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कहानी संग्रह >> ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह) ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…
जोखू ने मानो बन्धन में पड़ कर कहा–अच्छा, बैठ गया, कहो क्या कहती हो?
प्यारी ने विनोद करते हुए पूछा–कहना क्या है, मैं तुमसे पूछती हूँ, अपनी सगाई क्यों नहीं कर लेते? अकेली मरती हूँ। तब एक से दो हो जाऊँगी।
जोखू शरमाता हुआ बोला–तुमने फिर वही बेबात की बात छेड़ दी, मालकिन! किससे सगाई कर लूँ यहाँ? मैं ऐसी मेहरिया लेकर क्या करूँगा, जो गहनों के लिए मेरी जान खाती रहे।
प्यारी–यह तो तुमने बड़ी कड़ी शर्त लगायी। ऐसी औरत कहाँ मिलेगी, जो गहने भी न चाहे?
जोखू–यह मैं थोड़े ही कहता हूँ कि वह गहने न चाहे; हाँ, मेरी जान न खाय। तुमने तो कभी गहनों के लिए हठ न किया; बल्कि अपने सारे गहने दूसरों के ऊपर लगा दिये।
प्यारी के कपोलों पर हल्का-सा रंग आ गया। बोली–अच्छा, और क्या चाहते हो?
जोखू–मैं कहने लगूँगा, तो बिगड़ जावगी।
प्यारी की आँखों में लज्जा की एक रेखा नजर आयी, बोली–बिगड़ने की बात कहोगे, तो जरूर बिगडूँगी।
जोखू–तो मैं न कहूँगा।
प्यारी ने उसे पीछे की ओर ढकेलते हुए कहा–कहोगे कैसे नहीं, मैं कहला के छोड़ूँगी।
जोखू–मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हारी तरह हो, ऐसी गम्भीर हो, ऐसी ही बातचीत में चतुर हो, ऐसा ही अच्छा खाना पकाती हो, ऐसी ही किफायती हो, ऐसी ही हँसमुख हो। बस, ऐसी औरत मिलेगी, तो करूँगा, नहीं इसी तरह पड़ा रहूँगा।
प्यारी का मुख लज्जा से आरक्त हो गया। उसने पीछे हटकर कहा–तुम बड़े नटखट हो! हँसी-हँसी में सब कुछ कह गये।
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