चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

चौथा बयान

अब तो मौसम में फर्क पड़ गया। ठण्डी-ठण्डी हवा जो कलेजे को दहला देती थी और बदन में कँपकँपी पैदा करती थी, अब भली मालूम पड़ती है। वह धूप जिसे देख चित्त प्रसन्न होता था और जो बदन में लगकर रग-रग से सर्दी निकाल देती थी अब बुरी मालूम होती है। यद्यपि अभी आसमान पर बादल के टुकड़े दिखायी नहीं देते तथापि सन्ध्या के समय मैदान, बाग और तराई की ठण्डी-ठण्डी और शीतल तथा मन्द-मन्द वायु सेवन करने को जी चाहता है। वहाँ से हिलते हुए पेड़ों की कोमल-कोमल पत्तियों की बहार आँखों की राह घुसकर अन्दर से दिल को अपनी तरफ़ खैंच लेती है तथा टकटकी बँधी हुई आँखों को दूसरी तरफ़ देखने का यकायक मौका नहीं मिलता। यद्यपि सूर्य अस्त हुआ ही चाहता है और आसमान पर उड़नेवाले परिन्दों के उतार और ज़मीन की तरफ़ झुके हुए एक ही तरफ़ उड़े जाने से मालूम होता है कि बात-की-बात में चारों तरफ़ अँधेरा छा जायगा तथापि हम अपने पाठकों को किसी पहाड़ की तराई में ले चलकर एक-एक अनूठा रहस्य दिखाया चाहते हैं।

तीन तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और बीच में कोसों तक का मैदान रमणीक तो है परन्तु रात की अवाई और सन्नाटे ने उसे भयानक बना दिया है। सूर्य अस्त होने में अभी विलम्ब है,परन्तु ऊँचे-ऊँचे पहाड़ सूर्य की आख़िरी लालिमा को इस मैदान में पहुँचने नहीं देते। चारों तरफ़ सन्नाटा है, जहाँ तक निगाह काम करती है, इस मैदान में आदमी की सूरत दिखायी नहीं पड़ती, हाँ पश्चिम तरफ़वाले पहाड़ के नीचे एक छोटा चमड़े का खेमा दिखायी पड़ता है। इस समय हमें इसी खेमे से मतलब है और हम इसी के दरवाज़े पर पहुँचकर अपना काम निकाला चाहते हैं।

इस खेमे के दरवाज़े पर केवल एक आदमी कमर में खंजर लगाये टहल रहा है। यद्यपि इसकी जवानी ने इसका साथ छोड़ दिया है और फिक्र ने इसे दुर्बल कर दिया है मगर फुर्ती मज़बूती और दिलेरी ने अभी तक इसके साथ दुश्मनी नहीं की और वे इस गयी गुजरी हालत में भी इसका साथ दिये जाती हैं। इस आदमी की सूरत शक्ल के बारे में हमें कुछ विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारे पाठक इसे पहिचानते हैं और जानते हैं कि इसका नाम 'भूतनाथ' है।

भूतनाथ को खेमे के दरवाज़े पर टहलते हुए देर हो गयी। वह न मालूम किस सोच में डूबा हुआ था कि सिर नीचा किये हुए सिवाय टहलने के इधर-उधर देखने की उसे बिल्कुल फुरसत न थी, हाँ कभी-कभी वह सिर उठाता और एक लम्बी साँस लेकर केवल उत्तर की तरफ़ देखता और सिर नीचा कर फिर उसी तरह टहलने लगता। अब सूर्य ने अपना मुँह अच्छी तरह ज़मीन के पर्दे में छिपा लिया और भूतनाथ ने कुछ बेचैन होकर उत्तर की तरफ़ देख धीरे से कहा, "अब तो बहुत ही विलम्ब हो गया, क्या बेमौके जान आफ़त में फँसी है।"

यकायक तेजी के साथ घोड़ा दौड़ाता हुआ एक सवार उत्तर की तरफ़ से आता हुआ दिखायी पड़ा। कुछ और पास आने से मालूम हो गया कि वह औरत है मगर सिपाहियाना ठाठ में, ढाल तलवार के सिवाय उसके पास कोई हर्बा न था। इस औरत की उम्र लगभग चालीस वर्ष की होगी। सूरत शक्ल से मालूम होता था कि किसी समय में यह बहुत ही हसीन और दिललुभाने वाली रही होगी। बात-की-बात में यह औरत खेमे के पास आ पहुँची और घोड़े से उतरकर, उसकी लगाम खेमे की एक डोरी से अटका देने के बाद, भूतनाथ के पास आकर बोली, "शाबाश भूतनाथ, बेशक तुम वादे के सच्चे हो।"

भूतनाथ : मगर अभी तक मेरी समझ में यह न आया कि तुम मुझसे दुश्मनी रखती हो या दोस्ती।

औरत : (हँसकर) अगर तुम ऐसे ही समझदार होते तो जीते-जागते और निरोग रहने पर भी मुर्दों में क्यों गिने जाते?

भूतनाथ : (कुछ सोचकर) ख़ैर, जो हुआ सो हुआ, अब मुझसे क्या चाहती हो?

