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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464
आईएसबीएन :978-1-61301-159

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


एक दिन तो मैंने बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे सब्र किया लेकिन दूसरे दिन एक आह के साथ सब्र जाता रहा और मटके की एक मीठी चितवन के साख होश रुख़सत हो गया। मैंने महापाप की भावना के साथ मटके को खोला और हाँडी भर गुड़ निकालकर उसी तरह मटके को बन्द कर दिया और संकल्प कर लिया कि इस हाँड़ी को तीन महीने चलाऊंगा। चले या न चले, मैं चलाये जाऊंगा। मटके को वह सात मंज़िल समझूंगा जिसे रुस्तम भी न खोल सका था। मैंने मटके की पिण्डियों को कुछ इस तरह क़ैंची लगकार रखा कि जैसे बाज दुकानदार दियासलाई की डिब्बियाँ भर देते हैं। एक हाँडी गुड़ खाली हो जाने पर भी मटका मुंहोंमुँह भरा था। अम्माँ को पता ही न चलेगा, सवाल-जवाब की नौबत कैसे आयेगी। मगर दिल और जान में वह खींच-तान शुरू हुई कि क्या कहूँ, और हर बार जीत ज़बान ही के हाथ रहती। यह दो अंगुल की जीभ दिल जैसे शहज़ोर पहलवान को नचा रही थी, जैसे मदारी बन्दर को नचाये-उसको, जो आकाश में उड़ता है और सातवें आसमान के मंसूबे बांधता है और अपने ज़ोम में फ़रऊन को भी कुछ नहीं समझता। बार-बार इरादा करता, दिन-भर में पांच पिंडियों से ज़्यादा न खाऊँ लेकिन यह इरादा शाराबियों की तौबा की तरह घंटे-दो घंटे से ज़्यादा न टिकता। अपने को कोसता, धिक्कारता– गुड़ तो खा रहे हो मगर बरसात में सारा शरीर सड़ जाएगा, गंधक का मलहम लगाये घूमोगे, कोई तुम्हारे पास बैठना भी न पसन्द करेगा! कसमें खाता, विद्या की, मां की, स्वर्गीय पिता की, गऊ की, ईश्वर की, मगर उनका भी वही हाल होता। दूसरा हफ़्ता ख़त्म होते-होते हाँडी भी ख़त्म हो गयी। उस दिन मैं ने बड़े भक्तिभाव से ईश्वर से प्रार्थना की– भगवान्, यह मेरा चंचल लोभी मन मुझे परेशान कर रहा है, मुझे शक्ति दो कि उसको वश में रख सकूं। मुझे अष्टधात की लगाम दो जो उसके मुँह में डाल दूं! यह अभागा मुझे अम्माँ से पिटवाने और घुड़कियाँ खिलवाने पर तुला हुआ है, तुम्हीं मेरी रक्षा करो तो बच सकता हूँ। भक्ति की विह्वलता के मारे मेरी आँखों से दो-चार बूँदें आँसुओं की भी गिरीं लेकिन ईश्वर ने भी इसकी सुनवायी न की और गुड़ की बुभुक्षा मुझ पर छायी रही; यहाँ तक कि दूसरी हाँडी का मर्सिया पढ़ने की नौबत आ पहुँची।

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