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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516
आईएसबीएन :978-1-61301-086

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


साईंगंज दिखाई देने लगा। स्त्री-पुरुष खेतों में अनाज काटते नज़र आने लगे। अब वह गाँव के डाँड़ पर पहुँच गया। कई आदमी उसके सामने से होकर निकल भी गये; पर उसने किसी से कुछ नहीं पूछा। अगर किसी ने कह दिया–बाबाजी हैं, तो वह क्या करेगा? इसी असमंजस में पड़ा हुआ वह मंदिर के सामने चबूतरे पर बैठ गया। सहसा मंदिर में से एक आदमी को निकलते देखकर वह चौंक पड़ा, अनिमेष नेत्रों से उसकी ओर एक क्षम देखा, फिर उठा कि उस पुरुष के चरणों पर गिर पड़ा; पर पैर थरथरा गए। मालूम हुआ, कोई नदी उसकी ओर बही चली आती है–वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

वह पुरुष कौन था? वही, जिसकी मूर्ति उसके हृदय में बसी हुई थी, जिसका वह उपासक था।

४३

अभागिनी अहिल्या के लिए संसार सूना हो गया। पति को पहले ही खो चुकी थी। जीवन का एकमात्र आधर पुत्र रह गया था, उसे भी खो बैठी। अब वह किसका मुँह देखकर जिएगी? वह राज्य उसके लिए किसी ऋषि का अभिशाप हो गया। पति और पुत्र को पाकर वह टूटे-फूटे झोंपड़े में कितने सुख से रहेगी। तृष्ण का उसे बहुत दंड मिल चुका। भगवान्, इस अनागिनी पर दया करो!

अहिल्या को अब राजभवन फाड़े खाता था। वह अब उसे छोड़कर कहीं चली जाना चाहती थी। कोई सड़ा-गला झोपड़ा, किसी वृक्ष की छाँह, पर्वत की गुफा, किसी नदी का तट उसके लिए इस भवन से सहस्त्रों गुना अच्छा था। वे दिन कितने अच्छे थे, जब वह अपने स्वामी के साथ पुत्र को हृदय से लगाए एक छोटे से मकान में रहती थी। वे दिन फिर न आएँगे। वह मनहूस घड़ी थी, जब उसने इस भवन में कदम रखा था। वह क्या जानती थी कि इसके लिए उसे पति और पुत्र से हाथ धोना पड़ेगा? आह? जब उसका पति जाने लगा, तो वह भी उसके साथ ही क्यों न चली गयी? रह-रहकर उसको अपनी भोग-लिप्सा पर क्रोघ आता था, जिसने उसका सर्वनाश कर दिया था। क्या उस पाप का कोई प्रायश्चित नहीं है? क्या इस जीवन में स्वामी के दर्शन न होंगे? अपने प्रिय पुत्र की मोहिनी मूर्ति फिर वह न देख सकेगी? कोई ऐसी युक्ति नहीं है?

राजभवन अब भूतों का डेरा हो गया है। उसका अब कोई स्वामी नहीं रहा। राजा साहब अब महीनों नहीं आते। वह अधिकतर इलाके में ही घूमते रहते हैं। उनके अत्याचार की कथाएँ सुनकर लोगों के रोएं खड़े हो जाते हैं। सारी रियासत में हाहाकार मचा हुआ है। कहीं किसी गाँव में आग लगायी जाती है, किसी गाँव में कुएँ भ्रष्ट किए जाते हैं। राजा साहब को किसी पर दया नहीं। उनके सारे सद्भाव शंखधर के साथ चले गये। विधाता ने अकारण ही उन पर कठोर आघात किया है। वह उस आघात का बदला दूसरों से ले रहे हैं। जब उनके ऊपर किसी को दया नहीं आती, तो वह किसी पर क्यों दया करें? अगर ईश्वर ने उनके घर में आग लगायी है, तो वह भी दूसरों को रुलाएँगे। लोगों को ईश्वर की याद आती है, तो उनकी धर्म-बुद्धि जागृत हो जाती है; लेकिन किन लोगों की? जिनके सर्वनाश में कुछ कसर रह गई हो, जिनके पास रक्षा करने के योग्य कोई वस्तु रह गई हो, लेकिन जिसका सर्वनाश हो चुका है, उसे किस बात का डर?

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