औरत : तुमसे एक काम कराया चाहती हूँ।

भूतनाथ : वह कौन काम है, जिसे तुम स्वयं नहीं कर सकतीं?

औरत : केवल यही एक काम!

भूतनाथ : (आश्चर्य की रीति से गर्दन हिलाकर) ख़ैर, कहो तो सही, करने लायक होगा तो करूँगा।

औरत : मैं खूब जानती हूँ कि तुम उस काम को सहज ही में कर सकते हो।

भूतनाथ : तब कहने में देर क्यों करती हो?

औरत : अच्छा सुनो, यह तो जानते ही हो कि कमलिनी को ईश्वर ने अद्भुत बल दे रक्खा है।

भूतनाथ : हाँ, बेशक उसमें कोई दैवी शक्ति है, वह जो कुछ चाहे सो कर सकती है। जो कोई उसे जानता है, वह कहेगा कि कमलिनी को कोई जीत नहीं सकता।

औरत : हाँ, ठीक है परन्तु मैं खूब जानती हूँ कि तुम कमलिनी से ज़्यादे ताकत रखते हो।

भूतनाथ : (चौंक और काँपकर) इसका क्या मतलब?

औरत : यही मतलब कि तुम अगर चाहो तो उसे मार सकते हो।

भूतनाथ : मगर मैं ऐसा क्यों करने लगा?

औरत : केवल मेरी आज्ञा से।

इतना सुनते ही भूतनाथ के चेहरे पर मुर्दनी छा गयी, उसका कलेजा काँपने लगा और सिर कमजोर होकर चक्कर खाने लगा, यहाँ तक कि वह अपने को सँभालकर न सका और ज़मीन पर बैठ गया। मालूम होता था कि उस औरत की आख़िरी बात ने उसका खून निचोड़ लिया है। न मालूम क्या सबब था कि निडर होकर भी एक साधारण और अकेली औरत की बातों का वह जवाब नहीं दे सकता और उसकी सूरत से मजबूरी और लाचारी झलक रही है।

भूतनाथ की ऐसी अवस्था देखकर उस औरत को किसी तरह का रंज नहीं हुआ बल्कि वह मुस्करायी और उसी जगह घास पर बैठकर न मालूम क्या सोचने लगी। थोड़ी देर बाद जब भूतनाथ का जी ठिकाने हुआ तो उसने उस औरत की तरफ़ देखा और हाथ जोड़कर कहा, "क्या सचमुच मुझे ऐसा हुक्म लगाया जाता है?"

औरत : हाँ, कमलिनी का सिर लेकर मेरे पास हाजिर होना पड़ेगा और यह काम सिवाय तेरे और कोई भी नहीं कर सकता, क्योंकि वह तुझ पर विश्वास रखती है।

भूतनाथ : (कुछ सोचकर) नहीं नहीं, मेरे किये यह काम न होगा। जो कुछ कर चुका हूँ, उसी के प्रायश्चित से आज तक छुट्टी नहीं मिलती।

औरत : क्या तू मेरा हुक्म टाल सकता है? क्या तुझमें इतनी ताकत है?

यह सुन भूतनाथ बहुत ही बेचैन हुआ। वह उठ खड़ा हुआ और सिर नीचा किये इधर-उधर टहलने और नीचे लिखी बातें धीरे-धीरे बोलने लगा—

"आह मुझ-सा बदनसीब भी दुनिया में कोई न होगा। मुद्दत तक मुर्दों में अपनी गिनती करायी, अब ऐसा संयोग हो गया कि अपने को जीता-जागता साबित करूँ, मगर अफसोस, करी-करायी मेहनत मिट्टी हुआ चाहती है। हाय, उस आदमी के साथ, जिसमें नेकी कूट-कूटकर भरी है, मैं बदी करने के लिए मजबूर किया जा रहा हूँ। क्या उसके साथ बदी करनेवाला कभी सुख भोग सकता है? नहीं नहीं, कभी नहीं, फिर मैं ऐसा क्यों करूँ? मगर मेरी जान क्योंकर बच सकती है, इसका हुक्म न मानना मेरी कुदरत के बाहर है। हाय, एक दफे की भूल जन्म-भर के लिए दुःखदायी हो जाती है। शेरसिंह सच कहता था, इन्हीं बातों को सोचकर उसने मेरा नाम 'काल' रख दिया था और उसे मेरी सूरत से घृणा हो गयी थी। (कुछ देरतक चुप रहकर) ओफ, मैं भी व्यर्थ के विचार में पड़ा हूँ, आख़िर जान तो जायेगी ही, इसका हुक्म मानूँगा तो भी मारा जाऊँगा और यदि न मानूँगा तो भी मौत की तकलीफ उठाऊँगा और तमाम दुनिया में मेरी बुराई फैलेगी। (चौंककर) राम राम, मुझे क्या हो गया जो...

भूतनाथ : (उस औरत की तरफ़ देखकर) अच्छा मैं कमलिनी को मारने के लिए तैयार हूँ, मगर इसके बदले में मुझे इनाम क्या मिलेगा?

