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ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :268
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8459
आईएसबीएन :978-1-61301-068

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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…


‘मैं कहता हूँ, चुप रहो!’

‘क्यों चुप रहूँ? अगर एक कहोगे, तो दो सुनोगे।’

‘इसी का नाम पतिव्रत है?’

‘जैसा मुँह होता है, वैसे ही बीड़े मिलते हैं!;

मैं परास्त हो कर बाहर चला आया, और अँधेरी कोठरी में बैठा हुआ, उस मनहूस घड़ी को कोसने लगा, जब इस कुलच्छनी से मेरा विवाह हुआ था। इस अन्धकार में भी दस साल का जीवन सिनेमा चित्रों की भाँति मेरे नेत्रों के सामने दौड़ गया। उसमें कहीं प्रकाश की झलक न थी, कहीं स्नेह की मृदुता न थी।

सहसा मेरे मित्र पंडित जयदेव जी ने द्वार पर पुकारा–अरे, आज यह अँधेरा क्यों कर रखा है जी? कुछ सूझती ही नहीं। कहाँ हो?

मैंने कोई जवाब न दिया। सोचा–यह आज कहाँ से आ कर सिर पर सवार हो गये।

जयदेव ने फिर पुकारा–अरे, कहाँ हो भाई? बोलते क्यों नहीं? कोई घर में है या नहीं?

कहीं से कोई जवाब न मिला।

जयदेव ने द्वार को इतने जोर से झँझोड़ा कि मुझे भय हुआ, कहीं दरवाजा चौखट-बाजू समेत गिर न पड़े। फिर भी मैं बोला नहीं। उनका आना खल रहा था।

जयदेव चले गये। मैंने आराम की साँस ली। बारे शैतान टला, नहीं घंटों सिर खाता।

मगर पाँच ही मिनट में फिर किसी के पैरों की आहट मिली और अब की टार्च के तीव्र प्रकाश से मेरा सारा कमरा भर उठा। जयदेव ने मुझे बैठे देख कर कुतूहल से पूछा–तु कहाँ गये थे जी? घंटों चीखा, किसी ने जवाब तक न दिया। यह आज क्या मामला है! चिराग़ क्यों नहीं जले?

मैंने बहाना किया–क्या जानें, मेरे सिर में दर्द था, दूकान से आ कर लेटा, तो नींद आ गयी।

‘और सोये तो घोड़ा बेचकर, मुर्दो से शर्त लगा कर?’

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