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उपन्यास >> निर्मला (उपन्यास)

निर्मला (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :304
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8556
आईएसबीएन :978-1-61301-175

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अद्भुत कथाशिल्पी प्रेमचंद की कृति ‘निर्मला’ दहेज प्रथा की पृष्ठभूमि में भारतीय नारी की विवशताओं का चित्रण करने वाला एक सशक्तम उपन्यास है…


साधु–कौन कहता है?

साह–इसकी अम्मां कहती होंगी। कोई सौदा उनके मन ही नहीं भाता।

बेचारे लड़के को बार-बार दौड़ाया करती है। सौतेली मां है न! अपनी मां हो तो कुछ ख्याल भी करे।

साधु ने सियराम को सदय नेत्रों से देखा, मानो उसे त्राण देने के लिए उनका हृदय विकल हो रहा है। तब करुण स्वर से बोले- तुम्हारी माता का स्वर्गवास हुए कितने दिन हुए बच्चा?

सियाराम–छठा साल है।

साधु–तब तुम उस वक्त बहुत ही छोटे रहे होंगे। भगवान् तुम्हारी लीला कितनी विचित्र है। इस दुधमुंहे बालक को तुमने मात्-प्रेम से वंचित कर दिया। बड़ा अनर्थ करते हो भगवान्! छ: साल का बालक और राक्षसी विमाता के पालने पड़े! धन्य हो दयानिधि! साहजी, बालक पर दया करो, घी लौटा लो, नहीं तो इसकी मात इसे घर में रहने न देगी। भगवान की इच्छा से तुम्हारा घी जल्द बिक जायेगा। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ रहेगा।

साहजी ने रुपये वापस न किये। आखिर लड़के को फिर घी लेने आना ही पड़ेगा। न जाने दिन में कितनी बार चक्कर लगाना पड़े और किस जालिये से पाला पड़े। उसकी दुकान में जो घी सबसे अच्छा था, वह सियाराम दिल से सोच रहा था, बाबाजी कितने दयालु हैं? इन्होंने सिफारिश न की होती, तो साहजी क्यों अच्छा घी देते?

सियाराम घी लेकर चला, तो बाबाजी भी उसके साथ ही लिये। रास्ते में मीठी-मीठी बातें करने लगे।

‘बच्चा, मेरी माता भी मुझे तीन साल का छोड़कर परलोक सिधारी थीं। तभी से मातृ-विहीन बालकों को देखता हूं तो मेरा हृदय फटने लगता हैं।’

सियाराम ने पूछा–आपके पिताजी ने भी तो दूसरा विवाह कर लिया था?

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