चन्द्रकान्ता - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

बीसवां बयान

चपला तहखाने में उतरी। नीचे एक लम्बी-चौड़ी कोठरी नज़र आई जिसमें चौखट के सिवाय किवाड़ के पल्ले नहीं थे। पहले चपला ने उसे खूब गौर करके देखा, फिर अन्दर गई। दरवाज़े के भीतर पैर रखते ही ऊपर वाले चौखट के बीचोंबीच से लोहे का तख्ता बड़े ज़ोर के साथ गिर पड़ा। चपला ने चौंककर पीछे देखा तो दरवाज़ा बन्द पाया। सोचने लगी, ‘‘यह कोठरी है कि मूसेदानी? दरवाज़ा इसका बिल्कुल चूहेदानी की तौर पर है। अब क्या करें? और कोई रास्ता कहीं जाने का मालूम नहीं पड़ता, बिल्कुल अंधेरा हो गया, हाथ-को-हाथ दिखाई नहीं पड़ता!’’ चपला अंधेरे में चारों तरफ घूमने और टटोलने लगी।

घूमते-घूमते चपला का पैर गड्ढ़े में जा पड़ा, साथ ही इसके कुछ आवाज़ हुई और दरवाज़ा खुल गया। कोठरी में चांदनी भी पहुंच गयी। यह वह दरवाज़ा नहीं था जो पहले बन्द हुआ था बल्कि एक दूसरा ही दरवाज़ा था, चपला ने पास जाकर देखा, इसमें भी कहीं किवाड़ के पल्ले नहीं दिखाई पड़े। आखिर उस दरवाज़े की राह से कोठरी के बाहर हो एक बाग में पहुंची। देखा कि छोटे-छोटे फूलों के पेड़ों में रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। एक तरफ से छोटी नहर के जरिए से पानी अन्दर पहुंचकर बाग में छिड़काव का काम कर रहा है मगर क्यारियां इसमें की दुरुस्त नहीं हैं। सामने एक बारादरी नज़र आई। धीरे घूमती वहां पहुंची।

यह बारादरी बिल्कुल स्याह पत्थर से बनी हुई थी। छत, ज़मीन, खंभे, सब स्याह पत्थर के थे। बीच में संगमरमर के सिंहासन पर हाथ भर का एक सुर्ख चौखुंटा पत्थर रखा हुआ था। चपला ने उसको देखा, उस पर यह खुदा हुआ था, ‘‘यह तिलिस्म है, इसमें फंसने वाला कभी निकल नहीं सकता, हां अगर कोई इसको तोड़े तो सब कैदियों को छुड़ा ले और दौलत भी उसके हाथ लगे। तिलिस्म तोड़ने वाले के हाथ में खूब ताकत भी होनी चाहिए नहीं तो मेहनत व्यर्थ है।’’

चपला को इसे पढ़ने के साथ ही यकीन हो गया कि अब जान गई, जिस राह से मैं आई हूं उस राह से बाहर जाना कभी नहीं हो सकता। कोठरी का दरवाज़ा बन्द हो गया, बाहर वाले दरवाज़े को कमन्द से बांधना व्यर्थ हुआ मगर शायद वह दरवाज़ा खुला हो जिससे इस बाग में आई हूं। यह सोचकर चपला फिर उस दरवाज़े की तरफ गई, मगर उसका कोई निशान तक न मिला, यह भी नहीं मालूम हुआ कि किस जगह दरवाज़ा था। फिर लौटकर उसी बारहदरी में पहुंची और सिंहासन के पास गई, जी में आया कि इस पत्थर को उठा लूं। अगर किसी तरह बाहर निकलने का मौका मिला तो इसको भी साथ लेती जाऊंगी, लोगों को दिखाऊंगी। वह पत्थर उठाने के लिए झुकी, मगर उस पर हाथ रक्खा ही था कि बदन में सनसनाहट पैदा हुई और सिर घूमने लगा, यहां तक कि बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ी।

जब तक दिन बाकी था चपला बेहोश पड़ी रही। शाम होते-होते होश में आई। उठकर नहर के किनारे गई, हाथ-मुंह धोया, जी ठिकाने हुआ। उस बाग में अंगूर बहुत लगे हुए थे मगर उदासी और घबराहट के सबब से चपला ने एक दाना भी न खाया, फिर उसी बारहदरी में पहुंची। रात हो गई और धीरे-धीरे वह बारहदरी चमकने लगी। जैसे-जैसे रात बीतती जाती थी बारहदरी की चमक बढ़ती जाती थी। छत, दीवार, ज़मीन और खम्भें सब चमक रहे थे, कोई जगह उस बारहदरी में ऐसी न थी जो दिखाई न देती हो, बल्कि उसकी चमक से सामने वाला थोड़ा हिस्सा बाग का भी उजियाला हो रहा था।

यह चमक काहे की है, इसको जानने के लिए चपला ने ज़मीन, दीवार और खम्भों पर हाथ फेरा मगर कुछ, समझ में न आया। ताज्जुब, डर, और नाउम्मीदी ने चपला को सोने न दिया, तमाम रात जागते ही बीती। कभी दीवार टटोलती, कभी उस सिंहासन के पास जा उस पत्थर को गौर से देखती जिसके छूने से बेहोश हो गयी थी।