औरत : (हँसकर) तू इस लायक नहीं है कि तुझे इनाम दिया जाय।

भूतनाथ : क्या मैं इस दर्जे को पहुँच गया?

औरत : बेशक।

भूतनाथ : नहीं, कभी नहीं! जा मैं तेरा हुक्म नहीं मानता, देखूँ तू मेरा क्या कर लेती है!

औरत : भूतनाथ, देख खूब सोचकर कोई बात मुँह से निकाल, ऐसा न हो कि अन्त में पछताना पड़े।

भूतनाथ : जा जा, जो करते बने कर ले।

भूतनाथ की आख़िरी बात सुनकर वह औरत क्रोध में आकर काँपने लगी। उसके होंठ काँप रहे थे, मगर कुछ कहना मुश्किल हो रहा था।

इस समय चारों तरफ़ अँधेरा छा चुका था अर्थात् रात बखूबी हो चुकी थी। थोड़ी देर के लिए दोनों आदमी चुप हो गये, यकायक घोड़ों के टापों की आवाज़ (जो बहुत दूर से आ रही थी) भूतनाथ के कान में पड़ी और साथ ही इसके वह औरत भी बोल उठी, "अच्छा देख मैं तेरी ढिठाई का मजा चखाती हूँ।"

भूतनाथ पहिले तो कुछ घबड़ाया मगर उसने तुरत ही अपने को सँभाला और कमर से खंजर निकालकर उस औरत के सामने खड़ा हो गया। वह खंजर वही था, जो कमलिनी ने उसे दिया था। कब्ज़ा दबाते ही खंजर में से बिजली की चमक पैदा हुई जिसके सबब से उस औरत की आँखें बन्द हो गयीं और वह बावली-सी हो गयी तथा उस समय तो उसे तनो-बदन की सुध न रही, जब भूतनाथ ने खंजर उसके बदन में छुला दिया।

भूतनाथ ने बड़ी होशियारी से उस बेहोश औरत को उसके घोड़े पर लादा और आप भी उसी पर सवार हो तेजी के साथ मैदान का रास्ता लिया। थोड़ी दूर जाकर भूतनाथ ने बेहोशी की तेज़दवा उसे सुँघायी जिससे वह औरत बहुत देर के लिए मुर्दे के-की सी हो गयी। हमको इससे कोई मतलब नहीं कि वे सवार, जिनके घोड़ों के टापों की आवाज़ भूतनाथ के कान में पड़ी थी, कौन थे और उन्होंने वहाँ पहुँचकर क्या किया, जहाँ से भूतनाथ उस औरत को ले भागा था, हम केवल भूतनाथ के साथ चलते हैं, जिसमें उस औरत का और भूतनाथ का हाल मालूम हो।

यद्यपि रात अँधेरी और रास्ता पथरीला था, तथापि भूतनाथ ने चलने में कसर न की। थोड़ी-थोड़ी दूर पर घोड़ा ठोकर खाता था, जिससे भूतनाथ को तकलीफ होती थी और वह बड़ी मुश्किल से उस बेहोश औरत को सँभाले लिये जाता था मगर यह तकलीफ ज़्यादे देर के लिए न थी क्योंकि पहर-भर के बाद आसमान पर कुदरती माहताबी जलने लगी और उसकी (चन्द्रमा की) रोशनी ने चारों तरफ़ ठण्ढक और खूबसूरती के साथ उजाला कर दिया। ऐसी अवस्था में भूतनाथ ने रुकना उचित न समझा और सवेरा होने तक तेजी के साथ बराबर चला गया। जिस समय आसमान पर सुबह की सुफेदी फैल रही थी, घोड़े ने यहाँ तक हिम्मत हार दी कि दस कदम भी चलना उसके लिए कठिन हो गया। लाचार भूतनाथ घोड़े से नीचे उतरा और उस औरत को भी उतार लिया।

घोड़ा उसी समय ज़मीन पर गिर पड़ा, मगर भूतनाथ ने उसकी कुछ परवाह न की।

कमर से चादर खोल उसने औरत की गठरी बाँधी और पीठ पर लाद आगे का रास्ता लिया।

पहर-भर चले जाने के बाद भूतनाथ एक ऐसी पहाड़ी के नीचे पहुँचा, जिसकी ऊँचाई बहुत ज़्यादे न थी, मगर खुशनुमा और सायेदार दरख्त पहाड़ी के ऊपर तथा उसकी तराई में बहुत थे। पहाड़ी की चोटी पर सलई का एक ऊँचा पेड़ था और उसके ऊपर लम्बी काँडी में लगा हुआ एक लाल फरहरा (ध्वजा) दूर से दिखायी दे रहा था। यह निशान कमलिनी का लगाया हुआ था। भूतनाथ तारा और नानक से मिलने के लिए कमलिनी ने एक यह जगह भी मुकर्रर की थी और निश्चय कर रक्खा था कि जब इन चारों में किसी को किसी से मिलने की आवश्यकता पड़े तो वह इसी जगह आवे और यदि किसी से मुलाकात न हो तो इस झण्डे को झुका दे और उन चारों में से जो कोई इस झण्डे को झुका हुआ देखे, तुरत इस पहाड़ी के नीचे आवे और नियत स्थान पर अपने साथी को ढूँढे़। यह फरहरा बहुत दूर से दिखायी देता था और यह पहाड़ी रोहतासगढ़ और गयाजी के बीच में पड़ती थी।

