चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

छठवाँ बयान

आज बहुत दिनों के बाद हम कमला को आधी रात के समय रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर पूरब तरफ़ वाले जंगल में घूमते देख रहे हैं। यहाँ से किले की दीवार बहुत दूर और ऊँचे पर है। कमला न मालूम किस फिक्र में है या क्या ढूँढ़ रही है। यद्यपि रात चाँदनी थी, परन्तु ऊँचे-ऊँचे और घने पेड़ों के कारण जंगल में एक प्रकार से अन्धकार ही था। घूमते-घूमते कमला के कानों में किसी के पैर की आहट मालूम हुई, वह रुकी और एक पेड़ की आड़ में खड़ी होकर दाहिनी तरफ़ देखने लगी, जिधर से आहट मिली थी, दस-पन्द्रह कदम की दूरी पर दो आदमी जाते हुए दिखायी पड़े, बात और चाल से दोनों औरते मालूम पड़ीं। कमला भी पैर दबाये और अपने को हर तरह से छिपाये, उन्हीं दोनों के पीछे-पीछे धीरे-धीरे रवाना हुई। लगभग आध कोस जाने के बाद ऐसी जगह पहुँची, जहाँ पेड़ बहुत कम थे, बल्कि उसे एक प्रकार से मैदान ही कहना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी दूर पर पत्थर के बड़े-बड़े अनगढ़ ढोंके पड़े हुए थे, जिनकी आड़ में कई आदमी छिप सकते थे। सघन पेड़ों की आड़ में से निकलकर मैदान में कई कदम जाने के बाद वे दोनों अपने ऊपर से स्याह चादर उतार कर एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गयीं। कमला ने भी अपने को बड़ी चालाकी से उन दोनों के करीब पहुँचाया और एक पत्थर की आड़ में छिपकर उन दोनों की बातचीत सुनना चाही। चन्द्रमा अपनी पूर्ण किरणों से उदय हो रहे थे और निर्मल चाँदनी इस समय अपना पूरा जोबन दिखा रही थी, हरेक चीज़ अच्छी तरह और साफ़ नज़र आती थी। जब दोनों औरते चादर उतारकर पत्थर की चट्टान पर बैठ गयीं तब कमला ने उनकी सूरत देखी, बेशक, वे दोनों नौजवान औरते थीं, जिनमें से एक तो बहुत ही हसीन थी और दूसरी के विषय में कह सकते हैं कि शायद कोई लौंडी या ऐयारा हो।

कमला बड़े गौर से उन दोनों औरतों की तरफ़ देख रही थी कि इतने ही में सामने से एक लम्बे कद का आदमी आता हुआ दिखायी पड़ा जिसे देखकर कमला चौंकी और उस समय तो कमला का कलेजा बेहिसाब धड़कने लगा, जब वह आदमी उन दोनों औरतों के पास आकर खड़ा हो गया और उनसे डपटकर बोला, "तुम दोनों कौन हो?" उस आदमी का चेहरा चन्द्रमा के सामने था, विमल चाँदनी उसके नक्शे को अच्छी तरह दिखा रही थी, इसलिए कमला ने उसे तुरन्त पहिचान लिया और उसे विश्वास हो गया कि वह लम्बे कद का आदमी वही है, जो खँडहर वाले तहख़ाने के अन्दर शेरसिंह से मिलने गया था और जिसे देख उनकी अजब हालत हो गयी थी तथा ज़िद्द करने पर भी उन्होंने न बताया कि यह आदमी कौन है।

कमला ने अपने धड़कते हुए कलेजे को बायें हाथ से दबाया और गौर से देखने लगी कि अब क्या होता है। यद्यपि कमला उन दोनों औरतों से बहुत दूर न थी और इस रात के सन्नाटे में उनकी बातचीत बखूबी सुन सकती थी, तथापि उसने अपने को बड़ी सावधानी से उस तरफ़ लगाया और सुनना चाहा कि दोनों औरतों और लम्बे व्यक्ति में क्या बातचीत होती है।

उस आदमी के डपटते ही ये दोनों औरते चैतन्य होकर खड़ी हो गयीं और उनमें से एक ने जो सरदार मालूम होती थी, जवाब दिया।

औरत : (अपने कमर से खँजर निकालकर) हम लोग अपना परिचय नहीं दे सकतीं और न हमें यही पूछने से मतलब कि तुम कौन हो?

आदमी : (हँसकर) तू क्या समझती है कि मैं तुझे नहीं पहिचानता? मुझे खूब मालूम है कि तेरा नाम ग़ौहर है, मैं तेरी सात पुश्तों को जानता हूँ, मगर आजमाने के लिए पूछता था कि देखूँ तू अपना सच्चा हाल मुझे कहती है या नहीं! क्या कोई अपने को भूतनाथ से छिपा सकता है?

'भूतनाथ' नाम सुनते ही वह औरत घबड़ा गयी, डर से बदन काँपने लगा और खंजर उसके हाथ से गिर पड़ा। उसने मुश्किल से अपने को सम्हाला और हाथ जोड़कर बोली, "बेशक मेरा नाम ग़ौहर है, मगर…"

भूतनाथ : तू यहाँ क्यों घूम रही है? शायद इस फिक्र में है कि इस किले में पहुँचकर आनन्दसिंह से अपना बदला ले!

