भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

छठवाँ बयान


दिन तीन पहर से ज्यादे ढक चुका है और बाजारों में लोगों की आमदरफ्त बढ़ती जा रही है जो कि दोपहर के समय धीरे-धीरे घटती हुई बिल्कुल कम हो गई थी। बाजार की बड़ी-बड़ी दूकानें भी धीरे-धीरे खुलती जा रही हैं जो सुबह से दोपहर तक व्यवहार करने के बाद बन्द हो गई थीं और उन छोटी-छोटी दूकानों की भी रौनक बढ़ती जा रही है जिनके मालिक सुबह से खोल कर दो घण्टे रात जाते तक भी बन्द करना पसन्द नहीं करते।

जमानिया यद्यपि बहुत छोटा राज्य और मामूली शहर है मगर फिर भी यहाँ का चौक और महाजनी बाजार रौनक पर है और जरूरत की सभी चीजें मिल जाया करती हैं, महाजनों में लेन-देन हुण्डी-पत्री का व्यवहार भी अच्छी तरह से होता है तथा बजाजे और बनारसी माल की दुकानें भी बहुत-सी हैं जिनकों कभी इस बात की शिकायत करने का मौका नहीं मिलता कि ‘बिक्री कम होती है और मुनाफे में लज्जत नहीं है’! हाँ इस बात की शिकायत लोग जरूर करते हैं कि हमारे राजा साहब को किसी बात का शौक नहीं, अगर होता तो इस शहर की रौनक चौगुनी हो गई होती।

शहर की गलियाँ बहुत तंग और इमारतें मामूली दर्जे की हैं परन्तु चौक और महाजनी बाजार की सड़कें कुछ चौड़ी, इमारतें तथा दूकानें बड़ी-बड़ी हैं, क्योंकि इसके पास ही यहीं के राजा साहब का महल है और बड़े-बड़े ओहदेदारों तथा कारिन्दों और फौजी अफसरों का रहना भी इस बाजार के पास ही होता है।

धीरे-धीरे चौक बाजार में भिश्तियों ने छिड़काव भी कर दिया (जो कि दुकानदारों की तरफ से थे) और दूकानें सब खुल गईं तथा संध्या होने तक बाजार पूरी रौनक पर हो गया और सैलानी लोग भी टहलते हुए दिखाई देने लगे, ऐसे समय हम एक ऐसे आदमी को जो रंग-ढंग से कोई देहाती जमींदार मालूम होता था सड़क पर टहलते और इधर-उधर निगाहें दौड़ाते हुए देखते हैं।

इसकी पोशाक कुछ अजीब ढंग की है। सर पर बहुत बड़ी गुलेनार रंग की पगड़ी और बदन में घेरदार जामा है जिसके दोनों बगल खूब चुन्नट पड़ी हुई है तथा पायजामे की मोहरी भी इतनी चौड़ी है कि एक-एक पैर मैं खासा मोटा-ताजा आदमी बखूबी घुस जाय। बसन्ती रंग का बारह या चौदह हाथ लम्बा कपड़ा जिसमें चारों चरफ सुनहरा गोटा टंका हुआ है कमर में लपेटे है और उसमें एक खंजर भी खुँसा हुआ था।

माथे में रामानन्दी तिलक और गले में तीन-चार छोटे-बड़े दानों की तुलसी की माला है और सबसे बढ़ कर यह बात है कि हाथ में मोटा-सा माथे तक का लट्ठ लिए हुए है जिसे हर कदम पर अपने भद्दे पैरों के साथ-ही-साथ पटकता हुआ चल रहा है।

इस आदमी के पीछे-पीछे इसका एक नौकर भी है जिसके सर पर गन्दा मटमैला साफा और बदन में जगह-जगह से फटी हुई मिरजई पड़ी हुई है। यद्यपि उसकी धोती का कपड़ा छोटा नहीं है मगर घुटने के उपर ही दिखाई देता है। कन्धे पर छोटा-सा थैला जिसमें शायद लोटा, डोरी, कोयला तथा तम्बाकू वगैरह होगा और हाथ में बड़ा-सा नारियल लिये कुछ पीछे-पीछे जा रहा है।

इस जमींदार सूरत वाले आदमी की निगाह चौक की एक बहुत बड़ी दूकान पर पड़ी जिसके ऊपर लटकते हुए तख्ते पर बड़े हरफों में यह लिखा हुआ था-

यहाँ पर ऐयारी का सभी सामान मिलता है,

ऐयारी सिखाई जाती है, और 

ऐयारों को रोजगार भी दिलाया जाता है। 

आइए 

दूकान की सैर कीजिये


इस लिखावट को पढ़ कर वह आदमी अटक गया और दूकान की तरफ गौर से देखने लगा। दूकान बड़ी खूबसूरत रंगी हुई थी। खम्भों पर रंग-बिरंगे कपड़ों के गिलाफ चढ़े हुए थे और आगे की तरफ एक सुन्दर सायबान बना हुआ था जिसके चबूतरे पर बैठने के लिए छोटी-बड़ी बहुत-सी कुर्सियाँ रक्खी हुई थीं। कमरे में तलवार लगाये चार-पाँच सिपाही भी काम करते हुए दिखाई देते थे।

कुछ देर देखने के बाद वह आदमी दूकान के अन्दर चला गया और वहाँ की चीजों को बड़े गौर से देखने लगा। एक आदमी जो शायद सौदा बेचने के लिए मुकर्रर था उसके सामने आया और बड़ी लनतरानी के साथ तारीफ करता हुआ तरह-तरह की चीज़ें दिखाने लगा जोकि शीशे की सुन्दर आलमारियों में करीने से सजाई हुई थीं, दूकानदार ने कहा-

