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कहानी संग्रह >> ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह) ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…
दोनों बचपन के सखा वहीं गले मिले।
‘यहाँ कब आये? चलो, घर चलो। भले आदमी, क्या वहाँ आम भी मयस्सप न होते थे।’
हरिधन ने मुसकिरा कर कहा–मँगरू, इन आमों में जो स्वाद है, वह और कहीं के आमों में नहीं है। गाँव का क्या रंग-ढंग है?
मँगरू–सब चैनचान है भैया! तुमने तो जैसे, नाता ही तोड़ लिया। इस तरह कोई अपना गाँव-घर छोड़ देता है? जब से तुम्हारे दादा मरे, सारी गिरस्ती चौपट हो गयी। दो छोटे-छोटे लड़के हैं। उनके किये क्या होता है।
हरिधन–अब उस गिरस्ती से क्या वास्ता है भाई? मैं तो अपना ले-दे चुका। मजूरी तो मिलेगी न? तुम्हारी गैया मैं ही चरा दिया करूँगा; मुझे खाने को देना।
मंगरू ने अविश्वास के भाव से कहा–अरे भैया, कैसी बातें करते हो, तुम्हारे लिए जान हाजिर है। क्या ससुराल में अब न रहोगे? कोई चिन्ता नहीं। पहले तो तुम्हारा घर ही है। उसे सँभालो! छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनको पालो। तुम नयी अम्माँ से नाहक डरते थे। बड़ी सीधी है बेचारी। बस, अपनी माँ समझो। तुम्हें पा कर तो निहाल हो जायगी। अच्छा, घरवाली को भी तो लाओगे?
हरिधन–उसका अब मुँह न देखूँगा। मेरे लिए वह मर गयी।
मँगरू–तो दूसरी सगाई हो जायगी। अब की ऐसी मेहरिया ला दूँगा कि उसके पैर धो कर पियोगे; लेकिन कहीं पहली भी आ गयी तो?
हरिधन–वह न आयेगी।
हरिधन अपने घर पहुँचा तो दोनों भाई, ‘भैया आये। भैया आये!’ कह कर भीतर दौड़े और माँ को खबर दी।
उस घर में कदम रखते ही हरिधन को ऐसी शान्त महिमा का अनुभव हुआ मानो वह अपनी माँ की गोद में बैठा हुआ है। इतने दिनों ठोकरें खाने से उसका हृदय कोमल हो गया था। जहाँ पहले अभिमान था, आग्रह था, हेकड़ी थी, वहाँ अब निराशा थी, पराजय और याचना थी। बीमारी का जोर कम हो चला था, अब उस पर मामूली दवा भी असर कर सकती थी; किले की दीवारें छिद चुकी थीं। अब उसमे घुस जाना असाध्य न था। वही घर जिससे वह एक दिन विरक्त हो गया था, अब गोद फैलाये उसे आश्रय देने को तैयार था। हरिधन का निरावलम्ब मन यह आश्रय पाकर मानों तृप्त हो गया।
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