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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516
आईएसबीएन :978-1-61301-086

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


सहसा शंखधर ड्योढ़ी में खड़ा हो गया और बोला–दादीजी, आपसे कुछ माँगना चाहता हूँ।

निर्मला ने विस्मित होकर सजल नेत्रों से उसे देखा और गद्गद् होकर बोली–क्या माँगते हो, बेटा?

शंखधर–मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मेरी मनोकामना पूरी हो!

निर्मला ने पोते को कंठ से लगाकर कहा–भैया, मेरा तो रोयाँ-रोयाँ तुम्हें आशीर्वाद दिया करता है! ईश्वर तुम्हारी मनोकामना पूरी करें!

शंखधर ने उनके चरणों पर सिर झुकाया और मोटर में जा बैठा। निर्मला चौखट पर खड़ी, मोटर कार को निहारती रही। मोड़ पर आते ही मोटर तो आँखों से ओझल हो गई; लेकिन निर्मला उस समय तक वहाँ से न हटी, जब तक उसकी ध्वनि क्षीण होते-होते आकाश में विलीन न हो गई। अन्तिम ध्वनि इस तरह कान में आयी, मानो अनन्त की सीमा पर बैठे किसी प्राणी के अन्तिम शब्द हों। जब यह आधार भी न रहा, तो निर्मला रोती हुई अन्दर चली गयी।

शंखधर घर पहुँचा, तो अहिल्या ने पूछा–आज इतनी देर कहाँ लगायी बेटा? मैं कब से तुम्हारी राह देख रही हूँ।

शंखधर–अभी तो ऐसी बहुत देर नहीं हुई, अम्माँ! ज़रा दादीजी के पास चला गया था। उन्होंने तुम्हें आज एक संदेशा कहला भेजा है।

अहिल्या–क्या संदेशा है, सुनूँ? कुछ तुम्हारे बाबूजी की ख़बर तो नहीं मिली है।

शंखधर–नहीं। बाबूजी की ख़बर नहीं मिली। तुम कभी-कभी वहाँ क्यों नहीं चली जातीं?

अहिल्या–क्या इसी विषय में कुछ कहती थीं?

शंखधर–कहती तो नहीं थीं; पर उनकी इच्छा ऐसी मालूम होती है। क्या इसमें कोई हरज़ है?

अहिल्या ने ऊपरी मन से यह तो कह दिया–हरज़ कुछ नहीं, हरज़ क्या है, घर तो मेरा वही है, यहाँ तो मेहमान हूँ; लेकिन भाव से साफ़ मालूम होता था कि वह वहाँ जाना उचित नहीं समझतीं। शायद वह कह सकती तो कहती–वहाँ से तो एक बार निकाल दी गई, अब कौन मुँह लेकर जाऊँ? क्या अब मैं कोई दूसरी हो गई हूँ? बालक से यह बात मुनासिब न थी।

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