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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598
आईएसबीएन :9781613011331

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


रात-भर की प्रतीक्षा के उपरान्त भी जब कृष्णकान्त नहीं आया तो प्रातः उठकर वह फर्नीचर वाले के पास गई और उससे बिल के भुगतान के विषय में पूछा। फर्नीचर वाले ने बताया कि उसको अभी तक कोई रुपया प्राप्त नहीं हुआ। उसका डेढ़ सौ रुपये का बिल है।

अब तो नलिनी को विश्वास हो गया कि उसका पति रुपया लेकर भाग गया है। वह जानना चाहती थी कि वह कितना रुपया ले गया है। यह जानने के लिए बैंक में गई। वहाँ जाकर पता चला की दो सौ सत्तर रुपए बैंक में छोड़कर शेष सब रुपया कल चैक द्वारा निकाल लिया गया है।

वह समझ गई कि उसका मूर्ख पति सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर सारे अण्डे एक साथ निकालने का यत्न करके भाग गया है। पिछले चार मास की सफलता का स्मरण कर एक बार तो उसकी आँखों के सम्मुख अन्धकार छा गया। फिर भी वह हताश नहीं हुई। बैंक से लौट अपनी चारपाई पर बैठ वह पुनः अपने जीवन पर विचार करना चाहती थी। किन्तु घर पहुँच वहाँ पुलिस को आया देख वह स्तब्ध-सी रह गई।

स्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा यह कहकर अपने घर से आई थी कि वह अपनी अध्यापिका को अपने प्रश्न-पत्र दिखाने के लिए जा रही है। वह कल एक बजे के लगभग घर से आई थी और फिर लौटकर नहीं गई। किसी ने उसको स्कूल के अध्यापक के साथ स्कूल से नीचे उतरते देखा था। लड़की के माता-पिता को सन्देह हुआ और उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी। इस प्रकार पुलिस का दस्ता स्कूल में आ धमका।

स्कूल को ताला लगा देखकर वे नीचे के दुकानदारों से पूछ-ताछ करने लगे तो पता चला कि मास्टर तो रात को खाना खाने के लिए आया ही नहीं और अध्यापिका को प्रातः रिक्शा में बैठ कहीं जाते देखा था।

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