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नाटक-एकाँकी >> चन्द्रहार (नाटक)

चन्द्रहार (नाटक)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :222
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8394
आईएसबीएन :978-1-61301-149

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‘चन्द्रहार’ हिन्दी के अमर कथाकार प्रेमचन्द के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘ग़बन’ का ‘नाट्य–रूपांतर’ है


जग्गो—भैया नहीं आ रहे?

देवीदीन—भैया अब नहीं आयेंगे। जब अपने ही अपने न हुए तो बेगाने हैं ही।

(वह दृष्टि से ओझल हो जाता है, साथ ही बुढ़िया भी। दारोगा। और रमानाथ दोनों कई क्षण उन्हें जाते देखते हैं। फिर एक दूसरे को देखते हैं और दृष्टि झुका लेते हैं। यहीं परदा गिरता है।)

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