ग़ौहर : (डरी हुयी आवाज़ से) जी हाँ।

भूतनाथ : पहिले भी तो तू उन्हें फँसा चुकी थी, मगर उनका ऐयार देवीसिंह उन्हें छुड़ा ले गया। हाँ, तेरी छोटी बहन कहाँ है?

ग़ौहर : वह तो गया की रानी माधवी के हाथ से मारी गयी।

भूतनाथ : कब?

ग़ौहर : जब वह इन्द्रजीतसिंह को फँसाने के लिए चुनारगढ़ के जंगल में गयी थी, तो अपनी छोटी बहन को साथ लेकर आनन्दसिंह की धुन में उसी जंगल में गयी हुई थी। दुष्टा माधवी ने व्यर्थ ही मेरी बहन को मार डाला। जब वह जंगल काटा गया तो बीरेन्द्रसिंह के आदमी लोग उसकी लाश उठाकर चुनार ले गये थे, मगर (अपनी साथिन की तरफ़ इशारा करके) बड़ी चालाकी से यह ऐयारा उस लाश को उठा लायी थी।* (*देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, पहिला भाग, चौथा बयान।)

भूतनाथ : हाँ ठीक है, अच्छा तो तू इस किले में घुसा चाहती है और आनन्दसिंह की जान लिया चाहती है।

ग़ौहर : यदि आप आप्रसन्न न हों तो।

भूतनाथ : मैं क्यों अप्रसन्न होने लगा? मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है कि मना करूँ। जो तेरा जी चाहे कर। अच्छा, अब मैं जाता हूँ लेकिन एक दफे फिर तुझसे मिलूँगा।

वह आदमी तुरत चला गया और देखते-देखते नज़रों से गायब हो गया। इसके बाद उन दोनों औरतों में बातचीत होने लगी।

ग़ौहर : गिल्लन, इसकी सूरत देखते ही मेरी जान निकल गयी थी, न मालूम यह कम्बख्त कहाँ से आ गया।

गिल्लन : तुम्हारी तो बात ही दूसरी है, मैं ऐयारा होकर अपने को सम्हाल न सकी, देखो अभी तक कलेजा धड़-धड़ करता है।

ग़ौहर : मुझको तो यही डर लगा हुआ था कि कहीं वह मुझे आनन्दसिंह से बदला लेने के बारे में मना न करे।

गिल्लन : सो तो उसने न किया मगर एक दफे मिलने के लिए कह गया है, अच्छा अब यहाँ ठहरना मुनासिब नहीं।

वे दोनों औरतें अर्थात ग़ौहर तथा गिल्लन वहाँ से चली गयीं और कमला ने भी एक तरफ़ का रास्ता लिया। दो घण्टे के बाद कमला उस कब्रिस्तान में पहुँची जो रोहतागसगढ़ के तहख़ाने में आने-जाने का रास्ता था। इस समय चन्द्रमा अस्त हो चुका था और कब्रिस्तान में भी सन्नाटा था। कमला बीच वाली कब्र के पास गयी और तहख़ाने में जाने के लिए दरवाज़ा खोलने लगी, मगर खुल न सका। आधे घण्टे तक वह इसी फिक्र में लगी रही पर कोई काम न चला, लाचार उठ खड़ी हुयी और कब्रिस्तान के बाहर की तरफ़ चली। फाटक के पास पहुँचते ही वह अटकी, क्योंकि सामने ही की तरफ़ थोड़ी दूर पर कोई चमकती हुई चीज़ उसे दिखायी पड़ी, जो इसी तरफ़ बढ़ी आ रही थी। आगे जाने पर मालूम हुआ कि यह बिजली की तरह चमकने वाली चीज़ एक नेजा है, जो किसी औरत के हाथ में है। वह नेजा कभी तेज के साथ चमकता है और इस सबब से दूर-दूर तक चीज़ें दिखायी भी देती हैं और कभी-कभी उसकी चमक बिल्कुल ही जाती रहती और यह भी नहीं मालूम होता कि नेजा या नेजे को हाथ में रखने वाली औरत कहाँ है। थोड़ी देर में वह औरत इस कब्रिस्तान के बहुत पास आ गयी और नेजे की चमक ने कमला को उस औरत की शक्ल-सूरत अच्छी तरह दिखा दी। उस औरत का रंग स्याह था, सूरत डरावनी और बड़े-बड़े दो-तीन दाँत मुँह के बाहर निकले हुए थे, काली साड़ी पहिने हुए वह औरत पूरा राक्षसी मालूम होती थी। यद्यपि कमला ऐयारा बहुत अधिक दिलेर थी, मगर इसकी सूरत देखते ही थर-थर काँपने लगी। उसने चाहा कि कब्रिस्तान के बाहर निकलकर भाग जाय, मगर वह इतना डर गयी थी कि पैर न उठा सकी। देखते-ही-देखते वह भयंकर मूर्ति कमला के सामने आकर खड़ी हो गयी और कमला को डर के मारे काँपते देखकर बोली, "डर मत होश ठिकाने कर, और जो कुछ भी मैं कहती हूँ ध्यान देकर सुन!"

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