‘‘देखिये तरह-तरह की दाढ़ी और मूँछे तैयार हैं, बीस वर्ष से लेकर सौ वर्ष का आदमी बनना चाहे तो बन सकता है। जो पूरी तौर पर ऐयारी नहीं जानते। बनावटी दाढ़ी-मूछें तैयार करने का जिन्हें इल्म नहीं, वे इन दाढी़-मूँछों को बड़ी आसानी से लगा कर लोगों को धोखे में डाल सकते हैं, मगर जो काबिल ऐयार हैं और मनमानी सूरत बनाया करते हैं अथवा जो किसी की नकल उतारने में उस्ताद हैं उनके लिए तरह-तरह के खुले हुए बाल अलग रक्खे हुए हैं। (लकड़ी के डिब्बों को खोल कर दिखाते हुए) इन सुफेद और स्याह बालों से वे अपनी मनमानी सूरतें बना सकते हैं, देखिये बारीक, मोटे, सादे और घुँघराले वगैरह सभी तरह के बाल मौजूद हैं, इसके अलावा यह देखिये (दूसरी आलमारी की तरफ इशारा करके) तरह–तरह की टोपियाँ जोकि पूरब। पश्चिम, उत्तर और दक्खिन के मुल्कों वालें पहिरा करते हैं तैयार लटक रही हैं, साफे।

पगड़ी और मुडासों की भी कमी नहीं है, बस सर पर रख लेने की देर है! आइए इधर दूसरे कमरे में देखिए ये तरह-तरह के बटुए लटक रहे हैं जिनमें रखने के लिए एक तरह का सामान भी इस दुकान में मौजूद रहता है। (तीसरे कमरे में जाकर) इन छोटे-बड़े हल्के-भारी सभी तरह के कमन्द और हर्बों की सैर कीजिये जिनकी प्रायः सभी ऐयारों को जरूरत पड़ती है। आप ऐयार हैं इसलिए मैं आपको यहाँ की हर एक चीज की सैर अच्छी तरह कराया चाहता हूँ।’’

‘‘आप ऐयार हैं’’ यह सुन कर वह जमींदार ठमक गया और दूकानदार का मुँह देखने लगा।

दूकान० : आप आश्चर्य क्यों करते है, मैं अभी बहुत-सी चीजें आपको दिखलाऊँगा, क्योंकि ऐयार होने के साथ ही आप अमीर भी मालूम पड़ते हैं।

जमींदार० : आपका खयाल गलत है। आपने क्योंकर जाना कि हम ऐयार हैं और अमीर हैं?

दूकान० : यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, मेरा तो दिनरात का यह काम ही ठहरा। मैं खुद ही ऐयार हूँ और हर घड़ी ऐयारों से वास्ता पड़ा ही करता है। अक्सर ऐयार लोग मुझसे अपने काम में सलाह लेने आया करते हैं और मैं उन्हें अपनी फीस लेकर अच्छी सलाह दिया करता हूँ मगर किसी का भेद नहीं खोलता और एक की बात दूसरे से नहीं कहता।

यह तो हमारी हाल ही में यह नई दूकान हुई है, लेकिन हर एक बड़े शहर में हमारे मालिक की बड़ी-बड़ी दूकानें है जिनमें मेरे ऐसे-ऐसे सैकड़ों ऐयार काम करने के लिए नौकर हैं। ऐयारों से दिन-रात व्यवहार करके हम लोग पक्के हो गए हैं अतएव आपको पहिचान लिया तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है और इसके लिए आप किसी तरह की चिन्ता न करें। आइये और इस कमरे की सैर कीजिए जिसमें तरह-तरह की दवाइयाँ तैयार हैं और होती हैं।

दूकानदार की चलती-फिरती बातें सुन कर वह जमींदार दंग हो गया और फिर भी न बोला, उसके साथ उस दूसरे कमरे की सैर करने चला गया और वहाँ देखा कि तरह-तरह की बहुत-सी शीशे की आलमारियों में सोने, चाँदी, ताबें, और पीतल के छोटे-बड़े कई प्रकार डिब्बे और डिबियाएँ सजाई रक्खी हैं और कई नौकर जमीन पर बैठे खलबट्टा चला रहे हैं जिनमें हरी, पीली, सुफेद, काली तरह-तरह की दवाएँ घुट रही हैं।

दूकान० : यह देखिए इन आलमारियों में जितने डिब्बे और डिबियायें आप देखते हैं सभी में तरह-तरह की दवाइयाँ मौजूद हैं जो कि ऐयारों के सुभीते के लिए बना कर रक्खी हुई हैं। हमारी दवाओं में इस बात की शर्त है कि पाँच बरस तक कुछ भी खराब नहीं होती और इनके इस्तेमाल से किसी का नुकसान नहीं पहुँचता। इस दूकान में कोई भी ऐसी दवा आपको नहीं मिलेगी जिसमें किसी तरह का जहरीला असर हो या जिससे किसी को किसी तरह का नुकसान पहुँचे, क्योंकि किसी ऐयार का यह धर्म नहीं है कि अपने काम से सर्वसाधारण या खास व्यक्ति को नुकसान पहुँचावे, अगर ऐसा करे तो वह ऐयार नहीं पूरा बेईमान और दगाबाज है।

ऐयार का यही काम है कि अपने मालिक के लिए छिपे हुए मामले का पता लगाये; दुष्टों, चोरों और खूनियों का पता लगाये; राजाओं-रईसों की लड़ाइयों को जिनमें बहुत-से आदमियों का खून होना संभव है अपनी कारीगरी से रोके और सहज ही में मामला को तै कर डाले, जो लोग इसके विपरीत करते हैं उन्हें ऐयार नहीं समझता। वे चोर, बदमाश और डाकू हैं तथा किसी भले आदमी के पास बैठने लायक नहीं और उनका किसी रईस को भरोसा न करना चाहिए। अस्तु इस दूकान में जितनी चीजें हैं सब ईमानदार ऐयारों ही के लिए हैं।

