चन्द्रकान्ता - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

सातवां बयान

अब सवेरा हुआ ही चाहता है, महल में लौंडियों की आंखें खुलीं तो महारानी को न देख कर घबरा गईं, इधर-उधर देखा, कहीं नहीं। आखिर खूब शोरगुल मचा, चारों तरफ खोज होने लगी, पर कहीं पता न लगा। यह खबर बाहर तक फैल गई, सभी को फिक्र पैदा हुई। महाराज शिवदत्त लड़ाई से भागे हुए दस-पन्द्रह सवारों के साथ चुनार पहुंचे, किले के अन्दर घुसते ही मालूम हुआ कि महल से महारानी गायब हो गईं। सुनते ही जान सूख गई, दोहरी चपेट बैठी, धड़धड़ाते हुए महल में चले आये, देखा कुहराम मचा हुआ है, चारों तरफ से रोने की आवाज़ आ रही है।

इस वक़्त महाराज की अजब हालत थी, हवास ठिकाने नहीं थे, लड़ाई से भागकर थोड़ी ही दूर पर फौज़ को तो छोड़ दिया था और सब ऐयारों को कुछ समझा-बुझा आप चुनार चले आये थे, यहां यह कैफियत देखी। आखिर उदास होकर महारानी के बिस्तर के पास आये और बैठकर रोने लगे। तकिये के नीचे से एक काग़ज़ का कोना निकला हुआ दिखाई पड़ा जिसे महाराज ने खोला, देखा कुछ लिखा है। यह वही काग़ज़ था जिसे तेजसिंह ने लिखकर रख दिया था। अब उस पुर्जे को देख महाराज कई तरह की बातें सोचने लगे। एक तो महारानी का लिखा नहीं मालूम होता है, उनके अक्षर इतने साफ नहीं हैं। फिर किसने लिखकर रख दिया? अगर रानी का ही लिखा है तो उन्हें यह कैसे मालूम कि चन्द्रकान्ता फलां जगह छिपाई गई है? अब क्या किया जाये? कोई ऐयार भी नहीं जिसको पता लगाने के लिए भेजा जाये। अगर किसी दूसरे को वहां भेजूं जहां चन्द्रकान्ता कैद है तो बिल्कुल भण्डा फूट जाये।

ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातें देर तक महाराज सोचते रहे, आखिर जी में यही आया कि चाहे जो हो मगर एक दफे जरूर जाकर उस जगह देखना चाहिए जहां चन्द्रकान्ता कैद है। कोई हर्ज़ नहीं अगर हम अकेले जाकर देखें, मगर दिन में नहीं, शाम हो जाये तो चले। यह सोचकर बाहर आये और अपने दीवानखाने में भूखे-प्यासे चुपचाप बैठे रहे, किसी से कुछ न कहा मगर बिना हुक्म महाराज के बहुत से आदमी महारानी का पता लगाने जा चुके थे।

शाम होने लगी, महाराज ने अपनी सवारी का घोड़ा मंगवाया और सवार हो अकेले ही किले के बाहर निकले और पूरब की तरफ रवाना हुए। अब बिल्कुल शाम बल्कि रात हो गई मगर चांदनी रात होने के सबब साफ दिखाई देता था। तेजसिंह जो दरवाज़े के पास ही छिपे हुए थे महाराज शिवदत्त को अकेले घोड़े पर जाते देख साथ हो लिये, तीन कोस तक पीछे-पीछे तेजी के साथ चले गये मगर महाराज को यह न मालूम हुआ कि साथ-साथ कोई छिपा हुआ आ रहा है। जैसे–महाराज ने अपने घोड़े को एक नाले में चलाया जो बिल्कुल सूखा पड़ा था। जैसे-जैसे आगे जाते थे नाला गहरा मिलता जाता था और दोनों तरफ के पत्थर के कगार ऊंचे होते जाते थे। दोनों तरफ बड़ा भारी डरावना जंगल तथा बड़े-बड़े साखू और आसन के पेड़ थे। खूनी जानवरों की आवाज़ें कानों में पड़ रही थीं। जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते थे कगार ऊंचे और नाले के किनारे वाले पेड़ आपस में ऊपर से मिलते जाते थे।

