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उपन्यास >> कर्मभूमि (उपन्यास) कर्मभूमि (उपन्यास)प्रेमचन्द
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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…
ग़ज़नवी–‘यहाँ कोई जलसा करके उन्हें बुलाना चाहिए।’
सलीम–‘क्यों बैठ-बिठाये जहमत मोल लीजिएगा। वह आयीं और शहर में आग लगी, हमें बँगला से निकलना पड़ा!’
ग़ज़नवी–‘अजी, यह तो एक दिन होना ही है। यह अमीरों की हुकूमत अब थोड़े दिनों की मेहमान है। इस मुल्क में अंग्रेजों का राज है, इसलिए हममें जो अमीर हैं और जो क़ुदरती तौर पर अमीरों की तरफ़ खड़े होते, वह भी ग़रीबों की तरफ़ खड़े होने में ख़ुश हैं, क्योंकि ग़रीबों के साथ उन्हें कम-से-कम इज़्ज़त तो मिलेगी, उधर तो यह डौल भी नहीं है। मैं अपने को इसी जमाअत में समझता हूँ।’
तीनों मित्रों में बड़ी रात तक बेतकल्लुफ़ी से बातें होती रहीं। सलीम ने अमर की पहले ही खूब तारीफ़ कर दी थी। इसलिए उसकी गँवारू सूरत होने पर भी ग़ज़नवी बराबरी के भाव से मिला। सलीम के लिए हुकूमत नयी चीज़ थी। अपने नये जूते की तरह उसे कीचड़ और पानी से बचाता था। ग़ज़नवी हुकूमत का आदी हो चुका था और जानता था कि पाँव नये जूते से कहीं ज़्यादा क़ीमती चीज़ है। रमणी-चर्चा उसके कुतूहल, आनन्द और मनोरंजन का मुख्य विषय थी। क्वाँरों की रसिकता बहुत धीरे-धीरे सूखने वाली वस्तु है। उनकी अतृप्त लालसा प्रायः रसिकता के रूप में प्रकट होती है।
अमर ने ग़ज़नवी से पूछा–‘आपने शादी क्यों नहीं कि? मेरे एक मित्र प्रोफेसर डॉक्टर शान्तिकुमार हैं, वह भी शादी नहीं करते। आप लोग औरतों से डरते होंगे।’
ग़ज़नवी ने कुछ याद करके कहा–‘शान्तिकुमार वही तो हैं खूबसूरत से, गोरे-चिट्टे, गठे हुए बदन के आदमी। अजी, वह तो मेरे साथ पढ़ता था यार। हम दोनों आक्सफ़ोर्ड में थे। मैंने लिटरेचर लिया था, उसने पोलिटिकल फ़िलासोफ़ी ली थी। मैं उसे खूब बनाया करता था। युनिवर्सिटी में है न? अक्सर उसकी याद आती थी।’
सलीम ने उनके इस्तीफ़े ट्रस्ट और नगर-कार्य का ज़िक्र किया।
ग़ज़नवी ने गर्दन हिलायी मानो कोई रहस्य पा गया है–‘तो यह कहिए, आप लोग उनके शागिर्द हैं। हम दोनों में अक्सर शादी के मसले पर बातें होती थीं। मुझे तो डॉक्टरों ने मना किया था, क्योंकि उस वक़्त मुझमें टी.बी. की कुछ अलामतें नज़र आ रही थीं। जवान बेवा छोड़ जाने के ख्याल से मेरी रूह काँपती थी। तबसे मेरी गुज़रान तीर-तुक्के पर ही है। शान्तिकुमार को तो क़ौमी ख़िदमत और जाने क्या–क्या ख़ब्त था; मगर ताज्जुब यह है कि अभी तक उस ख़ब्त ने उसका गला नहीं छोड़ा। मैं समझता हूँ, अब उसकी हिम्मत न पड़ती होगी। मेरे ही हमसिन तो थे। ज़रा उनका पता तो बताना? मैं उन्हें यहाँ आने को दावत दूँगा।’
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