सम्भव है कि इन चीजों से कोई बुरा काम ले जिसमें कि हम लोगों का कोई कसूर नहीं है मगर हम लोग अगर किसी को ऐसा करते देखते और सुनते हैं तो सजा देने के लिए भी तैयार हो जाते हैं, हम लोग बहुत ठीक और कीमती दवाइयाँ रखते हैं, हमारे यहाँ की बेहोशी की दवा अगर किसी को ज्यादे भी खिला-पिला या सुँघा दी जाय तो उसका कुछ नुकसान नहीं होता या अगर पाँच-पाँच सात-सात दिन तक भी उससे किसी आदमी को बेहोश रक्खा जाय तो दिल और दिमाग में किसी तरह की खराबी नहीं पहुँच सकती, इसी तरह चेहरे पर लगाने के लिए भी जितने तरह के रोगन हैं उनसे बदन की जिल्द में धब्बा नहीं पड़ने पाता और न चमड़े का रंग ही बदलता है जिल्द में खुरदुरापन नहीं आता।

इसके अलावा पक्का रोगन भी इस दूकान में मौजूद है जो कि एक खास किस्म के अर्क से अगर धोया न जाय तो महीनों तक अपना रंग कायम रखता है, मसा और तिल बनाने का मसाला भी इस दूकान में बहुत अच्छा तैयार है। तारीफ तो यह है कि हमारे यहाँ की किसी दवा में बदबू नहीं है, सभी खूशबूदार चीजों के पुट देकर तैयार की जाती हैं। आप इस दूकान की कोई चीज इस्तेमाल करके देखिए, हाँ इस दूकान में खाने की चीजें भी ऐसी बनती हैं कि जिन्हें आप महीनों तक ऐयारी के बटुए में रख कर सफर में काम ले सकते हैं और बिगड़ने नहीं पाती तथा उनमें किसी तरह की छूत भी नहीं है अर्थात् खालिस घी, चीनी, दूध और फल से बनाई जाती है। आप नमूने के तौर पर कुछ खाकर भी देख सकते हैं।

जमी० : बेशक आपकी दूकान बड़े काम की है, मगर मैं समझता हूँ कि यह अभी थोड़े ही दिनों से कायम हुई है।

दुकानदारः यह तो मैं खुद ही कह चुका हूँ कि बड़े शहरों में हमारे मालिक की बहुत-सी दूकानें हैं, यहाँ भी थोड़े दिनों से एक शाखा खोली गई है।

इतने ही में एक आदमी की सूरत देख कर वह जमींदार चौंक पड़ा जो कि आलमारियों के शीशों को रेशमी कपड़े से पोछ कर साफ कर रहा था। यद्यपि जमींदार ने अपने दिल के भाव को छिपाने के लिए बड़ी कोशिश की मगर फिर भी दूकानदार समझ ही गया और बोला, ‘‘मगर इस शहर में हम लोगों को नौकरों की बड़ी तकलीफ हुई। हम सिर्फ सात आदमी ऐसे हैं जो कि एक साथ मालिक के भेजे हुए इस शहर में आये हुए हैं और जिनको कि हम अपना साथी कह सकते हैं।

बाकी के जितने आदमी आप देखते हैं सब इसी शहर में नौकर रक्खे गये हैं और इसीलिए हम लोग दवा के काम में इनसे मदद नहीं लेते।’’

जमी० : ठीक है, यह काम आपने बड़ी होशियारी का किया क्योंकि (धीरे-से कान में मुँह लगा कर) इस शहर के आदमी बड़े बेईमान होते हैं खास कर इन दिनों तो..।

दूकान० : मैं उम्मीद करता हूँ कि आपसे इस काम में मुझे मदद मिला करेगी।

जमीं० : जरूर, मैं अक्सर आया करूँगा और अपने दोस्तों को भी लाऊँगा!

दूकान० : कोई चीज खरीदने की इच्छा है?

जमीं० : हाँ, मुझे कुछ चीजों की जरूरत भी है जो कि मैं एकान्त में आपसे कहूँगा, आप किसी दूसरे कमरे में चलिए।

जमींदार को साथ लिए दूकानदार साहब जिसका नाम रामेश्वरचन्द्र था, एक दूसरे कमरे में चले गये जो खास करके ग्राहकों और रईसों के बैठने व आराम करने के लिए मुकर्रर था। यह कमरा बहुत साफ और साधारण ढँग पर सजा हुआ था। इसकी दीवार और छत आसमानी रंग की थी और जमीन पर सुफेद फर्श बिछा हुआ था तथा बारह कुर्सियाँ और चार-पाँच कोच भी रक्खे हुए थे जिनकी गद्दियों के ऊपर सुफेद चाँदनी बन्द के सहारे बँधी हुई थी। छत में दस-बारह शीशे लटक रहे थे जिनमें इस समय रोशनी हो चुकी थी। रामेश्वचन्द्र ने जमींदार को ले जाकर एक कोच पर बैठा दिया तथा आप एक कुर्सी खैंच कर उनके पास ही बैठ गया और बातचीत करने लगा।

रामेश्वर० : हाँ, अब आप फरमाएँ आपको किस-किस चीज की जरूरत है?

जमींदार० : एक तो मुझे ऐसी पोशाक की जरूरत है जो खास काबुल के रहने वाले अमीर मुगल लोग पहिरते हैं।

रामेश्वर० : तैयार, मौजूद है, और फरमाइये?

जमींदार० : ऐसी दवा भी चाहिये जो आदमी को कम-से-कम सात दिन तक के लिए गूँगा बना सके

रामेश्वर० : करीब-करीब ऐसी ही दवा मैं दे सकता हूँ जो कि किसी की जुबान पर लगा देने से वह बोलने लायक न रहेगा। जुबान की शक्ति बिल्कुल जाती रहेगी मगर उसे खाने-पीने में किसी तरह की तकलीफ न होगी और न कोई चीज बदजायका मालूम पड़ेगी।

जमींदार० : बस इस वक्त मैं बतौर आजमाइश के सिर्फ ये दो चीज ही आपके यहाँ से खरीदूँगा, अगर आपके यहाँ की दवा ठीक निकली तो मैं दो-तीन दिन में आपसे मिल कर बहुत-सी चीजें खरीदूँगा।

दूकानदार रामेश्वरचन्द्र ने थोड़ी ही देर में दोनों चीजें लाकर जमींदार के सामने रख दीं और दस अशर्फी उनकी कीमत माँगी जो कि उसी वक्त जमींदार ने अपनी कमर से निकाल कर दे दी और कहा कि-‘ये चीजें मेरे नौकर के हवाले कर दी जायें जिसे कि मैं दूकान के बाहर छोड़ आया हूँ, दूकानदार ने ऐसा ही किया चलते समय जमींदार ने दूकानदार से कहा–