इसी तरह से लगभग एक कोस चले गये। अब नाले में चन्द्रमा की रोशनी बिल्कुल नहीं मालूम होती थी। महाराज का घोड़ा पथरीली जमीन और अंधेरा होने के सबब से धीरे-धीरे जाने लगा, तेजसिंह बढ़कर महाराज के और पास हो गये। एकाएक कुछ दूर पर एक छोटी-सी रोशनी नज़र पड़ी जिससे तेजसिंह ने समझा कि शायद यह रास्ता यहीं तक आने का है और यही ठीक भी निकला। जब रोशनी के पास पहुँचे तो देखा कि एक छोटी-सी गुफा है, जिसके बाहर दोनों तरफ लम्बे-लम्बे ताकतवर सिपाही नंगी तलवार हाथों में लिये पहरा दे रहे हैं जो बीस के लगभग होंगे। भीतर भी साफ दिखाई देता था कि दो औरतें पत्थरों पर ढासना लगाये बैठी हैं। तेजसिंह ने पहचान तो लिया कि दोनों चन्द्रकान्ता और चपला हैं, मगर उनकी सूरत साफ-साफ नहीं नज़र पड़ीं।

महाराज को देखकर सिपाहियों ने पहचाना और एक ने बढ़कर घोड़ा थाम लिया, महाराज घोड़े पर से उतर पड़े। सिपाहियों ने दो मशाल जलाये जिनकी रोशनी में तेजसिंह को अब साफ चन्द्रकान्ता और चपला की सूरत दिखाई देने लगी, चन्द्रकान्ता का मुंह पीला हो रहा था, सिर के बाल खुले हुए थे और सिर फटा हुआ था। मिट्टी में सनी हुई बदहवास एक पत्थर से लगी पड़ी थी, और चपला बगल में एक पत्थर के सहारे सिर पर हाथ रखे बैठी थी। सामने खाने की चीजें रखी हुई थीं जिनके देखने से ही मालूम होता था कि किसी ने उन्हें छुआ तक नहीं। इन दोनों की सूरत से नाउम्मीदी बरस रही थी जिसे देखते ही तेजसिंह की आंखों से आंसू निकल पड़े।

महाराज ने आते ही इधर-उधर देखा, जहां चन्द्रकान्ता बैठी थी वहां भी चारों तरफ देखा, मगर कुछ मतलब न निकला क्योंकि वह रानी को खोजने आये थे, उस पुर्जे पर जो रानी के बिस्तर पर पाया था महाराज को बड़ी उम्मीद थी, मगर कुछ न हुआ, किसी से कुछ पूछा भी नहीं, चन्द्रकान्ता की तरफ भी अच्छी तरह न देखा और लौटकर घोड़े पर सवार हो पीछे फिरे, सिपाहियों को महाराज के इस तरह आकर फिर जाने से ताज्जुब हुआ मगर पूछता कौन? मजाल किसकी थी? तेजसिंह ने जब महाराज को मुड़ते देखा तो चाहा कि वहीं बगल में छिपा रहे मगर छिप न सके क्योंकि नाला तंग था और ऊपर चढ़ जाने को भी कहीं जगह न थी, लाचार नाले के बाहर होना ही पड़ा। तेजी के साथ महाराज के पहले नाले के बाहर हो गये और एक किनारे छिपे रहे। महाराज वहां से निकल शहर की तरफ रवाना हुए।