उस औरत को पीठ पर लादे हुए भूतनाथ पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगा। लगभग दो सौ कदम जाने के बाद रास्ता छोड़कर दाहिनी तरफ़ घूमा, जिधर छोटे-छोटे जंगली पेड़ों की गुंजान झाड़ी दूर तक चली गयी थी। उस झाड़ी में आदमी बखूबी छिप सकता था अर्थात् उस झाड़ी के पेड़ यद्यपि छोटे थे, परन्तु आदमी की ऊँचाई से उन पेडों की ऊँचाई कुछ ज़्यादे थी। भूतनाथ दोनों हाथ से पेड़ों को हटाता हुआ कुछ दूर तक चला गया। आख़िर उसे एक गुफा मिली जिसका मुँह जंगली लताओं ने अच्छी तरह ढाँक रक्खा था। भूतनाथ उस गुफा के अन्दर चला गया और अपना बोझ अर्थात् उस औरत को गुफा के अन्दर छोड़ बाहर निकल आया। इसके बाद पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गया और सलई के पेड़ पर चढ़कर लाल फरहरे झण्डे को झुकाने का इरादा किया, परन्तु उसी समय सलई के पेड़ पर चढ़ी हुई कमलिनी उसे दिखायी पड़ी जो फरहरा झुकाने का उद्योग कर रही थी। इस समय भी कमलिनी उसी राक्षसी के भेष में थी, जैसा कि ऊपर के बयानों में लिख आये हैं। भूतनाथ ने कमलिनी को पहिचाना और उसने भी भूतनाथ को देखा। कमलिनी पेड़ के नीचे उतर आयी और बोली—

कमलिनी : खूब पहुँचे, मैं तुमसे मिलना चाहती थी, इसीलिए झण्डा झुकाने का उद्योग कर रही थी।

भूतनाथ : मैं खुद तुमसे मिला चाहता था और इसीलिए यहाँ तक आया हूँ, यदि इस समय तुम न मिलती तो मैं इस पेड़ पर चढ़कर फरहरा झुकाता।

कमलिनी : कहो क्या बात है और कौन-सी ज़रूरत आ पड़ी?

भूतनाथ : पहिले तुम कहो कि मुझसे मिलने की क्या आवश्यकता थी।

कमलिनी : नहीं नहीं, पहिले तुम्हारा हाल सुन लूँगी तब कुछ कहूँगी क्योंकि, तुम्हारे चेहरे पर घबराहट और उदासी हद से ज़्यादे पायी जाती है।

भूतनाथ: बेशक ऐसा ही है और मैं तुमसे आख़िरी मुलाकात करने आया हूँ क्योंकि अब जीने की उम्मीद नहीं रही और खुली बदनामी, बल्कि कलंक मंजूर नहीं।

कमलिनी : क्यों क्यों, ऐसी क्या आफ़त आ गयी, कुछ कहो तो सही?

भूतनाथ : मेरे साथ पहाड़ी के नीचे चलो। मैं एक औरत को बेहोश करके लाद लाया हूँ, जो उसी खोह के अन्दर है, पहिले उसे देख लो तब मेरा हाल सुनो।

कमलिनी : ख़ैर, ऐसा ही सही, चलो।

भूतनाथ के साथ-ही-साथ कमलिनी पहाड़ी के नीचे उतरी और उस खोह के मुहाने पर आकर बैठ गयी, जिसके अन्दर भूतनाथ ने उस औरत को रक्खा था। भूतनाथ उस बेहोश औरत को खोह के बाहर निकाल लाया। कमलिनी उस औरत को देखते ही चौंकी और उठ खड़ी हुई।

भूतनाथ : इसी के मारे मेरी जिन्दगी बबाल हो रही है, मगर तुम इसे देख चौंकी क्यों? क्या इस औरत को पहिचानती हो?

कमलिनी : हाँ, मैं इसे पहिचानती हूँ। यह वह काली नागिन है कि जिसके डसने का मन्त्र ही नहीं! जिसे इसने काटा वह पानी तक नहीं माँगता, तुमने इसके साथ दुश्मनी की, सो अच्छा नहीं किया।

भूतनाथ : मैंने जान-बूझकर इसके साथ दुश्मनी नहीं की। तुम खुद जानती हो कि मैं इसके काबू में हूँ, किसी तरह इसका हुक्म टाल नहीं सकता, मगर कल इसने जो कुछ काम करने के लिए मुझे कहा, वह मैं किसी तरह नहीं कर सकता था और इनकार की भी हिम्मत न थी, लाचार इसी खंजर की मदद से गिरफ़्तार कर लाया हूँ। अब कोई ऐसी तरकीब निकालो, जिसमें मेरी जान बचे और मैं बीरेन्द्रसिंह को मुँह दिखाने लायक हो जाऊँ।

कमलिनी : मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रहे हो! मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि तुम इसके कब्जे में क्योंकर फँसे हो, न तुमने इसके बारे में कभी मुझसे कुछ कहा ही।

भूतनाथ : बेशक मैं इसका हाल तुमसे कह चुका हूँ और यह भी कह चुका हूँ कि इसी की बदौलत मुझे मरना पड़ा, बल्कि तुमने वादा किया था कि इसके हाथ से तुम्हें छुट्टी दिला दूँगी।

कमलिनी : हाँ, वह बात मुझे याद है, मगर तुमने तो श्यामा का नाम लिया था!

