चन्द्रकान्ता - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

चौदहवां बयान

थोड़ी देर में चपला फलों से झोली भरे हुए पहुंची, देखा तो चन्द्रकान्ता वहां नहीं है, इधर-उधर निगाह दौड़ाई, कहीं नहीं। इस टूटे मकान (खण्डहर) में तो नहीं गई है? यह सोचकर मकान के अन्दर चली। कुमारी तो बेधड़क उस खण्डहर में चली गई थी मगर चपला रुकती हुई, चारों तरफ निगाह दौड़ाती और एक-एक चीज़ तजवीज़ करती हुई चली। फाटक के अन्दर घुसते ही दोनों बगल दो दालान दिखाई पड़े। ईंट-पत्थर के ढेर लगे हुए, कहीं-कहीं से छत टूटी हुई, मगर दीवारों पर की चित्रकारी और पत्थरों की मूर्तियां अभी तक नई मालूम पड़ती थीं।

चपला ने ताज्जुब की निगाह से उन मूर्तियों को देखा, कोई भी उसमें पूरे बदन की नज़र न आई। किसी का सिर नहीं, किसी की टांग नहीं, किसी का हाथ कटा, किसी का धड़ ही नहीं। सूरत भी इन मूर्तियों की अजब डरावनी थी। और आगे बढ़ी, बड़े-बड़े मिट्टी के ढेर जिनमें जंगली पेड़ लगे हुए थे लांघती हुई मैदान में पहुंची, दूर से वह बगुला दिखाई पड़ा जिसके पेट में कुमारी समा चुकी थी।

सब जगहों को देखना छोड़ चपला उस बगुले के पास धड़धड़ाती हुई पहुंची। उसने मुंह खोल दिया। चपला को बड़ा ताज्जुब हुआ, पीछे हटी। बगुले ने मुंह बन्द कर लिया। सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए? यह तो कोई बड़ी भारी ऐयारी मालूम होती है। क्या भेद है इसका पता लगाना चाहिए। पहले कुमारी को खोजना उचित है, कहीं ऐसा न हो कि इसी में कुमारी फंस गई हो। यह सोच उस जगह से हटी और दूसरी तरफ खोजने लगी।

चारों तरफ अहाता घिरा हुआ था, कई दालान और कोठरियां टूटी-फूटी और कई साबूत भी थीं, एक तरफ से देखना शुरू किया। पहले एक दालान में पहुंची जिसकी छत बीच में टूटी हुई थी, लम्बाई दालान की लगभग सौ गज की होगी, बीच में मिट्टी चूने के ढेर में से छोटे-छोटे बहुत से पीपल के पेड़ निकल आये थे। दालान के एक तरफ छोटी-सी कोठरी नज़र आई जिसके अन्दर पहुंचने पर देखा, एक कुआं है। झांकने पर अंधेरा मालूम पड़ा।

इस कुएं के अन्दर क्या है? यह कोठरी बनिस्बत और जगहों के साफ क्यों मालूम पड़ती है! कुआं भी साफ दीख पड़ता है, क्योंकि जैसे अकसर पुराने कुओं में पेड़ वगैरह उग आते हैं इसमें नहीं हैं। कुछ-कुछ आवाज़ भी इसमें से आती है जो बिल्कुल समझ नहीं पड़ती।

इसका पता लगाने के लिए चपला ने अपने ऐयारी बटुए में से काफूर * निकाला और उसके टुकड़े बालकर कुएं में डाले। अन्दर तक पहुंचकर उन टुकड़ों ने खूब रोशनी की। अब साफ मालूम होने लगा कि नीचे से कुआं बहुत चौड़ा और साफ है, मगर पानी नहीं है, बल्कि पानी की जगह एक सफेद बिछावन मालूम पड़ता है जिसके ऊपर एक बूढ़ा आदमी बैठा है। उसकी दाढ़ी लम्बी लटकती हुई दिखाई पड़ती है, मगर गर्दन नीचे होने के सबब से चेहरा मालूम नहीं पड़ता। सामने एक चौकी रखी हुई है जिस पर रंग-बिरंग के फूल पड़े हैं। चपला यह तमाशा देखकर डर गई। फिर जी को सम्हाला और कुएं पर बैठ गौर करने लगी, मगर कुछ अक्ल ने गवाही न दी। वह काफूर के टुकड़े भी बुझ गये जो कुएं अन्दर जल रहे थे और फिर अन्धेरा हो गया।

उस कोठरी में से एक दूसरे दालान में जाने का रास्ता था। इस राह से चपला दूसरे दालान में पहुंची, वहां इससे भी ज़्यादा जी दहलाने और डराने वाला तमाशा देखा। कूड़ा-कर्कट, हड्डी और गंदगी में यह दालान पहले दालान से कहीं बढ़ा-चढ़ा था, बल्कि एक साबुत पंजर (ढांचा) हड्डी का भी पड़ा हुआ था जो शायद गधे या टट्टू का था। उसी के बगल से लांघती हुई चपला बीचोंबीच दालान में पहुंची।

