चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

।। पाँचवाँ भाग ।।

पहिला बयान

बेचारी किशोरी को चिता पर बैठकर जिस समय दुष्टा धनपति ने आग लगायी उसी समय बहुत से आदमी जो उसी जंगल में किसी जगह छुपे हुए थे हाथों में नंगी तलवारे लिए 'मारो-मारो' कहते हुए उन लोगों पर आ टूटे। उन लोगों ने सबसे पहले किशोरी को चिता पर से खैंच लिया और इसके बाद धनपति के साथियों को पकड़ने लगे।

पाठक समझते होंगे कि ऐसे समय में इन लोगों के आ पहुँचने और जान बचाने से किशोरी खुश हुई होगी और इन्द्रजीत से मिलने की कुछ उम्मीद भी उसे हो गई होगी मगर नहीं, अपने बचाने वाले को देखते ही किशोरी चिल्ला उठी और उसके दिल का दर्द पहले से भी ज़्यादे बढ़ गया। किशोरी ने आसमान की तरफ़ देखकर कहा, "मुझे तो विश्वास हो गया था कि इस चिता में जल कर ठण्ढे-ठण्ढे बैकुँठ चली–जाऊँगी। क्योंकि इसकी आँच कुँअर इन्द्रजीतसिंह की जुदाई की आँच से ज़्यादा गर्म न होगी, मगर हाय, इस बात का गुमान भी न था कि दुष्ट आ पहुँचेगा और मैं सचमुच की तपती हुई भट्ठी में झोंक दी जाऊँगी। ऐ मौत तू कहाँ है? तू कोई वस्तु है भी या नहीं, मुझे तो इसी में शक है!"

वह आदमी जिसने ऐसे समय में पहुँचकर किशोरी को बचाया, माधवी का दीवान अग्निदत्त था जिसके चंगुल में फंस कर किशोरी ने राजगृही में बहुत दुःख उठाया था और कामिनी की मदद से–जिसका नाम कुछ दिनों तक किन्नरी—था छुट्टी मिली थी। किशोरी के अपने मरने की कुछ भी परवाह न थी और वह अग्निदत्त की सूरत देखने की बनिस्बत मौत को लाख दर्जे उत्तम समझती थी, यही सबब था कि इस समय उसे अपनी जान बचाने का रंज हुआ।

अग्निदत्त और उसके आदमियों ने किशोरी को तो बचा लिया मगर जब उसके दुश्मनों को अर्थात धनपति और उसके साथियों को पकड़ने का इरादा किया तो लड़ाई गहरी हो पड़ी। मौका पाकर धनपति भाग गयी और गहन वन में किसी झाड़ी के अन्दर छिपकर उसने अपनी जान बचायी। उसके साथियों में से एक भी न बचा, सब मारे गए। अग्निदत्त भी केवल दो ही आदमियों के साथ बच गया। उस संगदिल ने रोती और चिल्लाती हुई बेचारी किशोरी को ज़बर्दस्ती उठा लिया और एक तरफ़ का रास्ता लिया।

पाठक आश्चर्य करते होंगे कि अग्निदत्त को तो राजा बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने राजगृही में गिरफ़्तार कर चुनार भेज दिया था, वह यकायक यहाँ कैसे आ पहुँचा?" इसलिए अग्निदत्त का थोड़ा-सा हाल इस जगह लिख देना हम मुनासिब समझते हैं।

राजा बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने दीवान अग्निदत्त को गिरफ़्तार करके अपने बीस सवारों के पहरे में चुनारगढ़ रवाना कर दिया और एक चीठी भी सब हाल की महाराज सुरेन्द्रसिंह को लिखकर, उन्हीं के मार्फ़त भेजी। अग्निदत्त हथकड़ी डाल घोड़े पर सवार कराया गया और उसके पैर रस्सी से घोड़े की जीन के साथ बाँध दिये गए, घोड़े की लम्बी बागडोर दोनों तरफ़ से दो सवारों ने पकड़ ली और सफ़र शुरू कर दिया। तीसरे दिन जब वे लोग सोन नदी के पास पहुँचे अर्थात जब वह नदी दो कोस बाकी रह गई तब उन लोगों पर डाका पड़ा। पचास आदमियों ने चारों तरफ़ से घेर लिया। घंटे-भर की लड़ाई में राजा बीरेन्द्रसिंह के कुल आदमी मारे गए, खबर पहुँचाने के लिए भी एक आदमी न बचा और अग्निदत्त को उन लोगों के हाथों से छुट्टी मिली। वे डाकू सब अग्निदत्त के तरफ़दार और उन लोगों में से थे, जो गया जी में फ़साद मचाया करते थे और उन लोगों की जाने लेते और घर लूटते थे, जो दीवान अग्निदत्त के विरुद्ध जाने जाते। इस तरह अग्निदत्त को छुट्टी मिली और बहुत दिन तक इस डाके की ख़बर राजा बीरेन्द्रसिंह या उनके आदमियों को नहीं मिली।

यद्यपि दीवान अग्निदत्त के हाथ से गया की दीवानी जाती रही और वह एक साधारण आदमी की तरह मारा-मारा फिरने लगा तथापि वह अपने साथी डाकुओं में मालदार गिना जाता था, क्योंकि उसके पास ज़ुल्म की कमाई हुई दौलत थी और वह उस दौलत को राजगृही से थोड़ी दूर पर एक मढ़ी में, जो पहाड़ी के पीछे थी रखता था, जिसका हाल दस-बारह आदमियों के सिवाय किसी को भी मालूम न था। उस दौलत को निकालने में अग्निदत्त ने विलम्ब न किया और उसे अपने कब्ज़े में लाकर साथी डाकुओं के साथ अपनी धुन में चारों तरफ़ घूमने तथा इस बात की टोह लेने लगा कि राजा बीरेन्द्रसिंह की तरफ़ क्या क्या होता है।