भूतनाथ : ठीक है, वह यही श्यामा है।

कमलिनी : (हँसकर) इसका नाम श्यामा नहीं है मनोरमा है। मैं इसकी सात पुश्त को जानती हूँ। बेशक, इसने अपने नाम में भी तुमको धोखा दिया। ख़ैर, अब मालूम हुआ कि तुम्हें इसी ने सता रक्खा है, तुम्हारे हाथ की लिखी हुई दस्तावेज इसी के कब्जे में है और इस सबब से तुम इसे जान से मार भी नहीं सकते। इसने मुझे भी कई दफे धोखा देना चाहा था, मगर मैं कब इसके पंजे में आनेवाली हूँ। हाँ, यह तो कहो कि इसने क्या काम करने के लिए कहा था।

भूतनाथ : इसने कहा था कि तू कमलिनी का सिर काटकर मेरे पास ले आ, यह काम तुझसे बखूबी हो सकेगा, क्योंकि वह तुझ पर विश्वास करती है।

कमलिनी : (कुछ देर तक सोचकर) ख़ैर, कोई हर्ज़ नहीं, पहिले तो मुझे इसकी कोई विशेष फिक्र न थी, परन्तु अब इसके साथ चाल चले बिना काम नहीं निकलता। देखो तो मैं इसे कैसा दुरुस्त करती हूँ और तुम्हारे काग़ज़ात भी इसके कब्जे से कैसे निकालती हूँ।

भूतनाथ : मगर इस काम में देर न करनी चाहिए।

कमलिनी : नहीं नहीं, देर न होगी क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए भी मुझे इसी के मकान पर जाना पड़ेगा, बस दोनों काम एक साथ ही निकल जायेंगे।

भूतनाथ : अच्छा तो अब क्या करना चाहिए।

कमलिनी : (हाथ का इशारा करके) तुम इस झाड़ी में छिप रहो, मैं इसे होश में लाकर कुछ बातचीत करूँगी। आज यह मुझे किसी तरह नहीं पहिचान सकती।

भूतनाथ झाड़ी के अन्दर छिप रहा, कमलिनी ने अपने बटुए में से लखलखे की डिबिया निकाली और सुँघाकर उस औरत को होश में लायी। मनोरमा जब होश में आयी, उसने अपने सामने एक भयानक रूपधारी औरत को देखा। वह घबड़ाकर उठ बैठी और बोली—

मनोरमा : तुम कौन हो और मैं यहाँ क्योंकर आयी?

कमलिनी : मैं जंगल की रहनेवाली भिल्लनी हूँ, तुम्हें एक लम्बे कद का आदमी पीठ पर लादे लिये जाता था। मैं इस पहाड़ी के नीचे सुअर का शिकार कर रही थी, जब वह मेरे पास पहुँचा मैंने उसे ललकारा और पूछा कि पीठ पर क्या लादे लिये जाता है? जब उसने कुछ न बताया तो लाचार (नेजा दिखाकर) इसी जहरीले नेजे से उसे जख़्मी किया। जब वह बेहोश होकर गिर पड़ा तब मैंने गठड़ी खोली, जब तुम्हारी सूरत नज़र आयी तो हाल जानने की इच्छा हुई, लाचारी इस जगह उठा लायी और होश में लाने का उद्योग करने लगी। अब तुम्हीं बताओ कि वह आदमी कौन था और तुम्हें इस तरह क्यों लिये जाता था?

मनोरमा : मैं अपना हाल तुमसे ज़रूर कहूँगी मगर पहिले यह बताओ कि वह आदमी तुम्हारे इस जहरीले नेजे के असर से मर गया या जीता है।

कमलिनी : वह मर गया और मेरे साथी लोग उसे जला देने के लिए ले गये।

मनोरमा : (ऊँची साँस लेकर) अफसोस, यद्यपि उसने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया तथापि उसकी मोहब्बत मेरे दिल से किसी तरह नहीं जा सकती, क्योंकि वह मेरा प्यारा पति था। अफसोस, अफसोस, तुमने उसके हाथ से मुझे व्यर्थ छुड़ाया।

पाठक, झा़ड़ी के अन्दर छिपा हुआ भूतनाथ भी मनोरमा की बातें सुन रहा था। मनोरमा ने जो कुछ कमलिनी से कहा न मालूम उसमें क्या तासीर थी कि सुनने के साथ ही भूतनाथ का कलेजा काँपने लगा और उसे चक्कर-सा आ गया। बहुत मुश्किल से उसने अपने को सम्हाला और कान लगाकर फिर दोनों की बातें सुनने लगा।

कमलिनी : (कुछ सोचकर) मैं कैसे विश्वास करूँ कि तुमने जोकुछ कहा वह सच है?