अब तेजसिंह सोचने लगे कि यहाँ से मैं अकेला चन्द्रकान्ता को कैसे छुड़ा सकूंगा? लड़ने का मौका नहीं, करूं तो क्या करूं? अगर महाराज की सूरत बनाकर जाऊं और कोई काम करूं तो वह भी ठीक न होगा क्योंकि महाराज अभी यहां से लौटे हैं, दूसरी कोई तरकीब करूं और काम न चले, बैरी को मालूम हो जाये, तो यहां से फिर चन्द्रकान्ता दूसरी जगह छिपा दी जायेगी, तब और मुश्किल होगी। इससे यह ठीक है कि कुमार के पास लौट चलूं और वहां से कुछ आदमियों को लाऊं, क्योंकि इस नाले में अकेले जाकर इन लोगों का मुकाबला करना ठीक नहीं।

यह सब कुछ सोच तेजसिंह विजयगढ़ की तरफ चले, रातभर चलते गये, दूसरे दिन दोपहर को वीरेन्द्रसिंह के पास पहुंचे। कुमार ने तेजसिंह को गले लगाया और बेताबी के साथ पूछा, ‘‘क्यों, कुछ पता लगा?’’ ज़वाब में हां सुनकर कुमार बहुत खुश हुए और सभी को विदा किया, केवल कुमार देवीसिंह, फतहसिंह सेनापति और तेजसिंह रह गये। कुमार ने खुलासा हाल पूछा, तेजसिंह ने सब हाल कह सुनाया और बोले, ‘‘अगर किसी दूसरे को छुड़ाना होता या किसी गैर को पकड़ना होता तो मैं अपनी चालाकी कर गुज़रता, अगर काम बिगड़ जाता तो भाग निकलता, मगर मामला चन्द्रकान्ता का है जो बहुत सुकुमार है। न तो मैं अपने हाथ से उसकी गठरी बांध सकता हूं और न किसी तरह की तकलीफ देना चाहता हूं। होना ऐसा चाहिए कि वार खाली न जाये। मैं सिर्फ देवीसिंह को लेने आया हूं और अभी लौट जाऊंगा, मुझे मालूम हो गया कि आपने महाराज शिवदत्त पर फतह पाई है। अभी कोई हर्ज़ भी देवीसिंह के बिना आपका न होगा।’’

कुमार ने कहा, ‘‘देवीसिंह भी चलें और मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं, क्योंकि यहां तो अभी लड़ाई की कोई उम्मीद नहीं और फिर फतहसिंह हैं कोई हर्ज़ भी नहीं।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘अच्छी बात है आप भी चलिए।’’ यह सुनकर कुमार उसी वक़्त तैयार हो गये और फतहसिंह को बहुत-सी बातें समझा-बुझाकर शाम होते-होते वहां से रवाना हुए। कुमार घोड़े पर, तेजसिंह और देवीसिंह पैदल कदम बढ़ाते चले। रास्ते में कुमार ने शिवदत्त पर फतह पाने का सारा हाल कहा और उन सवारों का हाल भी कहा जो मुंह पर नकाब डाले हुए थे और जिन्होंने आड़े वक़्त पर मदद की थी। उनका हाल सुन तेजसिंह भी हैरान हुए मगर कुछ खयाल में न आया कि वे नकाबपोश कौन थे?