जमींदार० : दूकान के लिए यह मकान आपको बहुत अच्छा मिल गया है, असल में यह ऐयारों के ही रहने लायक है। मैं इसके हर दर्जे, कोठरियों, कमरों और तहखानों से वाकिफ हूँ।

रामेश्वर० : जी हाँ, यह मकान हमको बहुत अच्छा मिल गया है और मकान मालिक भी बहुतनेक आदमी हैं।

जमींदार : हाँ, मैं जानता हूँ, यह मकान यहाँ के एक ओहदेदार रईस दामोदर सिंह का है और उन्होंने अपने दामाद इन्द्रदेव को दहेज के साथ दे दिया है, तो आपने इसे किससे किराये पर लिया है? दामोदरसिंहजी से या इन्द्रदेव से?

रामेश्वर० : देवजी की सूरत मैंने अभी तक नहीं देखी मगर सुना है कि यहाँ के दारोगा साहब के वे गुरूभाई हैं और बड़े लायक आदमी हैं?

जमींदार० : ठीक है, वास्तव में ऐसा ही है।

इतना कह कर जमींदार वहाँ से रवाना हुआ मगर अभी दूकान के बाहर नहीं हुआ था कि सामने से दूकान के अन्दर आते हुए गदाधरसिंह पर उसकी निगाह पड़ी जो कि इस समय अपनी असली सूरत में था। जमींदार भूतनाथ को देख कर सहम गया लेकिन भूतनाथ ने उस पर एक मामूली निगाह डालने के अतिरिक्त और कुछ खयाल नहीं किया।

उस जमींदार के चले जाने के बाद रामेश्वरचन्द्र ने भूतनाथ को अन्दर वाले एकान्त के कमरे में बड़ी खातिर से बैठाया और पूछा, ‘‘कहिए कुशल तो है?’’

भूत० : हम लोगों से कुशल-मंगल पूछना तो व्यर्थ ही है जब तक निद्रादेवी की गोद में हैं तब तक तो कुशल है और जहाँ उससे सम्बन्ध छूटा कि दिमाग में चक्कर आने लगे। तरह-तरह के खयालात, तरह-तरह के विचार और तरह-तरह के मनसूबों से दम-भर के लिए भी फुरसत नहीं। केवल इतना ही नहीं शरीर का सुख भी मिलना कठिन ही होता है, न दिन को दिन गिनना पड़ता है न रात को रात, न जाड़े का खौफ न गर्मी का खयाल, न बरसात से डर न धूप से परहेज। बस केवल अपने काम की धुन लगी रहती है, जिस पर भी मेरे ऐसे कम्बख्त का तो पूछना ही क्या है जिसे मालिक के काम की फिक्र तो नाम मात्र को ही है परन्तु बाहरी सैकड़ों तरफ के तरद्दुदों का शिकार हो रहा है। सच तो यों है कि ऐयारी का पेशा ही बहुत बुरा होता है।

रामे० : (मुस्कुरा कर) भला आपकी इस बात को मैं क्योंकर मान लूँगा?

भूत० :सो क्यों?

रामे० : आपको ऐयारी पेशे में तो किसी तरह की तकलीफ हुई नहीं, हाँ मानसिक विकारों के कारण आप जरूर परेशान हो रहे हैं। इसमें ऐयारी पेशे का तो कोई कसूर है नहीं, इसे तो आप मुफ्त ही बदनाम कर रहे हैं।

भूत० : एक तौर पर तुम्हारा कहना भी ठीक है मगर मेरे मानसिक विकारों की उत्पत्ति तो ऐयारी ही के सबब से है।

रामे० : सो भले ही हुआ करे। सभी ऐयारों का दिल तो एक-सा नहीं होता। इन्द्रदेव क्या ऐयार नहीं? फिर आपकी तरह तरद्दुद में क्यों नहीं फँसते?

भूत० : (मुस्कुरा कर) उनकी बात जाने दो! वे महात्मा हैं बल्कि देवता हैं, हम लोग नालायक और अभागे हैं अतएव दुःख भी हमीं लोगों के हिस्से में पड़ा हुआ है। खैर इस बहस को जाने दो क्योंकि मुझे इस समय इतनी फुरसत नहीं है।

यह बताओ कि तुमको भैयाराजा की कुछ खबर है? मैं इस समय उन्हीं का पता लगाने के लिए तुम्हारे पास आया। तुम्हारी दूकान तो हम लोगों के लिए एक लाभदायक अड्डा है।

रामे० : इसी ख्याल से तो यह कारखाना खोला गया है। अच्छा तो आप इस समय भैयाराजा का केवल पता ही पूछना चाहते हैं या उनसे मिलना भी चाहते हैं?

भूत० : वाह वाह, अगर मुलाकात हो जाय तो फिर पूछना क्या है?

रामे० : वे आज दोपहर के समय भेष बदले हुए मेरे पास आये थे! आपके नाम की एक चीठी दे गये हैं और कह गये हैं कि आधी रात के समय हम पुनः यहाँ आवेंगे अगर गदाधरसिंह से मुलाकात हो जाय तो उन्हें उस समय यहाँ आकर मुझसे मिलने के लिए कह देना। (एक चीठी निकाल कर और भूतनाथ के हाथ में देकर) लीजिये इस चीठी को पढ़िये।

भूतनाख ने रामेश्वरचन्द्र के हाथ से चीठी ले ली और बड़े उत्साह से उसे पढ़ना आरम्भ किया। यह लिखा हुआ थाः-

‘‘मेरे प्यारे गदाधरसिंह,

क्या उस बात का पता लगा जिसकी खोज में तुम मुझसे जुदा हुए थे? क्या वास्तव में वही शैतान उसका चोर है जिस पर तुमने शक किया था? मैं आधी रात के समय यहाँ आऊँगा, अगर सम्भव हो तो मुझसे जरूर मुलाकात करो, यदि न मिल सको तो इस चीठी का जवाब लिख कर रामेश्वर के पास रख दो, मैं आकर ले लूँगा!

