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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640
आईएसबीएन :9781613010617

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘सच? कितनी लागत का मुकद्दमा था?’’

‘‘चार करोड़ रुपया का।’’

‘‘और वे जीत गये हैं क्या?’’

‘‘तभी तो मुझको फीस मिली है और यह दावत दे रहा हूँ।’’

सूसन के मन में शकुन्तला पर चोरी के लाँछन की बात स्मरण हो आई। इससे वह वहाँ से जाने के लिए बोली, ‘‘अच्छा, ‘‘बाई-बाई।’’

‘‘तो आप आ रही हैं न?’’

‘‘कह नहीं सकती। घर जाकर राय करूँगी?’’

उसी सायंकाल दावत थी। जब सुन्दरलाल सायंकाल घर पर आया तो सूसन ने पूछा, ‘‘आज सोमनाथ वकील के यहाँ क्या है?’’

सुन्दरलाल विस्मय में सूसन का मुख देखने लगा। सूसन ने कहा, ‘‘वह आज मुझे मार्केट में मिला तो कहने लगा कि मैं अवश्य पहुँचूँ।’’

‘‘बड़ा दुष्ट है। उसने एक पाण्डेजी से मिलकर पिताजी को सट्टे में सोना खरीदने की प्रेरणा दी। वास्तव में वह सेठ करोडीमल से मिलकर पिताजी से यह काम कराता रहा है। जितना सोना पिताजी ने बेचा, उसका अधिक भाग करोड़ीमल ने खरीदा था। अतः जब दिवाला निकला तो पिताजी मुख्य रूप में करोड़ीमल के देनदार निकले और अब वह हमारे कारखानों का मालिक हो गया है।’’

‘‘कितने रुपये का लेनदार था वह?’’

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