यही सब सोचते जा रहे थे, रात चांदनी थी, रास्ता साफ दिखाई दे रहा था, कुल चार कोस के लगभग गये होंगे कि रास्ते में पंडित बद्रीनाथ अकेले दिखाई पड़े और उन्होंने भी कुमार को देख सलाम किया। कुमार ने सलाम का ज़वाब हंसकर दिया। देवीसिंह ने कहा, ‘‘अजी बद्रीनाथ जी, आप क्या उस डरपोक गीदड़ दगाबाज और चोर का संग किये हैं। हमारे दरबार में आइए, देखिए हमारा सरदार क्या शेरदिल और इन्साफ पसन्द है।’’ बद्रीनाथ ने कहा, ‘‘तुम्हारा कहना बहुत ठीक है और एक दिन ऐसा ही होगा, मगर जब तक महाराज शिवदत्त से मामला तय नहीं हो जाता मैं कब आपके साथ हो सकता हूं, और अगर हो भी जाऊं तो आप लोग कब मुझ पर विश्वास करेंगे, आखिर मैं भी ऐयार हूं!’’ इतना कह और कुमार को सलाम कर जल्दी से दूसरा रास्ता पकड़ एक घने जंगल में जा नज़र से गायब हो गये। तेजसिंह ने कुमार से कहा, ‘‘रास्ते में बद्रीनाथ का मिलना ठीक न हुआ, अब वह ज़रूर इस बात की खोज़ में होगा कि हम लोग कहां जाते हैं?’’ देवीसिंह ने कहा, ‘‘हां, इसमें कोई शक नहीं कि यह शगुन खराब हुआ।’’ यह सुनकर कुमार का कलेजा धड़कने लगा। बोले, ‘‘फिर अब क्या किया जाये?’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘इस वक़्त और कोई तरकीब तो हो ही नहीं सकती, हां, एक बात है कि जंगल का रास्ता छोड़ मैदान-मैदान चलें। ऐसा करने से पीछे का आदमी आता हुआ मालूम होगा।’’ कुमार ने कहा, ‘‘अच्छा, तुम आगे चलो।’’

अब वे तीनों जंगल छोड़ मैदान में हो लिए। पीछे–फिर-फिर के देखते जाते थे मगर कोई आता हुआ न मालूम पड़ा। रात भर बेखटके चले गये। अब दिन निकला एक नाले के किनारे तीनों आदमियों ने बैठ ज़रूरी कामों से छुट्टी पा स्नान-सन्ध्या किया और फिर रवाना हुए। पहर दिन चढ़ते एक बड़े जंगल में ये लोग पहुंचे* जहां से वह नाला जिसमें चन्द्रकान्ता और चपला थीं, दो कोस बाकी था। तेजसिंह ने कहा, ‘‘दिन इसी जंगल में बिताना चाहिए शाम हो जाये तो वहां चलें, क्योंकि काम रात ही में ठीक होगा।’’ यह कह एक बहुत बड़े सलई के पेड़ तले डेरा जमाया। कुमार के वास्ते जीनपोश बिछा दिया और घोड़े को खोल गले में लम्बी रस्सी डाल चरने के लिए छोड़ दिया। दिन भर बातचीत और तरकीब सोचने में गुज़र गया, सूरज अस्त होने पर ये लोग वहां रवाना हुए। थोड़ी देर में उस नाले के पास जा पहुंचे, पहले दूर ही खड़े होकर चारों तरफ निगाह दौड़ाकर देखा, जब किसी की आहट न मिली तब नाले में घुसे।(* चूनार जाने का ठीक रास्ता भी था मगर तेजसिंह कुमार को लिए हुए जंगल और पहाड़ी रास्ते से गये थे।)

