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भूतनाथ - खण्ड 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8360
आईएसबीएन :978-1-61301-018-1

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भूतनाथ - खण्ड1 पुस्तक का ई-संस्करण

सोलहवाँ बयान

धीरे-धीरे बिल्कुल कमन्द खिंच कर भूतनाथ के हाथ में आ गया और तब वह बड़ी ही बेचैनी के साथ कुएँ के अन्दर झाँक कर देखने लगा मगर अंधकार के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं दिया।

रामदास भूतनाथ का बहुत ही प्यारा शागिर्द था और साथ ही इसके भूतनाथ को उस पर विश्वास भी परले सिरे का था इस मौके पर हरदेई की सूरत में जो कुछ काम उसने किया था उससे भूतनाथ बहुत प्रसन्न था और समझता था कि मेरा यह होनहार शागिर्द निःसन्देह किसी दिन मेरा ही स्वरूप हो जायगा! केवल इतना ही नहीं, जिस तरह भूतनाथ उसे लड़के के समान मानता था उसी तरह रामदास भी भूतनाथ को पिता-तुल्य मानता था, अस्तु ऐसे रामदास का इस तरह कुएँ के अन्दर जाकर बेमुरौवत हो जाना कोई मामूली बात न थी, इससे भूतनाथ को बड़ा ही सदमा हुआ और उसने ऐसा समझा कि मानों पला-पलाया और दुनिया में नाम पैदा करने वाला बराबर का लड़का जिसे निधिरूप समझता था हाथ से निकला जा रहा हैं।

भूतनाथ इस सदमे को बर्दाशत नहीं कर सकता था और उससे यह नहीं हो सकता था कि ऐसी अवस्था में छोड़ कर वहाँ से चला जाय।

कुछ देर तक सोचने और विचारने के बाद भूतनाथ ने कमन्द का एक सिरा पत्थर के साथ अड़ाया और तब खुद भी उसी सहारे नीचे उतर गया।

भूतनाथ को विश्वास था कि कुएँ के नीचे या तो पानी होगा या बिल्कुल सूखे में कला बिमला और इन्दुमति की लाश पावेगा और वहीं अपने प्यारे शागिर्द रामदास को भी देखेगा मगर ये सब कुछ भी बातें न थीं। न तो वह कुआँ सूखा था और न उसमें पानी ही दिखाई दिया इसी तरह कला बिमला इन्दुमति और रामदास का भी वहाँ नामोनिशान न था।

कमर बराबर मुलायम और गुदगुदी घास कुएँ की तह में जमी हुई थी जिस पर खड़े होकर भूतनाथ ने सोचा कि कोई आदमी ऊपर से इस घास पर गिर कर चुटीला नहीं हो सकता, अतएव निश्चय है कि कला बिमला और इन्दुमति मरी न होगी मगर आश्चर्य है कि यहाँ उनमें से एक भी नजर नहीं आती और न रामदास ही का कुछ पता है।

उस कुएँ की तह में बिल्कुल ही अंधकार था इसलिए अच्छी तरह देखने-ढूँढने और जाँच करने के लिए भूतनाथ ने अपने ऐयारी के बटुए में से मोमबत्ती निकाल कर रोशनी की और बड़े गौर से तरफ देखने लगा।

अन्दर से वह कुआँ बहुत चौड़ा था और उसकी दीवारें संगीन थीं। जब कोई आदमी वहाँ नजर न आया तब भूतनाथ ने उस घास के अंदर टटोलना और ढूँढना शुरू किया मगर इससे भी कोई काम न चला।

हाँ, दो बातें जरूर ताज्जुब की वहाँ दिखाई पड़ीं एक तो उस कुएँ की दीवार में से (चारों तरफ) थोड़ा-थोड़ा पानी टपक कर तह में आ रहा था जिससे सिर्फ वहाँ की घास जो एक अजीब किस्म की थी बराबर तह और ताजा बनी रहती थी, दूसरे छोटे-छोटे दो दरवाजे भी दीवार में दिखाई दिये जो एक-दूसरे के मुकाबले में थे भूतनाथ बड़े ही आश्चर्य से उन दोनों दरवाजों को देख रहा था क्योंकि जब कुएँ में इधर-उधर घूमता तो कभी कोई दरवाजा (उन दोनो में से) बंद हो जाता और कोई खुल जाता मगर जब वह कुछ देर तक एक ही जगह पर स्थिर भाव से खड़ा रह जाता तब वे दरवाजे भी ज्यों-के-त्यों एक ही ढंग पर कायम रह जाते अर्थात जो खुल जाता वह खुला ही रह जाता और जो बन्द होता वह बन्द ही रह जाता अस्तु भूतनाथ ने समझा कि इन दरवाजों के खुलने और बन्द होने के लिए वहाँ की जमीन ही में कदाचित कोई कमानी लगी हुई है। वह बहुत देर तक इधर-उधर घूम कर इन दरवाजों के खुलने और बन्द होने का तमाशा देखता रहा।

इसी बीच में एकाएक गाने की सुरीली आवाज भूतनाथ के कानों में पड़ी जो किसी औरत की मालूम पड़ रही थी और उन्हीं दोनों में से एक दरवाजे के अन्दर से आ रही थी तथा थोड़ी देर बाद ही पखावज तथा कई पाजेबों के बजने की आवाज आई जो सम और ताल से खाली न थी। कभी-कभी गाने की आवाज एक-दम बंद हो जाती और केवल पाजेब की आवाज सुनाई देती जिससे भास होता कि वे सब औरतें (या जो कोई हों) पखावज की गत के साथ मिल कर नाच रही हैं।

अब भूतनाथ से ज्यादे देर तक ठहरा न गया और वह हाथ में मोमबत्ती लिए हुए उस दरवाजे के अन्दर घुस गया जिसके अन्दर से गाने तथा घुँघरू के बजने की आवाज आ रही थीं।

दरवाजे के अन्दर पैर रखते ही भूतनाथ को मालूम हो गया कि यहाँ तो खासी लम्बी-चौड़ी इमारत बनी हुई है और ताज्जुब नहीं कि कुछ और आगे बढ़ने से बड़े-बड़े दालान और कमरे भी दिखाई पड़ें, वास्तव में बात भी ऐसी ही थी।

कुछ दूर आगे बढ़ते ही भूतनाथ ने उजाला पाया और देखा कि एक सुन्दर दालान में चार या पाँच औरतें हाथ में मशाल लिये खड़ी हैं और कई औरतें गा-बजा तथा कई नाच रही हैं। यद्यपि भूतनाथ के दिल में आगे बढ़ कर देखने और उन लोगों को पहिचानने का उत्साह भरा हुआ था मगर साथ ही इसके वह डरता भी था कि आगे बढ़ने से कहीं मुझ पर कोई आफत न आवे।

भूतनाथ ने मोमबत्ती बुझा कर बटुए में रख ली और हाथ में खंजर लेकर दबे कदम धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। ओफ, यह क्या भूतनाथ के लिए कोई कम आश्चर्य की बात है कि उन औरतों में भूतनाथ ने अपने प्यारे शागिर्द रामदास को भी नाचते हुए देखा और मालूम किया कि वह अपनी धुन में ऐसा मस्त हो रहा है कि उसे किसी बात की मानो परवाह ही नहीं है। सबसे ज्यादे आश्चर्य की बात तो यह थी कि वह (रामदास) भूतनाथ को देखकर बहुत रंज हुआ और कड़े शब्दों की बौछार करते हुए उसने भूतनाथ को निकल जाने के लिए कहा।

।। दूसरा भाग समाप्त ।।


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