मनोरमा : पहिले यह सोचो कि मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूँगी?

कमलिनी : इसके कई सबब हो सकते हैं, सबसे भारी सबब यह है कि तुम्हारा भेद एक गैर के सामने खुल जायेगा, जिससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। मगर मुझे विश्वास नहीं होता कि जो आदमी तुम्हें इतना कष्ट दे और बेहोश करके गठरी में बाँधकर कहीं ले जाने का इरादा रक्खे, उसे तुम प्यार करो और अपना पति कहकर सम्बोधित करो।

मनोरमा : नहीं नहीं, यों तो शक की कोई दवा नहीं परन्तु मैं इतना अवश्य कहूँगी कि उस आदमी के बारे में मैंने जो कुछ कहा वह सच है।

कमलिनी : ख़ैर, ऐसा ही होगा, मुझे इससे कोई मतलब नहीं, चाहे वह आदमी तुम्हारा पति हो अथवा नहीं, अब तो वह मर चुका किसी तरह जी नहीं सकता। ख़ैर, यह तो बताओ कि अब तुम किया क्या चाहती हो और कहाँ जाने की इच्छा रखती हो?

मनोरमा : मुझे गयाजी का रास्ता बता दो। मेरे माँ-बाप उसी शहर में रहते हैं, अब मैं उन्हीं के पास जाऊँगी।

कमलिनी : अच्छा पहाड़ी के नीचे चलो मैं तुम्हें गयाजी का रास्ता बता देती हूँ। हाँ, मैं तुम्हारा नाम पूछना तो भूल ही गयी।

मनोरमा : मेरा नाम इमामन है।

कमलिनी : (जोर से हँसकर) क्या ठगने के लिए मैं ही थी!

मनोरमा : (चौंककर और कमलिनी को सिर से पैर तक अच्छी तरह देखकर) मुझे तुम पर शक होता है।

कमलिनी : यह कोई ताज्जुब की बात नहीं, मगर शक होने ही से क्या हो सकता है? आज तक तुमने मुझे कभी नहीं देखा और न फिर देखोगी।

मनोरमा : तब मैं अवश्य ही कह सकती हूँ कि तुम कमलिनी हो!

कमलिनी : नहीं नहीं, मैं कमलिनी नहीं हो सकती, हाँ, कमलिनी को पहिचानती ज़रूर हूँ क्योंकि वह बीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान की दोस्त है, इसलिए मेरी दुश्मन!

मनोरमा : अब मैं तुम्हारी बातों का विश्वास नहीं कर सकती।

कमलिनी : तो इसमें मेरा कोई भी हर्ज़ नहीं। (आहट पाकर और दाहिनी तरफ़ देखकर) लो देखो अब तो मैं सच्ची हुई। वह कमलिनी आ रही है!

संयोग से उसी समय तारा भी आ पहुँची जो कमलिनी की सूरत में उसके कहे मुताबिक सब काम किया करती थी। कमलिनी ने गुप्त रीति से तारा को कुछ इशारा किया, जिससे वह कमलिनी का मतलब समझ गयी। कमलिनी रूपी तारा लपककर उन दोनों के पास पहुँची और कमर से खंजर निकालकर और उसे चमकाकर बोली, "इस समय तुम दोनों भले मौके पर मुझे मिल गयी हो, आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ, अब मैं तुम दोनों से बिना बदला लिये टलनेवाली नहीं!"

तारा की यह बात सुन कमलिनी जान-बूझकर काँपने लगी, मालूम होता था कि वह डर से काँप रही है। मनोरमा भी यकायक कमलिनी को मौजूद देखकर घबड़ा गयी, इसके अतिरिक्त उस चमकते हुए खंजर को देखकर उसे विश्वास हो गया कि अब किसी तरह जान नहीं बचती, क्योंकि इसी तरह का खंजर भूतनाथ के हाथ में वह देख चुकी थी और उसके प्रबल प्रताप का नमूना उसे मालूम हो चुका था, साथ ही उसे इस बात का भी विश्वास हो गया कि राक्षसी (कमलिनी), जिसने उसे भूतनाथ के हाथ से छुड़ाया सच्ची और उसकी ख़ैरखाह है।

कमलिनी ने तारा को फिर इशारा किया जिसे मनोरमा ने नहीं जाना पर तारा ने वह खंजर मनोरमा के बदन से लगा दिया और वह बात-की-बात में बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गयी। झाड़ी में छिपा हुआ भूतनाथ भी निकल आया और कमलिनी से बोला—

भूतनाथ : जो हो, मगर मेरा काम कुछ भी न हु्आ।

कमलिनी : इसमें कोई शक नहीं कि तुम बड़े बुद्धिमान हो परन्तु कभी-कभी तुम्हारी अक्ल भी हवा खाने चली जाती है। तुम इस बात को नहीं जानते कि तुम्हारा काम पूरा-पूरा हो गया। यकायक तारा के पहुँच जाने से मालूम हुआ कि तुम्हारी किस्मत तेज़ है, नहीं तो मुझे बहुत कुछ बखेड़ा करना पड़ता।

भूतनाथ : सो क्या, मुझे साफ़ समझा दो तो जी ठिकाने हो।

कमलिनी: मेरे पास बैठ जाओ मैं अच्छी तरह समझा देती हूँ (तारा की तरफ़ देखकर) कहो तुम्हारा आना क्योंकर हुआ?