कुमार इस नाले को देखकर बहुत हैरान हुए और बोले, ‘‘अजब भयानक नाला है!’’ धीरे-धीरे आगे बढ़े, जब नाले के अन्तिम सिरे पर पहुंचे जहां पहले दिन तेजसिंह ने चिराग जलते देखा था तो वहां अंधेरा पाया। तेजसिंह का माथा ठनका कि यह क्या मामला है। देखा कि कई आदमी ज़मीन पर पड़े हैं। अब तो तेजसिंह ने अपने बटुए में से सामान निकाल रोशनी की जिससे साफ मालूम हुआ कि जितने पहरे वाले पहले दिन देखे थे, सब जख्मी होकर मरे पड़े हैं। अन्दर घुसे, कुमारी और चपला का पता नहीं, हां दोनों के गहने टूटे-फूटे पड़े थे, और चारों तरफ खून जमा हुआ था। कुमार से रहा न गया, एकदम ‘हाय’ करके गिर पड़े और आंसू बहने लगे। तेजसिंह समझाने लगे कि, ‘‘आप इतने बेताब क्यों हो गये? जिस ईश्वर ने हमें यहां तक पहुंचाया वही फिर उस जगह पहुंचायेगा, जहां कुमारी हैं!’’ कुमार ने कहा, ‘‘भाई, अब मैं चन्द्रकान्ता के मिलने से नाउम्मीद हो गया, ज़रूर वह परलोक सिधार गई!’’ तेजसिहं ने कहा, ‘‘कभी नहीं, अगर ऐसा होता तो इन्हीं लोगों में वह भी पड़ी होती।’’ देवीसिंह बोले, ‘‘कहीं बद्रीनाथ की चालाकी तो नहीं, भई?’’ इन्होंने ज़वाब दिया, ‘‘यह बात भी जी में नहीं बैठती, भला अगर हम यह भी समझ लें कि बद्रीनाथ की चालाकी हुई तो इन प्यादों को मारने वाला कौन था? अजब मामला है, कुछ समझ में नहीं आता। खैर कोई हर्ज़ नहीं, वह भी मालूम हो जायेगा, अब यहां से जल्दी चलना चाहिए।’’

कुंवर वीरेन्द्रसिंह की इस वक़्त कैसी हालत थी, उसका न कहना ही ठीक है। बहुत समझा-बुझाकर वहां से कुमार को उठाया और नाले के बाहर लाये। देवीसिंह ने कहा, ‘‘भला वहां तो चलो, ‘‘जहां शिवदत्त की रानी को रक्खा है।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘चलो।’’ तीनों वहां गये, देखा महारानी कलावती भी वहां नहीं हैं, तो और भी तबीयत परेशान हुई।

आधी रात से ज़्यादा चुकी थी, तीनों आदमी बैठे सोच रहे थे कि यह क्या मामला हो गया। यकायक देवीसिंह बोले, ‘‘गुरुजी, मुझे एक तरकीब सूझी है जिसके करने से सब पता चल जायेगा कि क्या मामला है। आप ठहरिए, इसी जगह आराम कीजिए, मैं पता लगाता हूं। अगर बन पड़ेगा तो ठीक पता लगाने का सबूत भी लेता आऊंगा।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘जाओ, तुम ही कोई तारीफ का काम करो, हम दोनों इसी जंगल में रहेंगे।’’ देवीसिंह एक देहाती पंडित की सूरत बनाकर रवाना हुए। वहां से चुनार करीब ही था, थोड़ी देर में जा पहुंचे। दूर से देखा, एक सिपाही टहलता हुआ पहरा दे रहा है। एक शीशी हाथ में ले उसके पास गये और एक अशर्फी दिखाकर देहाती बोली में बोले, ‘‘इस अशर्फी को आप ले लीजिए और इस इत्र को पहचान दीजिए कि किस चीज का है। हम देहात के रहने वाले हैं, वहां एक गन्धी आया और उसने यह इत्र दिखाकर हमसे कहा कि अगर इसको पहचान दो तो हम पांच अशर्फी तुमको देंगे, सो हम देहाती आदमी क्या जानें, कौन चीज का इत्र है, इसलिए रातोंरात यहां चले आये। परमेश्वर ने आपको मिला दिया है, आप राजदरबार के रहने वाले ठहरे, इत्र बहुत देखा होगा, इसको पहचान के बता दीजिये तो हम इसी समय लौट के गांव पहुंच जायें, सवेरे ही ज़वाब देने का उस गन्धी से वादा है।’’ देवीसिंह की बात सुन और पास ही एक दूकान के दरवाज़े पर जलते हुए चिराग की रोशनी में अशर्फी देख खुश हो वह दिल ही दिल में सोचने लगा कि अजब बेवकूफ आदमी से काम पड़ा है। मुफ्त की अशर्फी मिलती है, ले लो, जो कुछ जी में आवे बता दो, क्या कल मुझसे अशर्फी लेने आयेगा? यह सोच अशर्फी को अपने खलीते में रख ली और कहा, ‘‘यह कौन बड़ी बात है, हम बता देते हैं!’’ उसने शीशी का मुंह खोलकर सूंघा, बस फिर क्या था सूंघते ही जमीन पर लेट गया, दीन-दुनिया की खबर ही न रही, बेहोश होने पर देवीसिंह उस सिपाही की गठरी बांध तेजसिंह के पास लाये और कहा, ‘‘यह किले पर पहरा देने वाला है, पहले इससे पूछ लेना चाहिए, अगर काम न चलेगा तो फिर दूसरी तरकीब की जायेगी।’’ यह कह उस सिपाही को होश में लाये।