सवेरा हुआ, चपला फिर बाग में घूमने लगी। उस दीवार के पास पहुंची जिसके नीचे से बाग में नहर आई थी। सोचने लगी, ‘‘दीवार बहुत चौड़ी नहीं है, नहर का मुंह भी खुला है, इस राह से बाहर हो सकती हूं, आदमी के जाने लायक रास्ता बखूबी है।’’ बहुत सोचने और विचारने के बाद चपला ने यही किया, कपड़े सहित नहर में उतर गई, दीवार से उस तरफ हो जाने के लिए गोता मारा। काम पूरा हो गया अर्थात् उस दीवार के बाहर हो गई। पानी से सिर निकालकर देखा तो नहर को बाग के भीतर की बनिस्बत चौड़ा पाया। पानी के बाहर निकली और देखा कि दूर सब तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ दिखाई देते हैं। जिनके बीचोंबीच यह नहर आई है और दीवार के नीचे से होकर बाग के अन्दर गई है।

चपला ने अपने कपड़े धूप में सुखाये, ऐयारी का बटुआ भीगा न था, क्योंकि उसका कपड़ा रोगिनी था। जब सब तरह से लैस हो चुकी, वहां से सीधे रवाना हुई। दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़, बीच में नाला, किनारे पारिजात के पेड़ लगे हुए, पहाड़ के ऊपर किसी तरफ चढ़ने की जगह नहीं, अगर चढ़े भी तो थोड़ी दूर ऊपर जाने के बाद फिर उतरना पड़े। चपला नाले के किनारे रवाना हुई। दोपहर दिन चढ़ने तक तीन कोस चली गई। आगे जाने के लिए रास्ता न मिला, क्योंकि सामने से भी एक पहाड़ ने रास्ता रोक रखा था जिसके ऊपर से गिरने वाला पानी का झरना नीचे नाले में आकर बहता था। पहाड़ी के नीचे एक दालान था जो अन्दाज में दस गज लम्बा और गज भर चौड़ा होगा। गौर के साथ देखने से मालूम होता था कि पहाड़ काट के बनाया गया है। इसके बीचोंबीच में पत्थर का एक अज़दहा था जिसका मुंह खुला था और आदमी उसके मुंह में बखूबी जा सकता था। सामने एक लम्बा-चौड़ा संगमरमर का साफ चिकना पत्थर भी ज़मीन पर जमाया हुआ था।

अज़दहे को देखने के लिए चपला उसके पास गई। संगमरमर के पत्थर पर पैर रखा ही था कि धीरे-धीरे अज़दहे ने दम खींचना शुरू किया, और कुछ ही देर बाद यहां तक तेजी से दम खींचा कि चपला का पैर न जम सका, वह खिंचकर उसके पेट में चली गई, साथ ही बेहोश भी हो गई।

जब चपला होश में आई उसने अपने को एक कोठरी में पाया तो बहुत तंग सिर्फ दस बारह आदमियों के बैठने लायक होगी। कोठरी के बगल में ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं। चपला थोड़ी देर तक अचम्भे में भरी हुई बैठी रही। तरह-तरह के खयाल उसके जी में पैदा होने लगे, अक्ल चकरा गई कि यह क्या मामला है। आखिर चपला ने अपने को सम्हाला और सीढ़ी के रास्ते छत पर चढ़ गई, जाते ही सीढ़ी का दरवाज़ा बन्द हो गयी, नीचे उतरने के लिए जगह न रही। इधर-उधर देखने लगी। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़, सामने एक छोटी-सी खोह नज़र पड़ी जो बहुत अंधेरी न थी क्योंकि आगे की तरफ उसमें रोशनी पहुंच रही थी।

चपला लाचार होकर उस खोह में घुसी। थोड़ी ही दूर जाकर एक छोटा-सा दालान मिला, यहां पहुंचकर देखा कि कुमारी चन्द्रकान्ता बहुत से बड़े-बड़े पत्ते आगे रखे हुए बैठी हैं और पत्ते पर पत्थर की नोंक से कुछ लिख रही हैं। नीचे झांककर देखा तो बहुत ढलवां पहाड़ी, उतरने की जगह नहीं, उसके नीचे कुंवर वीरेन्द्रसिंह और ज्योतिषीजी खड़े ऊपर की तरफ देख रहे हैं।

कुमारी चन्द्रकान्ता के कानों में चपला के पैर की आहट पहुंची। फिर के देखा, पहचानते ही उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘वाह सखी, खूब पहुंची। देख सब कोई नीचे खड़े हैं। कोई ऐसी तरकीब नज़र नहीं आती कि मैं उन तक पहुंचूं। उन लोगों की आवाज़ मेरे कान तक पहुंचती है मगर मेरी आवाज़ कोई नहीं सुनता। तेजसिंह ने पूछा है कि तुम किस राह से यहां आई हो, उसी का ज़वाब इस पत्ते पर लिख रही हूं, उसे नीचे फेकूंगी।’’

चपला ने पहले खूब ध्यान करके चारों तरफ देखा, नीचे उतरने की कोई तरकीब नज़र न आई तब बोली, ‘‘कोई ज़रूरत पत्ते पर लिखने की नहीं है। मैं पुकार के कहे देती हूं, मेरी आवाज़ वे लोग बखूबी सुनेंगे, पहले यह बताओ तुम्हें बगुला निगल गया था या किसी दूसरी राह से आई हो?’’

कुमारी ने कहा ‘‘हां, मुझको वही बगुला निगल गया था जिसको तुमने खण्डहर में देखा होगा, शायद तुमको भी वही बगुला निगल गया हो! चपला ने कहा, ‘‘ नहीं, मैं दूसरी राह से आई हूं, पहले उस खण्डहर का पता इन लोगों को दे लूं तब बातें करूं, जिससे ये लोग भी कोई बन्दोबस्त हम लोगों को छुड़ाने का करें। जहां तक मैं सोचती हूं, मालूम होता है हम लोग कई दिनों तक यहां फंसे रहेंगे, खैर, जो होगा देखा जायेगा।’’

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