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देवकांता संतति भाग 3

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2054
आईएसबीएन :0000000

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

घर का भेदी लंका ढाए - इस पत्र के मिलते ही चन्द्रदत्त के दिमाग में यह कहावत घूम गई। उसने हरनामसिंह को तुरन्त स्वीकारात्मक जवाब लिखा - इस तरह हरनामसिंह की बताई योजनानुसार इस बार बिना घोषित किए - पूरी सेना के साथ रात के अन्धेरे में भरतपुर के चारों ओर से हमला किया गया। सुरेन्द्रसिंह की सेनाएं किसी हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं थीं, अत: पराजित हो गईं। जल्दी ही वह स्थिति आ गई कि राजधानी के अतिरिक्त चन्द्रदत्त ने सारा भरतपुर जीत लिया। उसके पहुचते-पहुंचते राजधानी का फाटक बन्द कर दिया गया था। इस तरह चन्द्रदत्त की सेनाओं ने राजधानी के चारों ओर पड़ाव डाल दिया। राजधानी के अन्दर अब इतनी सेनाएं भी नहीं रह गई थीं, जो चन्द्रदत्त का मुकाबला कर सकतीं। इस बार चन्द्रदत्त को अपनी पराजय का कोई कारण नजर नहीं आ रहा था। एक तरह से वह विजयी हो चुका था। महल के अन्दर से हरनामसिंह के पत्र उसे बराबर मिल रहे थे, जिनमें वह लिखा करता था - इस बार सुरेन्द्र भैया में तुमसे मुकाबला करने की हिम्मत टूट चुकी है। बल्कि एक तरह से यूं कहना चाहिए कि वे हार चुके हैं। मेरे पास कोई ऐसा साधन नहीं है, जिससे मैं तुम्हें राजधानी के अन्दर कर सकूं। कई बार सोचा कि रात के अन्धेरे में किसी तरह महल का फाटक खोल दूं, किन्तु सफल नहीं हो सका, क्योंकि अन्दर राजधानी की दीवारों, महल के दरवाजों और ऊपर बारादरियों में कड़ा पहरा है। राजधानी के फाटक तक तो सिपाही किसी को जाने नहीं देते, किन्तु तुम घबराना बिल्कुल मत। सुरेन्द्र भैया अब लगभग टूट चुके हैं। उनके अनुसार राजधानी के अन्दर केवल चालीस दिन की खाने की सामग्री है। जब राजधानी के लोगों के लिए खाने को कुछ नहीं रहेगा तो भैया को विवश होकर फाटक खोलना ही पड़ेगा।

इसी प्रकार प्रति रात चन्द्रदत्त और हरनामसिंह में यह पत्र-व्यवहार होता था।

अब ऐसी कोई सूरत नहीं थी, जिससे चन्द्रदत्त अपनी पराजय की कल्पना करते। आज सेना के पड़ाव को राजधानी के बाहर पड़े हुए चालीसवीं रात थी और इसी रात को जैसे पासा उलट गया। उनके खास ऐयार नलकू ने उन्हें आज की रात ही दारोगा जोरावरसिंह और सुरेन्द्रसिंह की मिलीभगत के विषय में बताया था। हर रात को हरनामसिंह का पत्र नलकूराम ही लाया करता था, किन्तु आज जो पत्र वह लाया, उसमें हरनामसिंह ने साफ-साफ लिखा था कि दारोगा जोरावरसिंह और राजा सुरेन्द्रसिंह के बीच क्या मिलीभगत चल रही है। इस मिलीभगत की पुष्टि भी वे कर चुके थे। यह सब किस्सा हमारे पाठक मुख्तसर ढंग से दूसरे भाग के अन्तिम बयान में पढ़ चुके हैं। अगर याद न हो तो एक बार सरसरी नजर देख लें।

नलकूराम उन्हें इस मुसीबत से बचने का एक उपाय बताकर डेरे से बाहर जा चुका है।

इस समय तीनों बाप-बेटे मुंह लटकाए बैठे हैं। उन्हें तो स्वप्न में भी आशा नहीं थी कि उन्हीं का दारोगा जोरावरसिंह कान्ता के लालच में सुरेन्द्रसिंह से मिल जाएगा और वे जीती हुई बाजी, इस बुरी तरह से हार जाएंगे। चन्द्रदत्त अब भी मन-ही-मन घबरा रहे थे। वे अपने दोनों लड़कों की ओर देखकर बोलते है-''मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि जोरावरसिंह इतना नमकहराम निकल जाएगा - एक बार इस हरामजादे को राजगढ़ ले जाऊं, तब इसे इसकी करनी का मजा चखाऊंगा। अगर ये नमकहरामी नहीं करता तो इस बार कान्ता और भरतपुर पर हमारा ही कब्जा होता।''

फिर भी हरनामसिंह की ही भलाई समझो, पिताजी'' बालीदत्त बोला- ''जो उसने हमें जोरावरसिंह और सुरेन्द्रसिंह की समय पर खबर दे दी। वर्ना हमें पता नहीं लगता और नमकहराम जोरावरसिंह हमें मरवा देता।''

''अब भी बचने की कम ही आशा है।'' शंकरदत्त ने कहा- ''क्या जरूरी है कि नलकूराम की तरकीब सफल ही हो जाए?''

''तुम ठीक कहते हो बेटे।'' चन्द्रदत्त बोले- ''अगर नलकू की तरकीब सफल हो गई तो हम तीनों बच जाएंगे, लेकिन अगर जोरावरसिंह नलकू की चाल में नहीं फंसा तो हमारी जान अब भी खतरे में है। अब तो ये समझो कि एक तरह से हमारा जीवन नलकू के ही हाथ में है। अगर हमें नलकू ने इस मुसीबत से बचा लिया तो नलकू को अपनी रियासत का बड़ा ऐयार घोषित कर देंगे।''

''और जोरावरसिंह को रियासत का सबसे बड़ा गद्दार।'' शंकरदत ने कहा।

 

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