सिपाही हैरान हो गया कि यहां कैसे आ फंसा। देवीसिंह को उस देहाती पंडित की सूरत में सामने खड़े देखा, दूसरी तरफ दो बहादुर और दिखाई दिये। कुछ कहना ही चाहता था कि देवीसिंह ने पूछा, ‘‘यह बताओ कि तुम्हारी महारानी कहां हैं? जल्दी बताओ।’’ उस सिपाही ने हाथ-पैर बंधे रहने पर भी कहा कि ‘‘ तुम महारानी को पूछने वाले कौन हो, तुम्हें मतलब?’’ तेजसिंह ने उठकर एक लात मारी और कहा, ‘‘बताता है कि मतलब पूछता है?’’ अब तो उसने बेउज्र कहना शुरू कर दिया कि महारानी कई दिन से गायब है, कहीं पता नहीं लगता। महल में गुल-गपाड़ा मचा हुआ है, इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं जानता।

तेजसिंह ने कुमार से कहा, ‘‘अब पता लगाना कई रोज़ का काम हो गया, आप अपने लश्कर में जाइए, मैं ढूंढ़ने की फिक्र करता हूं!’’कुमार ने कहा, ‘‘ अब मैं लश्कर में न जाऊंगा।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘अगर आप ऐसा करेंगे तो भारी आफत होगी, शिवदत्त को यह खबर लगी तो फौरन लड़ाई शुरू कर देगा, महाराज जयसिंह यह हाल पाकर और भी घबरा जायेंगे, आपके पिता सुनते ही सूख जायेंगे।’’ कुमार ने कहा, ‘‘चाहे जो हो, चन्द्रकान्ता ही नहीं है तो दुनिया में कुछ हो, मुझे क्या परवाह?’’ तेजसिहं ने बहुत समझाया कि ऐसा नहीं करना चाहिए आप धीरज को न छोड़िए, नहीं तो लोंगों का जी टूट जायेगा। फिर कुछ न कर सकेंगे। आखिर कुमार ने कहा, ‘‘अच्छा कल तक हमको अपने साथ रहने दो, तब तक अगर पता न लगा तो हम लश्कर चले जायेंगे और फौज़ लेकर चुनार पर चढ़ जायेंगे। हम लड़ाई शुरू कर देंगे, तुम चन्द्रकान्ता की खोज करना।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘अच्छा, यही सही!’’ ये सब बातें इस तौर पर हुई थीं कि उस सिपाही को कुछ भी नहीं मालूम हुआ जिसको देवीसिंह पकड़ लाये थे।

तेजसिंह ने उस सिपाही को एक पेड़ के साथ कस के बांध दिया और देवीसिंह से कहा, ‘‘अब तुम यहां कुमार के पास ठहरो मैं जाता हूं और जो कुछ हाल है पता लगाता हूं।’’

देवीसिंह ने कहा, ‘‘अच्छा जाइए।’’

तेजसिंह ने देवीसिंह से कई बातें पूछीं और उस सिपाही का भेष बना किले की तरफ रवाना हुए।

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