तुम्हारा वही-भैया०

चीठी पढ़ने के बाद भूतनाथ ने भी उसी जगह से कलम-दवात और कागज उठा कर यह जवाब लिखाः-

‘‘मेरा खयाल ठीक निकला, उसी शैतान ने यह काम किया है।

भूत० : चीठी लिफाफे में बन्द करके भूतनाथ ने उस पर अपनी मोहर लगाई और रामेश्वर के हाथ में देकर कहा, ‘‘यह जवाब उनको दे देना और कह देना कि मैं रात को यहाँ उनसे जरूर मिलूँगा, अगर मेरे आने में देर हो जाय तो मेरा इन्तजार करें।’’

रामे० : (चीठी लेकर) बहुत खूब मैं उन्हें तब तक रोके रहूँगा जब तक आप न आवेंगे। (मुस्कुरा कर) कहिये कुछ खरीदना है?

भूत० :(हँस कर) हाँ तुम्हारा सर खरीदना है! अच्छा यह तो बताओ कि यह जमींदार कौन था जो अभी-अभी यहाँ से गया है?

रामे० : इसमें तो कोई शक नहीं कि कोई ऐयार है मगर बेवकूफ है। ज्यादे हाल अभी मालूम नहीं हुआ है क्योंकि आज वह पहिले ही मर्तबे यहाँ आया है।

भूत० : मुझे उस पर शक होता है कि वह जरूर मेरे बागी शागिर्दों में से है।

रामे० : आपके शक को हम लोग यकीन के दर्जे तक मानते हैं। अगर ऐसा भी हो तो कोई ताज्जुब की बात नहीं, देखिये दूसरी मुलाकात में कुछ-न-कुछ पता लग ही जायगा।

भूत० : अच्छा तो मैं जाता हूँ, ज्यादे देर तक नहीं ठहर सकता।

रामे० : क्या कोई जरूरी काम है? कुछ भंग-बूटी की नहीं ठहरेगी?

भूत० : नहीं, इस समय मुझे भंग का कुछ खयाल नहीं है क्योंकि एक कठिन काम का बाँधनू बाँध चुका हूँ जिसे आज जरूर पूरा करना है। हाँ भैयाराजा से मिलने के समय जब रात को आऊँगा तो जरूर बूटी छानूँगा और स्नान करके तुम्हारा ही सर खाऊँगा भी।

रामे० : (हँसकर) बहुत अच्छा, मैं हाजिर हूँ, बन्दोबस्त कर छोड़ूँगा।

भूत० : (कुछ सोच कर) अच्छा एक काम करो, कुछ सामान दो तो मैं इसी जगह सूरत भी बदलूँ, नहीं तो तरद्दुद करना पड़ेगा।

रामे० : लीजिये हर तरह का सामान तो मौजूद ही है, चलिये फिर तहखाने में।

भूत० : हाँ चलो!

दोनों आदमी उठ खड़े हुए और पास का एक दरवाजा खोल कर दूसरे कमरे में चले गये।

कुछ देर के बाद भूतनाथ एक साधु की सूरत बना हुआ हाथ में एक सुन्दर तानपूरा लिये उस कमरे के बाहर निकला। साथ में रामेश्वरचन्द्र भी मौजूद था जिससे कुछ बातें करने के बाद भूतनाथ दूसरे दरवाजे की राह से मकान के बाहर निकला।

भूतनाथ इस दूकान के अन्दर अकेला आया था सही परन्तु उस बाजार में वह अकेला नहीं आया था बल्कि उसके साथ सूरत बदले हुए उसके दो शागिर्द भी थे जिन्हें वह दूकान के बाहर बल्कि दूकान से कुछ दूर हट कर छोड़ गया था और कह गया था कि इसी जगह घूमते-फिरते कुछ समय बिताओ और मेरे आने का इन्तजार करो। मैं रामेश्वरचन्द्र की दूकान में जाता हूँ, शायद कोई काम बन जाय, अस्तु जब भूतनाथ दूकान से निकल कर बाहर आया तो इशारे से अपने को प्रकट करके उन दोनों को साथ लिया और उस सड़क पर चल पड़ा जो खासबाग की तरफ चली गई थी।

इसी सड़क पर कुछ दूर आगे जाकर नागर का मकान था जो एक छोटे-से बगीचे के अन्दर बना हुआ था या यों कहिए कि उस मकान के चारों तरफ कुछ थोड़ी-सी जमीन छूटी हुई थी जिसमें उसने कुछ फूल-पत्ते और चन्द मेवों के दरख्त लगा रक्खे थे, और एक छोटी-सी चारदीवारी कायम करके सड़क की तरफ एक फाटक बनाया था जहाँ प्रायः उसके दो-एक नौकर रहा करते थे।

नागर के मकान के सामने एक महाजन का मकान था जिसके आगे ऊँचा और पक्का चबूतरा था जिस पर दस-पन्द्रह आदमी बखूबी बैठ सकते थे। इस समय जबकि भूतनाथ वहाँ पहुँचा बिल्कुल सन्नाटा था।

चलता-चलता भूतनाथ वहाँ अटक गया और चबूतरे के पास खड़ा होकर नागर के मकान की तरफ देखने लगा, उस फाटक के बाहर निकलते हुए एक आदमी को भूतनाथ ने देखा और अपने एक शागिर्द से कहा कि मैं इसी जगह ठहरता हूँ तुम इसके पीछे-पीछे जाकर पता लगाओ कि यह आदमी कौन है, मुझे शक होता है कि यह दारोगा साहब का आदमी है।

आज्ञानुसार भूतनाथ का शागिर्द उस आदमी के पीछे-पीछे चला गया और थोड़ी ही देर मैं लौट आकर बोला, ‘‘आपका खयाल बहुत ठीक है, वह दारोगा साहब का खास कृपापात्र (नौकर) टीमल है, आगे तम्बोली की दूकान पर बैठ कर पान बनवा रहा है।’’

