन्तु वह गवर्नमेंट की नीति की निन्दा भी नहीं कर सकता था। इस कारण घूम-घुमाव के शब्दों में सरल-सी बात कहने में ही दो घंटे लग गये।
इसके पश्चात् क्लब का समय हो गया। इन्द्रनारायण जाने के लिए तैयार होने लगा तो शारदा सामने आ खड़ी हुई। उसने कह दिया, ‘‘मैं कल से आपसे पाँच मिनट के लिए बात करने की प्रतीक्षा कर रही हूँ और आपको तो इधर देखने का समय ही नहीं मिलता।’’
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