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गल्प समुच्चय (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8446
आईएसबीएन :978-1-61301-064

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गल्प-लेखन-कला की विशद रूप से व्याख्या करना हमारा तात्पर्य नहीं। संक्षिप्त रूप से गल्प एक कविता है


रोगिणी ने कराहते हुए कहा–‘राजा बाबू, तुम दीनबन्धु हो; इसलिए ईश्वर पूज्य हो। मैं आपसे लज्जा छोड़कर कुछ कहना चाहती हूँ। आशा है, इसके लिए तुम मुझको क्षमा करोगे। संसार में मैंने किसी का एहसान नहीं उठाया; पर मरते समय तुम्हारे एहसान के नीचे मुझे दबना पड़ा। इसलिए ईश्वर तुम्हारा...यह कहते-कहते रोगिणी के नेत्रों में आँसू भर आये।

राजा बाबू ने बड़ी नम्रता से कहा–‘माँजी, आप तबियत को भारी न कीजिए। मैं आपकी सेवा के लिए तैयार हूँ। आप निस्संकोच आज्ञा कीजिये; पर पहले रोग का हाल तो कहिए।’

‘डाक्टर साहब, रोग का हाल कुछ नहीं। समय पूरा हो गया है। अब मैं आपसे जो कुछ कहना चाहती हूँ, उसे सुन लीजिए। सरला जो आपके पीछे खड़ी हुई है- मेरी एकमात्र कन्या है। यह अब अनाथ होती है। इसको मैं आपके सुपुर्द करती हूँ। इसका विवाह मैं न कर सकी; इसलिए मुझे आपसे इतनी बड़ी भिक्षा माँगनी पड़ी। यह घर के काम-काज में होशियार है। जो कुछ मैं जानती थी और बता सकती थी, उनकी शिक्षा मैंने इसको दे दी है। यह आपकी सेवा करेगी। मुझे पूर्ण आशा है कि यह आपको प्रसन्न रक्खेगी। समय आने पर आप इसका किसी पढ़े-लिखे ब्राह्मण-वर के साथ विवाह कर दें। बस मेरी यही प्रार्थना है। और हाँ, यह एक पैकेट है, जिसमें दो लिफाफे हैं। इनको आप मेरी मृत्यु के एक वर्ष बाद जब चाहें पढ़ें। उनमें मेरा परिचय है–जिसको बताने की और आपको जानने की इस समय जरूरत नहीं। दूसरों का उपकार करने वाले सदा संकट में ही रहते हैं। अप भी परोपकाररत हैं; इसलिए आपको भी बे-वास्ते इन संकटों में पड़ना पड़ा।’

इस प्रकार कहते-कहते उसका गला भर आया।

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