भूत० : (प्रसन्न होकर) तो बस इसमें कोई सन्देह नहीं कि दारोगा साहब यहाँ आ गये हैं। सच तो यों हैं कि इस समय ईश्वर ही ने मेरी सहायता की, जिस काम के लिए मैं जा रहा था वह ईश्वर चाहेगा तो इसी जगह निकल जायगा। अगर दारोगा के साथ-साथ जैपाल भी वहाँ आया हो तब तो कहना ही क्या है।

शागिर्द० : जैपाल जरूर आया होगा। ऐसे-ऐसे मौके पर दारोगा उसे अपना सहायक बना कर जरूर साथ रखता है और उसकी ताकत पर भरोसा करता है।

भूत० : तुम्हारा कहना बहुत ठीक है। अच्छा मैं इसी वेष में इस मकान के अन्दर जाने का उद्योग करता हूँ, जब जाऊँगा तुम दोनों को अपने साथ लेता जाऊँगा। वहाँ क्या करना होगा सो मैं अभी से इसी जगह तुम दोनों को समझाए देता हूँ।

इतना कह कर भूतनाथ ने समय के अनुसार जो कुछ मुनासिब था अपने दोनों शागिर्दों को समझा दिया और इसके बाद उसी चबूतरे पर बैठ कर तानपूरा छेड़ता हुआ गाने लगा।

भूतनाथ परले सिरे का गवैया था और इस फन को बहुत अच्छी तरह जानता था परन्तु सिवाय उसके अन्तरंग मित्रों के और कोई विशेष इस बात को जानता न था और न हर एक के सामने वह कभी गाता ही था, यहाँ तक कि दारोगा और नागर को भी इस बात का पूरा ज्ञान न था।

भूतनाथ ने बड़ी विज्ञता के साथ बागेश्वरी की एक तान लगाई जिसकी आवाज नागर के कान तक पहुँची और एक दफे उसका कलेजा हिल गया, नागर वेश्या थी और गाने-बजाने का काम करती थी। यद्यपि ओस्तादों के खयाल से वह इस फन में ओस्ताद नहीं मानी जाती थी परन्तु वास्तव में उसकी समझ अच्छी थी और गाने-बजाने का उसे बहुत शौक था। वह हमेशा इस फन के ओस्तादों को ढूँढ़ा करती थी। भूतनाथ भी इस सबब से कि नागर को संगीत का बहुत शौक है और वह बहुत अच्छा गाती है उसे जी-जान से प्यार करता था, दारोगा का नागर से मुहब्बत करना यद्यपि भूतनाथ को बुरा मालूम होता था मगर नागर भूतनाथ से यही प्रकट करती थी कि मैं मुहब्बत तुम ही से करती हूँ और दारोगा साहब को केवल रकम वसूल करने के लिए लगा रक्खा है, मगर वास्तव में क्या बात थी सो नागर ही जाने, रण्डियों की माया बड़े-बड़े बुद्धिमानें को उल्लू बना डालती है।

निःसन्देह उस समय दारोगा साहब और उनके साथ जैपाल भी नागर ही के यहाँ बैठे हुए थे और भूतनाथ की तान ने उन दोनों का दिल भी अपनी तरफ खैंच लिया था। कुछ देर तक तो वे तीनों सन्नाटे में आकर उस गीत को सुनते रहे इसके बाद नागर ने दारोगा से इजाजत लेकर अपना आदमी यह देखने के लिए भेजा कि गाने वाला कौन है।

जब उसे यह मालूम हुआ कि गाने वाला एक साधु है जो अपने दो शिष्यों के साथ सामने के चबूतरे पर बैठा गा रहा है तब उसने बड़े आग्रह के साथ साधुरूपी भूतनाथ को बुलाया, दो-चार नखरे-तिल्ले तथा हाँ-नहीं के बाद भूतनाथ नागर के पास गया जहाँ दारोगा और जैपाल मस्त बैठे हुए नागर से बातें कर रहे थे।

भूतनाथ अपने दोनों शागिर्दों को बंगले के बाहर छोड़ गया जहाँ नागर के कई नौकर-सिपाही भी थे और खुद जब नागर के सामने गया तब उसे मालूम हुआ कि इस समय ये तीनों आदमी शराब के नशे में मस्त हैं, जरूर हमारे आने के पहिले यहाँ बोतल और प्याले भी मौजूद रहे होंगे।

तीनों आदमियों ने साधुरूपी भूतनाथ को प्रणाम किया। नागर ने बड़ी खातिर से उसे अपने पास बैठाया और उसके गाने की तारीफ करने लगी।

नागर० : (साधु से) कहिये महात्माजी, आपका मकान कहाँ है?

साधु० : भला साधुओं का भी कहीं मकान होता है?

नागर० : क्यों नहीं, आखिर कहीं गुरू का स्थान या मठ वगैरह होता ही है।

साधु० : जो अपना मठ और स्थल रखते हैं वे साधु नहीं हैं। हम उन लोगों में नहीं है जिन्हें अपने पीछे का खयाल रहता है। हम तो जहाँ रह गये वहीं हमारा स्थान है और जिसने हमें भोजन दे दिया वही हमारा गुरू और सर्वस्व है।

नागर० : ठीक है, वास्तव में आप लोगों के लिए ऐसा ही होना चाहिए, अब यह बताइये कि इस समय आपका आना कहाँ से होता है?

साधु० : हमें इस शहर में आये अभी तीन-चार घण्टे से ज्यादे नहीं हुए है, नेपाल से आ रहे हैं, वहाँ बड़े-बड़े गवैयों का जमघट हुआ था, बस गाना सुनने के शौक में वहाँ गये थे।

नागर० : आखिर इस समय डेरा कहाँ किया है?

