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ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :268
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8459
आईएसबीएन :978-1-61301-068

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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…


प्या री उसकी सरलता पर हँस कर बोली–अरे, तो मैं तुझे कुछ कह थोड़ी रही हूँ, पागल। मैं तो कहती हूँ कि जान रख कर काम कर। कहीं बीमार पड़ गया, तो लेने के देने पड़ जायँगे।

जोखू–कौन ‍बीमार पड़ जायगा, मैं? बीस साल में कभी सिर तक तो दुखा नहीं; आगे की नहीं जानता। कहो रात-भर काम करता रहूँ।

प्या री–मैं क्या़ जानूँ, तुम्हींी अँतरे दिन बैठे रहते थे, और पूछा जाता था, तो कहते थे–जुर आ गया था, पेट में दरद था।

जोखू झेंपता हुआ बोला–वह बातें जब थीं, जब मालिक लोग चाहते थे कि इसे पीस डालें। अब तो जानता हूँ, मेरे ही माथे हैं। मैं न करूँगा तो सब चौपट हो जायगा।

प्यारी–मैं क्या देख-भाल नहीं करती?

जोखू–तुम बहुत करोगी, दो बेर चली जाओगी। सारे दिन तुम वहाँ बैठी नहीं रह सकतीं।

प्यारी को उसके निष्कपट व्यवहार ने मुग्ध कर दिया। बोली–तो इतनी रात गये चूल्हा जलाओगे। कोई सगाई क्यों नहीं कर लेते?

जोखू ने मुँह धोते हुए कहा–तुम भी खूब कहती हो मालकिन! अपने पेट-भर को तो होता नहीं, सगाई कर लूँ! सवा सेर खाता हूँ एक जून–पूरा सवा सेर! दोनों जून के लिए दो सेर चाहिए।

प्यारी–अच्छा, आज मेरी रसोई में खाओ, देखूँ कितना खाते हो?

ज़ोखू ने पुलकित हो कर कहा–नहीं मालकिन, तुम बनाते-बनाते थक जाओगी। हाँ, आध-आध सेर के दो रोटा बनाकर खिला दों, तो खा लूँ। मैं तो यही करता हूँ। बस, आटा सान कर दो लिट बनाता हूँ ओर उपले पर सेंक लेता हूँ। कभी मठे से, कभी नमक से, कभी प्याज से खा लेता हूँ ओर आ कर पड़ रहता हूँ।

प्यारी–मैं तुम्हे आज फूलके खिलाऊँगी।

जोखू–तब तो सारी रात खाते ही बीत जायगी।

प्यारी–बको मत, चटपट आकर बैठ जाओ।

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