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कहानी संग्रह >> ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह) ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…
हरिधन ने देखा, उसके दोनों साले और बड़े साले के दोनो लड़के भोजन किये चले जा रहे थे। उसके देह में आग लग गयी। मेरी अब यह नौबत पहुँच गयी कि इन लोगों के साथ बैठ कर खा भी नहीं सकता। ये लोग मालिक हैं। मैं इनकी जूठी थाली चाटने वाला हूँ। मैं इनका कुत्ता हूँ जिसे खाने के बाद एक टुकड़े रोटी डाल दी जाती है। यही घर है जहाँ आज के दस साल पहले कितना आदर-सत्कार होता था। साले गुलाम बने रहते थे। सास मुँह जोहती रहती थी। स्त्री पूजा करती थी। तब उसके पास रुपये थे, जायदाद थी। अब वह दरिद्र है उसकी सारी जायदाद को इन्हीं लोगों ने कूड़ा कर दिया। अब उसे रोटियों के भी लाले हैं। उसके जी में एक ज्वाला-सी उठी कि इस वक्त अन्दर जा कर सास और साली को भिगो भिगो कर लगाये; पर जब्त कर के रह गया। पड़े-पड़े बोला–मुझे भूख नहीं है। आज न खाऊँगा।
गुमानी ने कहा–न खाओगे मेरी बला से, हाँ नहीं तो!
खाओगे, तुम्हारे ही पेट में जायगा, कुछ मेरे पेट में थोड़े ही चला जायगा।
हरिधन का क्रोध आँसू बन गया। यह मेरी स्त्री है, जिसके लिए मैंने अपना सर्वस्व मिट्टी में मिला दिया। मुझे उल्लू बना कर यह सब अब निकाल देना चाहते हैं। वह अब कहाँ जाय! क्या करे!
उसकी सास आ कर बोली–चल कर खाना क्यों नहीं खा लेते जी, रूठते किस पर हो? यहाँ तुम्हारे नखरे सहने का किसी में बूता नहीं है। जो देते हो वह मत देना और क्या करोगे। तुमसे बेटी ब्याही है, कुछ तुम्हारी जिन्दगी का ठीका नहीं लिया है।
हरिधन ने मर्माहित हो कर कहा–हाँ अम्माँ, मेरी भूल थी कि मैं यही समझ रहा था। अब मेरे पास क्या है कि तुम मेरी जिन्दगी का ठीका लोगी। जब मेरे पास भी धन था तब कुछ आता था। अब दरिद्र हूँ, तुम क्यों बात पूछोगी।
बूढ़ी सास भी मुँह फुला कर भीतर चली गयी।
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