लोगों की राय

उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516
आईएसबीएन :978-1-61301-086

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

320 पाठक हैं

राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


शंखधर दीवानखाने में बैठे हुए सोच रहे थे। मेरे बार-बार जन्म लेने का हेतु क्या है? क्या मेरे जीवन का उद्देश्य जवान होकर मर जाना ही है? क्या मेरे जीवन की अभिलाषाएँ कभी पूरी न होंगी? संसार के सब प्राणियांक के लिए यदि भोग-विलास वर्जित नहीं है, तो मेरे ही लिए क्यों है? क्या परीक्षा की आग में जलते ही रहना मेरे जीवन का ध्येय है?

देवप्रिया द्वार पर आकर खड़ी हो गई।

शंखधर ने उसका अलंकार विहीन रूप देखा, तो उन्मत्त हो गए। अलंकारों का त्याग करके वह मोहिनी हो गई थी।

देवप्रिया ने द्वार पर खड़े-खड़े कहा–अन्दर आऊँ?

शंखधर के अंतःकरण में कहीं से आवाज़ आयी। मुँह से कोई शब्द न निकला।

देवप्रिया ने फिर कहा–अंदर आऊँ?

शंखधर ने कातर स्वर में कहा–नेकी और पूछ-पूछ!

देवप्रिया–नहीं प्रियतम, तुम्हारे पास आते डर लगता है।

शंखधर ने एक पग आगे बढ़कर देवप्रिया का हाथ पकड़ा और अंदर खींच लिया। उसी वक़्त वायु का वेग प्रचंड हो गया। बिजली का दीपक बुझ गया। कमरे में अंधकार छा गया।

देवप्रिया ने सहमी हुई आवाज़ में कहा–मुझे छोड़ दो!

उसका हृदय धक-धक कर रहा था।

सितार पर चोट पड़ते ही जैसे उसके तार गूँज उठते हैं, तैसे ही शंखधर का स्नायुमंडल थरथरा उठा। रमणी को करपाश में लपेट लेने की प्रबल इच्छा हुई। मन को सँभालकर कहा–घर आयी हुई लक्ष्मी कौन छोड़ता है?

देवप्रिया–बिना बुलाया मेहमान बिना कहे जा भी तो सकता है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book