तारा : मुझे एक ऐसा काम आ पड़ा कि बिना तुमसे मिले कठिनता दूर होने की आशा न रही, लाचार झण्डी टेढ़ी करके तुमसे मिलने की उम्मीद में यहाँ आयी थी।

कमलिनी : अच्छा हुआ कि तुम आयीं, इस समय तुम्हारे आने से बड़ा ही काम चला, अच्छा बैठ जाओ और जो कुछ मैं कहती हूँ, उसे सुनो।

इसके बाद कमलिनी, तारा और भूतनाथ में देर तक बातचीत होती रही जिसे यहाँ पर लिखना हम मुनासिब नहीं समझते, क्योंकि इन लोगों ने जो कुछ करना विचारा है, वह आगे के बयान में स्वयं खुल जायेगा। जब बातचीत से छुट्टी मिली तो मनोरमा को उठा तीनों आदमी पहाड़ी के नीचे उतरे, मनोरमा एक पेड़ के साथ बाँध दी गयी और इसके बाद कमलिनी भी कैदियों की तरह एक पेड़ के साथ बाँध दी गयी। इस काम से छुट्टी पाकर तारा और भूतनाथ वहाँ से अलग हो गये और किसी झाड़ी में छिपकर दूर से इन दोनों को देखते रहे। थोड़ी ही देर बाद मनोरमा होश में आयी और अपने को बेबस पाकर चारों तरफ़ देखने लगी। पास ही में पेड़ से बँधी हुई कमलिनी पर भी उसकी निगाह पड़ी और वह अफसोस के साथ कमलिनी की तरफ़ देखकर बोली—

मनोरमा : बेशक तुम सच्ची हो, मेरी भूल थी जो तुम पर शक करती थी।

कमलिनी : ख़ैर, इस समय तो तुम्हारे ही सबब से मुझे भी कष्ट भोगना पड़ा।

मनोरमा : इसमें कोई सन्देह नहीं।

कमलिनी : तुम्हारा छूटना तो मुश्किल है मगर मैं किसी-न-किसी तरह धोखा देकर छूट ही जाऊँगी और तब कमलिनी से समझूँगी, अब बिना उसकी जान लिये चैन कहाँ?

मनोरमा : तुम्हारी भी तो वह दुश्मन है, फिर तुम्हें क्योंकर छोड़ देगी?

कमलिनी : मेरी उसकी दुश्मनी भीतर-ही-भीतर की है, इसके अतिरिक्त एक और सबब ऐसा है कि जिससे मैं अवश्य छूट जाऊँगी, तब तुम्हारे छुड़ाने का भी उद्योग करूँगी।

मनोरमा : वह कौन-सा सबब है?

कमलिनी : सो मैं अभी नहीं कह सकती, तुम्हें स्वयं मालूम हो जायगा। (चारों तरफ़ देखकर) न मालूम वह कम्बख्त कहाँ गयी!

मनोरमा : क्या तुम्हें भी नहीं मालूम?

कमलिनी : नहीं, मुझे जब होश आया, मैंने अपने को इसी तरह बेबस पाया।

मनोरमा : ख़ैर, कहीं भी हो आवे हीगी, हाँ, तुम्हें यदि अपने छूटने की उम्मीद है तो कब तक?

कमलिनी : उसके आने पर दो-चार बातें करने से ही मुझे छुट्टी मिल जायगी और मैं तुम्हें भी अवश्य छुड़ाऊँगी, हाँ, अकेली होने के कारण विलम्ब जो कुछ हो। यदि तुम्हारा कोई मददगार हो तो बताओ ताकि छुट्टी मिलने पर मैं तुम्हारे हाल की उसे ख़बर दूँ।

मनोरमा : (कुछ सोचकर) यदि कष्ट उठाकर तुम मेरे घर तक जाओ और मेरी सखी को मेरा हाल कह सको तो वह सहज ही में मुझे छुड़ा लेगी।

कमलिनी : इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि मैं अवश्य छूट जाऊँगी। तुम अपने घर का पता और अपनी सखी का नाम बताओ, मैं ज़रूर उससे मिलकर तुम्हारा हाल कहूँगी और स्वयं भी जहाँ तक हो सकेगा, तुम्हें छुड़ाने के लिए उसका साथ दूँगी।

मनोरमा : यदि ऐसा करो तो मैं जन्म-भर तुम्हारा अहसान मानूँगी। जब उसके कान तक मेरा हाल पहुँच जायगा तो तुम्हारी मदद की आवश्यकता न रहेगी।

कमलिनी : ख़ैर, लो अब पता और नाम बताने में विलम्ब न करो, कहीं ऐसा न हो कमलिनी आ जाय, तब कुछ न हो सकेगा।

मनोरमा : हाँ ठीक है-काशीजी में त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास लाल रंग का मकान एक छोटे-से बाग के अन्दर है। मछली के निशान की स्याह रंग की झण्डी दूर से ही दिखायी पड़ेगी। मेरी सखी का नाम 'नागर' है, समझ गयी?

