उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
|
320 पाठक हैं |
राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर ने केवल दबी आँखें से मनोरमा को देखा, कुछ बोले न सके। उन्हें शर्म आ रही थी कि लोग दिल में क्या ख़याल कर रहे होंगे। सामने राजा विशालसिंह, दीवान साहब, ठाकुर गुरुसेवक और मुंशी वज्रधर खड़े थे। बरामदे में हज़ारों आदमियों की भीड़ थी। धन्यवाद के शब्द उनकी ज़ुबान पर आकर रुक गए। वह दिखाना चाहते थे कि मनोरमा की यह वीर-भक्ति उनकी बाल-क्रीड़ा मात्र है।
एक क्षण में सिपाहियों ने चक्रधर को बन्द गाड़ी में बिठा दिया और जेल की ओर ले चले। धीरे-धीरे कमरा खाली हो गया। मिस्टर जिम ने भी चलने की तैयारी की। तहसीलदार साहब के सिवा अब कमरे में और कोई न था। जब जिम कठघरे से नीचे उतरे, तो मुंशी आँखों में आँसू भरे उनके पास आये और बोले–मिस्टर जिम, मैं तुम्हें आदमी समझता था, पर तुम पत्थर निकले। मैंने तुम्हारी जितनी खुशामद की, उतनी अगर ईश्वर की करता, तो मोक्ष पा जाता। मगर तुम न पसीजे। रिआया का दिल यों मुट्ठी में नहीं आता। यह धाँधली उसी वक़्त तक चलेगी, जब तक यहाँ के लोगों की आँखें बन्द हैं। यह मज़ा बहुत दिनों तक न उठा सकोगे।
यह कहते हुए मुंशीजी कमरे से बाहर आये। जिम ने कुपित नेत्रों से देखा, पर कुछ बोला नहीं।
चक्रधर जेल पहुँचे, तो शाम हो गई थी। जाते-ही-जाते उनके कपड़े उतार लिए गए और जेल के वस्त्र मिले। लोटा और तसला भी दिया गया। गर्दन में लोहे का नम्बर डाल दिया गया। चक्रधर जब ये कपड़े पहनकर खड़े हुए, तो उनके मुख पर विचित्र शान्ति की झलक दिखाई दी, मानो किसी ने जीवन का तत्त्व पा लिया हो। उन्होंने वही किया, जो उनका कर्तव्य था और कर्तव्य का पालन ही चित्त की शान्ति का मूल मन्त्र है।
रात को जब वह लेटे, तो मनोरमा की सूरत आँखों के सामने फिरने लगी। उसकी एक-एक बात याद आने लगी और हर बात में कोई-न-कोई गुप्त आशय भी छिपा हुआ मालूम होने लगा। लेकिन इसका अन्त क्या? मनोरमा, तुम क्यों मेरे झोपड़े में आग लगाती हो? तुम्हें मालूम है, तुम मुझे किधर खींच लिए जाती हो? ये बातें कल तुम्हें भूल जाएँगी। किसी राजा-रईस से तुम्हारा विवाह हो जाएगा, फिर भूलकर भी याद न करोगी। देखने पर शायद पहचान भी न सको। मेरे हृदय में क्यों अपने खेल के घरौंदे बना रही हो? तुम्हारे लिए जो खेल है, वह मेरे लिए मौत है। मैं जानता हूँ, यह तुम्हारी बाल-क्रीड़ा है; लेकिन मेरे लिए वह आग की चिनगारी है। तुम्हारी आत्मा कितनी पवित्र है, हृदय कितना सरल! धन्य होंगे उसके भाग्य, जिसकी तुम हृदयवेशी बनोगी; मगर इस अभागे को कभी अपनी सहानुभूति और सहृदयता से वंचित मत करना। मेरे लिए इतना ही बहुत है!
१७
राजा विशालसिंह की जवानी कब की गुज़र चुकी थी, किन्तु प्रेम से उनका हृदय अभी तक वंचित था। अपनी तीनों रानियों में केवल वसुमती के प्रेम की कुछ भूली हुई-सी याद उन्हें आती थी। प्रेम वह प्याला नहीं है, जिससे आदमी छक जाए, उसकी तृष्णा सदैव बनी रहती है। राजा साहब को अब अपनी रानियाँ गँवारिन-सी जँचती थीं, जिन्हें इसका ज़रा भी ज्ञान न था कि अपने को इस नई परिस्थिति के अनुकूल कैसे बनाएँ, कैसे जीवन का आनन्द उठाएँ। वे केवल आभूषणों पर ही टूट रही थीं। रानी देवप्रिया के बहुमूल्य आभूषणों के लिए तो वह संग्राम छिड़ा कि कई दिन तक आपस में गालियाँ-सी चलती रहीं। राजा साहब पर क्या बीत रही है? राज्य की क्या दशा है? इसकी किसी को सुध न थी। उनके लिए जीवन में यदि कोई वस्तु थी, तो वह रत्न और आभूषण थे। यहाँ तक कि रामप्रिया भी अपने हिस्से के लिए लड़ने-झगड़ने में संकोच न करती थी। इस आभूषण-प्रेम के सिवा उनकी रुचि या विचार में कोई विकास न हुआ। कभी-कभी तो उनके मुँह से ऐसी बातें निकल जाती थीं कि रानी देवप्रिया के समय की लौंडियाँ-बाँदियाँ मुँह मोड़कर हँसने लगतीं। उनका यह व्यवहार देखकर राजा साहब का दिल उनसे खट्टा होता जाता था।
|