थोड़े ही दिन बाद मौक़ा समझकर वह रोहतासगढ़ के चारों तरफ़ घूमने लगा और जिस तरह किशोरी से मिला उसका हाल आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं।

जिस जगह अग्निदत्त किशोरी से मिला था, उससे थोड़ी ही दूर पर एक पहाड़ी थी, जिसमें कई खोह और ग़ार थे। वह किशोरी को उठाकर उस पहाड़ी पर ले गया। रोते और चिल्लाते-चिल्लाते किशोरी बेहोश हो गई थी। अग्निदत्त ने उसे खोह के अन्दर ले जाकर लिटा दिया और आप बाहर चला आया।

पहर रात जाते-जाते जब किशोरी होश में आयी तो उसने अपने को अजब हालत में पाया। ऊपर-नीचे चारों तरफ़ वह पत्थर देखकर समझ गई कि मैं किसी खोह में हूँ। एक तरफ़ चिराग जल रहा था। गुलाब के फूल-सी नाज़ुक किशोरी की अवस्था इस समय बहुत ही नाज़ुक थी। अग्निदत्त की याद से उसे घड़ी-घड़ी रोमांच होता था, उसके धड़कते हुए कलेजे में अजब तरह का दर्द था और इस सोच ने उसे बिलकुल ही निकम्मा कर रखा था कि देखें चाण्डाल अग्निदत्त के पहुँचने पर मेरी क्या दुर्दशा होती है। घण्टों की मेहनत में बड़ी कोशिश करके उसने अपने होश-हवाश दुरुस्त किए और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उसने इस इरादे को तो पक्का कर ही लिया था कि अगर अग्निदत्त मेरे पास आवेगा तो पत्थर पर सिर पटककर अपनी जान दे दूँगी, मगर यह भी सोचती थी कि पत्थर पर सिर पटकने से जान नहीं जा सकती, किसी तरह खोह के बाहर निकलकर ऐसा मौका ढूँढ़ना चाहिए कि अपने को इस पहाड़ के नीचे गिराकर बखेड़ा तय कर दिया जाए। जिसमें हमेशा के लिए इस खिंचाखिची से छुट्टी मिले।

किशोरी चिराग बुझाने के लिए उठी ही थी कि सामने से पैर की चाप मालूम हुई। वह डरकर उसी तरफ़ देखने लगी कि यकायक अग्निदत्त पर नज़र पड़ी। देखते ही वह काँप गयी, ऐसा मालूम हुआ कि रगों में ख़ून की जगह पारा भर गया। वह अपने को किसी तरह सम्हाल न सकी और ज़मीन पर बैठकर रोने लगी। अग्निदत्त सामने आकर खड़ा हो गया और बोला—

अग्निदत्त : तुमने मुझको बड़ा ही धोखा दिया, अपने साथ मेरी लड़की को भी मुझसे जुदा कर दिया। अभी तक मुझे इस बात का पता न लगा कि मेरी स्त्री पर क्या बीती और बीरेन्द्रसिंह ने उसके साथ क्या सलूक किया, और यह सब तुम्हारी बदौलत हुआ।

किशोरी : फिर भी मैं कहती हूँ कि तुम मुझे सताकर सुख न पाओगो।

अग्निदत्त : इस समय तुम्हें पाकर मैं बहुत खुश हूँ, दीनदुनिया की फिक्र जाती रही, आगे जो होगा देखा जाएगा।

किशोरी : मैं तुमसे वादा करती हूँ कि यदि मुझे छोड़ दोगे तो मैं राजा बीरेन्द्रसिंह से कहकर तुम्हारे क़सूर माफ़ करा दूँगी और तुम्हारी जीविका निर्वाह के लिए भी बन्दोबस्त हो जाएगा नहीं, तो याद रखना तुम्हारी स्त्री भी...

अग्निदत्त : जो तुम कहोगी वह मैं समझ गया। मेरी स्त्री पर चाहे जो बीते, इसकी परवाह नहीं, न मुझे बीरेन्द्रसिंह का डर है। मुझे दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई चीज़ दिखाई नहीं देती है। देखो, तुम्हारे लिए मैंने कितना दुःख भोगा और भोगने को तैयार हूँ, क्या अब भी तुमको मुझपर तरस नहीं आता! मैं कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हें अपनी जान से ज़्यादा प्यार करूँगा, यदि मेरी होकर रहोगी।

किशोरी : अरे दुष्ट चाण्डाल, ख़बरदार फिर ऐसी बात मुँस से न निकालियो!

अग्निदत्त : (हँसकर) देखूँ तो तू अपने को मुझसे क्योंकर बचाती है। इतना कहकर अग्निदत्त किशोरी को पकड़ने आगे बढ़ा। किशोरी घबड़ाकर उठ खड़ी हुई और दूर हट गयी। थोड़ी देर तक तो इस तंग जगह में दौड़-धूपकर किशोरी ने अपने को बचाया मगर कहाँ तक? आखिर मर्द के सामने औरत की क्या पेश आ सकती थी! अग्निदत्त को क्रोध आ गया। उसने किशोरी को पकड़ लिया और ज़मीन पर पटक दिया।

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