कमलिनी : मैं खूब समझ गयी, मगर उसे मेरी बात का विश्वास कब होगा?

मनोरमा : इसमें विश्वास की कोई ज़रूरत नहीं है, वह मुझ पर आफ़त आने का हाल सुनते ही बेचैन हो जायगी और किसी तरह न रुकेगी।

कमलिनी : तथापि मुझे हर तरह से दुरुस्त रहना चाहिए, शायद वह समझे कि यह मुझे धोखा देने आयी है और चाहती है कि मैं घर के बाहर जाऊँ तो कोई मतलब निकाले।

मनोरमा : (कुछ सोचकर) हाँ, ऐसा हो सकता है, अच्छा मैं तुम्हें एक परिचय बताती हूँ, जब वह बात उसके कान में कहोगी तब वह तुम्हारा पूरा विश्वास कर लेगी, परन्तु उस परिचय को बड़ी होशियारी से अपने दिल में रखना, ख़बरदार दूसरा जानने न पावे नहीं तो मुश्किल होगी और मेरी जान किसी तरह न बचेगी।

कमलिनी : तुम विश्वास रक्खो कि वह शब्द सिवाय एक दफे के जब मैं तुम्हारी सखी के कान में कहूँगी, दूसरे दफे मेरे मुँह से न निकलेगा। (इधर-उधर देखकर) जल्द कहो, अब देर न करो।

मनोरमा : (कमलिनी की तरफ़ झुककर धीरे से) 'विकट' शब्द कहना बस फिर सन्देह न करेगी और तुम्हें मेरा विश्वासपात्र समझेगी।

कमलिनी : ठीक है, अब जहाँ तक जल्द हो सकेगा मैं तुम्हारी सखी के पास पहुँचूँगी और अपना मतलब निकालूँगी।

मनोरमा : पहिले तो मुझे यह देखना है कि कमलिनी तुम्हें क्योंकर छोड़ती है! जब तुम छूट जाओगी तब कहीं जाकर मुझे अपने छूटने की कुछ उम्मीद होगी।

कमलिनी : (हँसकर) मैं उतनी ही देर में छूट जाऊँगी, जितनी देर में तुम एक से लेकर निन्यानवें तक गिन सको।

इतना कहकर कमलिनी ने सीटी बजायी। सीटी की आवाज़ सुनते ही तारा और भूतनाथ जो वहाँ से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी के अन्दर छिपे हुए थे, कमलिनी के पास आ पहुँचे। कमलिनी ने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ़ देखा और कहा, "मुझे छोड़ दो।"

भूतनाथ ने कमलिनी को जो पेड़ से बँधी हुई थी, खोल दिया। कमलिनी उठकर मनोरमा के पास आयी और बोली, "क्यों मैं अपने कहे मुताबिक छूट गयी या नहीं!"

कमलिनी की चालाकी के साथ ही भूतनाथ की सूरत देखकर मनोरमा सन्न हो गयी और ताज्जुब के साथ उन तीनों की तरफ़ देखने लगी। इस समय भूतनाथ के चेहरे पर उदासी के बदले खुशी की निशानी पायी जाती थी। भूतनाथ ने हँसकर मनोरमा की तरफ़ देखा और कहा, "क्या अब भी भूतनाथ तेरे कब्जे में है? अगर हो तो कह, इसी समय कमलिनी का सर काटकर तेरे आगे रख दूँ, क्योंकि वह यहाँ मौजूद है।"

मनोरमा ने क्रोध के मारे दाँत पीसा और सर नीचा कर लिया। थोड़ी देर बाद बोली, "अफसोस, मैं धोखा खा गयी!"

कमलिनी : (तारा से) अब समय नष्ट करना ठीक नहीं। इस हरामजादी को तुम ले जाओ और लोहेवाले तहख़ाने में बन्द करो फिर देखा जायगा।

(अपने हाथ का नेजा देकर) इस नेजे को अपने पास रक्खो और वह खंजर मुझे दे दो, अब नेजे के बदले खंजर ही रखना मैं उत्तम समझती हूँ, यद्यपि एक खंजर मेरे पास है, परन्तु वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह के लिए है।

तारा : मैं भी यही कहा चाहती थी, क्योंकि खंजर और नेजे में गुण तो एक ही है फिर ढोढा लेकर घूमने से क्या फायदा, यह लो खंजर अपने पास रक्खो।

कमलिनी : (भूतनाथ से) तुम भी तारा के साथ जाओ और इस हरामजादी को हमारे घर पहुँचाकर बहुत जल्द लौट आओ, तब तक मैं इसी जगह रहूँगी और तुम्हारे आते ही तुम्हें साथ लेकर काशीजी जाऊँगी। पहिले तुम्हारा काम करके कुँअर इन्द्रजीतसिंह से मिलूँगी और मायारानी की मण्डली को जिसने दुनिया में अन्धेर मचा रक्खा है, जहन्नुम में भेजूँगी।

भूतनाथ : (सिर झुकाकर) जो हुक्म।

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