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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464
आईएसबीएन :978-1-61301-159

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


चुनांचे इस वक़्त गुड़ की उस मीठी खुशबू ने मुझे बेसुध बना दिया। मगर मैं सब्र करके आगे बढ़ा।

ज्यों-ज्यों रात गुज़रती थी, शरीर थकान से चूर होता जाता था, यहाँ तक कि पाँव कांपने लगे। कच्ची सड़क पर गाड़ियों के पहियों की लीक पड़ गयी थी। जब कभी लीक में पाँव चला जाता तो मालूम होता किसी गहरे गढ़े में गिर पड़ा हूँ। बार-बार जी में आता, यहीं सड़क के किनारे लेट जाऊँ। किताबों की छोटी-सी पोटली मन-भर की लगती थी। अपने को कोसता था कि किताबें लेकर क्यों चला। दूसरी ज़बान का इम्तहान देने की तैयारी कर रहा था। मगर छुट्टियों में एक दिन भी तो किताब खोलने की नौबत न आयेगी, खामखाह यह बोझ उठाये चला आता हूँ। ऐसा जी झुंझलाता था कि इस मूर्खता के बोझ को वहीं पटक दूँ। आख़िर टाँगों ने चलने से इनकार कर दिया। एक बार मैं गिर पड़ा और सम्हलकर उठा तो पाँव थरथरा रहे थे। अब बगैर कुछ खाये पैर उठाना दूभर था, मगर यहाँ क्या खाऊँ। बार-बार रोने को जी चाहता था। संयोग से एक ईख का खेत नज़र आया, अब मैं अपने को न रोक सका। चाहता था कि खेत में घुसकर चार-पांच ईख तोड़ लूँ और मज़े से रस चूसता हुआ चलूँ। रास्ता भी कट जायगा और पेट में कुछ पड़ भी जायगा। मगर मेड़ पर पाँवरखा ही था कि कांटों में उलझ गया। किसान ने शायद मेंड़ पर कांटे बिखेर दिये थे। शायद बेर की झाड़ी थी। धोती-कुर्ता सब कांटों में फंसा हुआ, पीछे हटा तो कांटों की झाड़ी साथ-साथ चलीं, कपड़े छुड़ाने लगा तो हाथ में कांटे चुभने लगे। ज़ोर से खींचा तो धोती फट गयी। भूख तो गायब हो गयी, फ़िक्र हुई कि इन नयी मुसीबत से क्योंकर छुटकारा हो। कांटों को एक जगह से अलग करता तो दूसरी जगह चिमट जाते, झुकता तो शरीर में चुभते, किसी को पुकारूँ तो चोरी खुली जाती है, अजीब मुसीबत में पड़ा हुआ था। उस वक़्त मुझे अपनी हालत पर रोना आ गया, कोई रेगिस्तानों की खाक छानने वाला आशिक भी इस तरह कांटों में फंसा होगा! बड़ी मुश्किल से आध घण्टे में गला छूटा मगर धोती और कुर्ते के माथे गयी, हाथ और पाँव छलनी हो गये वह घाते में। अब एक क़दम आगे रखना मुहाल था। मालूम नहीं कितना रास्ता तय हुआ, कितना बाकी है, न कोई आदमी न आदमज़ाद, किससे पूछूँ। अपनी हालत पर रोता हुआ जा रहा था। एक बड़ा गाँव नज़र आया। बड़ी खुशी हुई। कोई न कोई दुकान मिल ही जायगी। कुछ खा लूँगा और किसी के सायबान में पड़ रहूँगा, सुबह देखी जायगी।

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