साधु० : मैं तो पहिले ही कह चुका कि जहाँ बैठ गये। वहीं डेरा है।

नागर० : तो बेहतर होगा कि आप मेरे ही मकान में डेरा डालें, यहाँ अक्सर गाना-बजाना भी हुआ करता है और आप भी बहुत अच्छा गाते हैं

साधु० : खैर जैसा होगा देखा जायगा।

नागर० : मुझे आपकी आवाज बहुत ही भली मालूम हुई इसीलिए आपको तकलीफ दी है, अगर कृपा कर कुछ गाइये तो..।

साधु० : क्या हर्ज है, मैं गाता हूँ सुनिये, मालूम होता है कि आपको भी गाने का शौक है।

इतना कह कर साधु महाशय ने तानपूरा छेड़ा और मालकौस का एक ध्रुपद गाने के बाद उसे जमीन पर रख दिया, इनका गाना सुन कर दारोगा, नागर और जैपाल तीनों ही बहुत प्रसन्न हुए और उनकी यही इच्छा हुई कि बाबाजी और कुछ गावें मगर जब उन्होंने बाबाजी से गाने के लिए कहा तब बाबाजी ने यह जवाब दिया कि ‘अब तो गांजे का एक दम लगा लेंगे तब गावेंगे’।

नागर० : मैं आपके लिए अभी गांजे का बन्दोबस्त करती हूँ।

साधु० : बन्दोबस्त करने की कोई जरूरत नहीं, मेरे पास सब सामान अर्थात् गाँजा, सुर्ती, चिलम वगैरह तैयार है, आप केवल अग्नि मँगा दीजिये और कमरे के सब दरवाजे बन्द करके मेरा गाना सुनिये। दरवाजा बन्द किये बिना आवाज कायम नहीं होती और गूँजती भी नहीं।

नागर० : जैसा आप कहते है वैसा ही होगा।

नागर ने एक बर्तन में कण्डे की आग मँगवा दी और तब अपने हाथ से कमरे के सब दरवाजे बन्द कर दिये। साधु ने अपनी कमर में से अनमोल अद्भुत गाँजा जिसमें बेहोशी पैदा करने वाली एक प्रकार की दवा मिली हुई थी निकाला और चिलम तैयार कर धुएँ का गुब्बारा बाँधने लगे, यहाँ तक कि धुएँ से तमाम कमरा भर गया, यद्यपि यह बात दारोगा साहब को कुछ बुरी मालूम हुई मगर नागर की खातिर से चुप रहे। साधु ने तानपूरा उठा लिया और गाना शुरू किया।

अबकी दफे गाना सुनकर सब-के-सब मदहोश हो गये। उस गाँजे के धुएँ ने भी सबका दिमाग बिगाड़ दिया और धीरे-धीरे नागर, दारोगा और जैपाल तीनों आदमी बेहोश होकर जमीन पर लम्बे हो गये।

उस समय भूतनाथ कमरे के बाहर आया और अपने दोनों शागिर्दों को ढूँढने लगा। थोड़ी दूर जाकर भूतनाथ को देखते ही उसके एक शागिर्द ने कहा, ‘‘हम लोग अपना काम कर चुके हैं, अब यहाँ कोई आदमी ऐसा नहीं है जो होश में हो।’’

भूत० :शाबाश, खूब काम किया! कमरे के अन्दर मैं भी अपना काम कर चुका हूँ। अब तुम दोनों आदमी मेरे पीछे-पीछे चले आओ।

दोनों शागिर्दों को साथ लिये हुए भूतनाथ पुनः कमरे के अन्दर गया। जैपाल के बदन पर से उसके तमाम कपड़े उतार कर उसने जैपाल को अपने शागिर्दों के हवाले किया और कहा, ‘‘बस इसे तुम दोनों आदमी उठा कर लामाघाटी में ले जाओ और कैद कर रक्खो तथा यहाँ जितनी हल्की और कीमती चीजें दिखाई देती हैं सभी उठा कर लेते जाओ।

भूतनाथ की आज्ञानुसार उसके दोनों शागिर्द वहाँ की कीमती चीजें और जैपाल को लेकर चले गये और तब भूतनाथ कमरे का दरवाजा बन्द करके दीवार के साथ लगे हुए एक आइने के सामने बैठ गया। बहुत चालाकी से उसने अपनी सूरत जैपाल की सूरत के समान बनाई और उसके तमाम कपड़े पहिर कर तथा कमरे का एक दरवाजा खोल कर उसी जगह दारोगा और नागर के पास लेट गया।

बची हुई रात और पहर-भर दिन चढ़े तक वे लोग बेहोश पड़े रहे।

भूतनाथ की आँखों में यद्यपि नींद न थी परन्तु वह मौके का इन्तजार करता हुआ चुपचाप उसी जगह पड़ा रहा। इस बीच में भूतनाथ ने देखा कि नागर की लौंडियाँ और नौकर कई दफे कमरे के दरवाजे पर उन लोगों को देखने के लिए आए परन्तु नागर और बाबाजी वगैरह को बेहोश देख चुपचाप लौट गए, उन लोगों को जगाने या होशियार करने की किसी ने हिम्मत नहीं की।

सबके पहिले दारोगा की बेहोशी दूर हुई और वह उठ कर बड़ी घबराहट के साथ चारों तरफ देखने लगा तथा पहर-भर दिन चढ़ा हुआ जान कर बहुत ही परेशान हुआ क्योंकि वह नागर के घर में बहुत चोरी के साथ छिप कर आया करता था, अब दिन के समय यहाँ से जाना उसे बड़ा कठिन मालूम हुआ तथा इस बात की भी चिन्ता हुई कि न-मालूम हमारे घर पर हमारे न रहने के सबब से लोगों को क्या गुमान हुआ होगा और राजा साहब ने भी मुझे याद किया होगा या नहीं, इत्यादि। होश-हवास दुरूस्त करके दारोगा ने नागर और जैपाल को हिला-हिला कर जगाया और जब वे दोनों भी उठ कर बैठे तो इस तरह बातचीत होने लगी-

नागर० : (आश्चर्य से चारों तरफ देख कर) यह हम दोनों को क्या हो गया था? (दारोगा से ) आपने हमको जगाया क्यों नहीं?

दारोगा० : मैं खुद जागता तब तो तुम्हें भी जगाता।

नागर० : आखिर मामला क्या है?