एक चबूतरा संगमरमर का पुरसा भर ऊंचा देखा जिस पर चढ़ने के लिए खूबसूरत नौ सीढ़ियां बनी हुई थीं। ऊपर उसके एक आदमी चौकी पर लेटा हुआ हाथ में किताब लिये कुछ पढ़ता मालूम हुआ, मगर ऊंचा होने के सबब से साफ दिखाई न दिया। इस चबूतरे पर चढ़ें या न चढ़ें? चढ़ने से कोई आफत तो न आवेगी। भला सीढ़ी पर एक पैर रखकर देखूं तो सही। यह सोचकर चपला ने सीढ़ी पर पैर रखा। पैर रखते ही बड़े ज़ोर से एक आवाज़ हुई और सन्दूक के पल्ले की तरफ खुलकर सीढ़ी के ऊपर वाले पत्थर ने चपला के पैर को ज़ोर से फेंक दिया जिसकी धमक और झटके से वह ज़मीन पर गिर पड़ी। सम्हल कर उठ खड़ी हुई, देखा कि सीढ़ी का पत्थर सन्दूक के पल्ले की तरह खुल गया था ज्यो-का-त्यों बन्द हो गया है।

चपला अलग खड़ी होकर सोचने लगी कि यह टूटा-फूटा मकान तो अजब तमाशे का है। ज़रूर यह किसी भारी ऐयार का बनाया हुआ होगा। इस मकान में घुसकर सैर करना कठिन है, ज़रा चूके और जान गयी। पर मुझको क्या डर? क्योंकि जान से ज़्यादा प्यारी मेरी चन्द्रकान्ता इसी कमरे में कहीं फंसी हुई है जिसका पता लगाना कठिन है, चाहे जान चली जाय मगर बिना कुमारी का पता लिये इस मकान के बाहर कभी न जाऊंगी। देखूं, इस सीढ़ी और चबूतरे में क्या-क्या ऐयारियां की गई हैं? जिस तरह पैर को उस सीढ़ी ने फेंका था उसी तरह इस पत्थर को भी भारी आवाज़ के साथ फेंक दिया।

चपला ने हर एक सीढ़ी पर पत्थर रख कर देखा, सभी में यही करामात पाई। इस चबूतरे के ऊपर क्या है इसको ज़रूर देखना चाहिए, यह सोच अब वह दूसरी तरकीब करने लगी। बहुत से ईंट पत्थर उस चबूतरे के पास जमा किये और उसके ऊपर चढ़कर देखा कि संगमरमर की एक चौकी पर एक आदमी दोनों हाथ में किताब लिये हुए पड़ा है, उम्र लगभग तीस वर्ष की होगी। खूब गौर करने से मालूम हुआ कि यह भी पत्थर का है। चपला ने एक छोटी-सी कंकड़ी उसके मुंह पर डाली थी उसको एक हाथ से हटा दिया और फिर उसी तरह वह अपने ठिकाने ले गया। चपला थी तो बड़ी चालाक और निडर, मगर इस पत्थर के आदमी का तमाशा देख बहुत डरी और जल्द वहां से हट गई।

अब दूसरी तरफ देखने लगी। बगल के एक और दालान में पहुंची, देखा कि बीचोंबीच दरवाज़े का एक तहखाना मालूम पड़ता है, नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं और उसके ऊपर दो पल्ले किवाड़ के हैं जो इस समय खुले हैं।

चपला खड़ी होकर सोचने लगी कि इसके अन्दर जाना चाहिए या नहीं! कहीं ऐसा न हो कि इसमें उतरने के बाद यह दरवाज़ा बन्द हो जाये तो इसी में रह जाऊं, इससे मुनासिब है कि इसको भी आजमा लूं। पहले एक ढोंका इसके अन्दर डालूं। लेकिन अगर आदमी के जाने से यह दरवाज़ा बन्द हो सकता है तो ज़रूर ढोंके के गिरते ही बन्द हो जायेगा, तब इसके अन्दर जाकर देखना मुश्किल होगा, अस्तु ऐसी कोई तरकीब की जाय जिसमें उसके जाने से किवाड़ बन्द न होने पावे, बल्कि हो सके तो तोड़ ही देना चाहिए।

इन बातों को सोचकर चपला दरवाज़े के पास गई। पहले उसके तोड़ने की फिक्र की मगर न हो सका, क्योंकि वे पल्ले लोहे के थे। कब्जा उसमें नहीं था सिर्फ पल्ले के बीचोंबीच में चूल बनी हुई थी जो कि ज़मीन के अन्दर घुसी हुई मालूम पड़ती थी। वह चूल ज़मीन के अन्दर कहां जाकर अड़ी थी पता न लग सका।

चपला ने अपने कमर से कमन्द खोली और चौहरा करके उसका एक सिरा उस किवाड़ के पल्ले में खूब मजबूती के साथ बांधा, दूसरा सिरा उस कमन्द का एक खम्भे में जो किवाड़ के पास ही बांधा, इसके बाद एक ढोंका पत्थर का दूर से उस तहखाने में डाला। पत्थर पड़ते ही एक तरह की आवाज़ आने लगी जैसे किसी आंधी में से ज़ोर से हवा निकलने से आवाज़ आती है, साथ ही इसके जल्दी से एक पल्ला बन्द हो गया, दूसरा पल्ला भी बन्द होने के लिए खिंचा मगर वह कमन्द से कसा हुआ था, उसको तोड़ न सका, खिंचा-का-खिंचा ही रह गया। चपला ने सोचा-‘‘कोई हर्ज़ नहीं, मालूम हो गया कि यह कमन्द इस पल्ले को बन्द न होने देगी। अब बेखटके इसके अन्दर उतरो, देखो तो क्या होता है!’’ यह सोच चपला उस तहखाने में उतरी।

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