जैपाल० : क्या उस साधु ने हम लोगों को धोखा दिया?

दारोगा० : बेशक यही बात है।

नागर० : (चारों तरफ देख कर) जरूर वह कोई ऐयार था! देखिए मेरी बहुत-सी कीमती चीजें भी यहाँ से गायब हैं! सोने के गुलदस्ते, इत्रदान, पानदान, रिकाबियाँ इत्यादि सभी चीजें भी यहाँ से गायब हैं! उस खूँटी पर मेरी मोती की माला टंगी हुई थी वह भी दिखाई नहीं पड़ती! बेशक वही इन सब चीजों को भी उठा ले गया। कम्बख्त लौंडी, गुलाम और सिपाहियों ने भी हम लोगों की कुछ खबर नहीं ली!

दारोगा० : मालूम होता है कि उस साधु ने उन लोगों पर भी कोई करामात की होगी। जरूर वह कोई ऐयार था मगर हम लोगों को यहाँ छोड़ क्यों गया, यही आश्चर्य है!

जैपाल० : अजी वह ऐयार नहीं बल्कि चोर था, तभी तो यहाँ की कीमती चीजें सब उठा ले गया। ऐयार लोग चोरी करने के लिए किसी के घर में नहीं घुसते, अगर वह ऐयार होता तो जरूर हममें से किसी-न-किसी को ले गया होता।

दारोगा० : तुम्हारा कहना ठीक है, वह जरूर चोर था, ऐयार नहीं।

नागर० : आखिर लौंडी, गुलाम और पहरे के सिपाही लोग क्या झक मार रहे थे? उन्हें बुला कर पूछूँ तो कुछ पता लगे।

इतना कह कर नागर वहाँ से उठी और बाहर जाकर उसने दरियाफ्त किया तो मालूम हुआ कि उस साधु के साथ दो शागिर्द भी थे जिन्हे वह बंगले के बाहर छोड़ गया था। उन्हीं दोनों शागिर्दों ने अपनी कारीगरी से बाहर के लौंडी गुलाम और सिपाहियों को बेहोश कर दिया था इसलिए किसी को भी इस बात की खबर नहीं है कि वह साधु कमरे के अन्दर से क्या ले गया और कब चला गया।

अपने नौकरों की फजीहत करने के बाद नागर पुनः कमरे के अन्दर आई और दारोगा साहब से बाहर का सब हाल सुना कर बोली, ‘‘आपकी हुकूमत इस जमानिया में बहुत ही अच्छी है। ऐसे-ऐसे चोर और बदमाश यहाँ बसते हैं और जब आप ही लोगों के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं तो बेचारे रिआया लोगों की रक्षा तो बस विधाता ही के आधीन है मेरी जितनी चीजें यहाँ से गई सब आप ही को देनी पड़ेंगी!’’

दारोगा० : (शर्मिन्दगी के साथ) बेशक मैं दूँगा और तुम्हें दिखा दूँगा कि ऐसे बदमाशों के साथ मैं कैसा सलूक करता हूँ। (जैपाल की तरफ देख के) अब यहाँ से घर जाना मेरे लिए बड़ा ही मुश्किल है। जितना मैं छिप कर रात के समय आता हूँ उतना ही मेरा परदा खुला चाहता है। अब दिन के समय मैं क्योंकर यहाँ से बाहर निकलूँगा? न-मालूम मेरे घर पर कितने आदमी आकर लौट गये होंगे और लोगों के दिल में क्या-क्या बातें पैदा हो रही होंगी अथवा लोग मेरी खोज में कैसा हैरान हो रहे होंगे। राजा साहब को अगर मेरे गायब हो जाने की खबर लगी होगी तो..।

जैपाल० : बेशक बड़ी मुश्किल का सामना है। मेरी तो यह राय है कि आज दिन-भर आप इसी घर में रह जाइये, मैं जाकर सब तरह की आहट ले आता हूँ और आपके आदमियों को भी शान्ति दे आता हूँ। इसके अतिरिक्त यदि और कोई जरूरी काम हो तो कहिये मैं उसे भी ठीक कर आऊँ।

दारोगा० : तुम्हारा कहना ठीक है, ऐसा ही करने से काम चलेगा।

इतना कह कर दारोगा ने जैपाल को एकान्त में ले जाकर कुछ समझाया और अपनी कमर से तीन-चार तालियों का एक गुच्छा निकाल कर और जैपाल के हाथ में देकर कहा, ‘‘हमारे घर में तुम्हें कोई रोकने वाला है नहीं क्योंकि हमारे सभी आदमी जानते हैं कि दारोगा साहब और जैपाल में कोई भेद नहीं है, अस्तु तुम घर में जाकर एक दफे कैदियों की खबर लेना और उनके लिए भोजन और पानी का बन्दोबस्त अपने हाथ से कर देना। इसके बाद तुम राजा साहब से मेरे कहे मुताबिक कार्रवाई करना और रामेश्वरचन्द्र की भी खबर लेना जिसने ऐयारी की दुकान खोल रखी है। असल में वह कौन है इस बात का पता लगाना बहुत जरूरी है।

मैं अपने यहाँ के दोनों ऐयार बिहारीसिंह और हरनामसिंह को भी इस काम पर मुकर्रर कर आया था, शायद उन्होंने कुछ पता लगाया हो, शाम को जब तुम यहाँ आओगे और तुम्हारी जुबानी सब हालचाल मुझे मालूम हो जायेगा तब मैं यहाँ से घर चलूँगा।’’

जैपाल, जो असल में भूतनाथ था, दारोगा से विदा होकर नागर के मकान से बाहर निकला और पहिले रामेश्वरचन्द्र की दुकान की तरफ चला, क्योंकि वह रामेश्वचन्द्र से वादा कर आया था कि रात को जब भैयाराजा यहाँ आवे तो उन्हें रोकना मैं उनसे मिलने के लिए जरूर आऊँगा, अस्तु वह इस बात से बेचैन था कि वादे के मुताबिक भैयाराजा से मिलने के लिए रामेश्वरचन्द्र की दुकान में न जा सका।

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