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देवकांता संतति भाग 3

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2054
आईएसबीएन :0000000

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

''तुम तो हमेशा इसी तरह की ऊलजलूल बातें करते रहते हो अग्निदत्त - भला हम भी कुछ ऐयारी जानते हैं?'' गरदन को झटका लेकर वह शिकारी बोला।

'क्यों? क्या हमने तुम्हारी ऐयारी देखी नहीं है...उस दिन?''

'बस.. बस.. रहने 'दो अग्निदत्त!'' शिकारी उसे बीच में ही टोककर बोला- ''तुम तो हमेशा उसी दिन की बात को लेकर बैठ जाते हो...। वह सब तो अचानक ही हमसे हो गया था।

''छोड़ो ... उस चीते की तरफ चलते हैं - साले को भूनकर खाएंगे।''

अग्निदत्त न जाने क्या सोचकर चुप रह गया और उसके साथ चलने लगा। रास्ते में उसने पूछा- ''आज मुझे एक बात का जवाब दोगे दोस्त?''

'बोलो!'' शिकारी बोला- ''तुम क्या पूछना चाहते हो?'' - 'मैं तुमसे तुम्हारे उस्ताद का नाम पूछना चाहता हूं।'' अग्निदत्त बोला- ''मैं जानना चाहता हूं कि तुम्हारे गुरु का क्या नाम है जिससे ऐयारी सीखी। सोचता हूं कि अगर मैं भी उसी गुरु की शरण में चला जाऊं तो कदाचित् मैं भी तुम जैसा ऐयार बन सकूं।''

'तुम्हें गलतफहमी है, अग्निदत्त।'' शिकारी बोला- ''हमारा कोई उस्ताद नहीं है।''

अभी अग्निदत्त पूछना ही चाहता था कि वे उसी स्थान पर पहुंच गए - जहां उन्होंने चीता मारा था। किन्तु आश्चर्य की बात ये थी कि इस समय वहां चीता नहीं था- ''अरे!'' अग्निदत्त एकदम चौंककर बोला- ''चीता कहां गया.. वह तो मर गया था?''

'कहीं हम जगह तो नहीं भूल गए हैं?'' शिकारी चारों ओर देखता हुआ बोला।

'नहीं, वो? देखो।'' अग्रिदत्त एक तरफ संकेत करके बोला- ''खून के निशान - चीता घायल होकर वहीं गिरा था। वो देखो - खून की बूंदें जंगल में उस तरफ चली गई हैं - कदाचित् वह चीता मरा नहीं था - घायल था। हमें यहां से जाता देख वह भी भाग गया।

'यह बात कुछ जमती नहीं, अग्निदत्त!'' शिकारी कुछ सोचता हुआ बोला- ''अगर वह चीता मरा नहीं था, घायल था, तो कभी भी वह इस तरह उठकर भागता नहीं बल्कि हम पर झपटता। तुमने सुना तो होगा कि घायल चीता कभी अपने दुश्मन को नहीं छोड़ता। या तो मरता है या अपने दुश्मन को मार देता है। उसका इस तरह चुपचाप उठकर चले जाना भी तो तर्क-संगत नहीं है। या तो वह कहीं छुपा है या...।'' कहने के बाद वह अपने भाले पर लगे खून को देखने लगा।

''तुम क्या कहना चाहते हो?'' अग्निदत्त उसकी ओर देखता हुआ बोला।

'अब मुझे भी शक होने लगा है अग्रिदत्त कि कहीं वास्तव में हमसे किसी ने ऐयारी तो नहीं की है? ठहरो - मैं अभी पता लगाता हूं..।'' कहने के साथ ही उस शिकारी ने भाले की नोक पर लगे हुए खून को ध्यान से देखा - और फिर नाक के करीब लाकर उसे सूंघा तथा बोला- ''निश्चय ही यह किसी की ऐयारी है!''

''क्या मतलब?'' अग्निदत्त ने बुरी तरह चौंककर प्रश्न किया।

''मेरे भाले पर लगा हुआ ये खून किसी चीते का नहीं, बल्कि आदमी का है!'' उस शिकारी ने जैसे शाब्दिक धमाका किया।

'क्या तुम खून सूंघकर यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकते हो?'' अग्निदत्त गहनतम आश्चर्य के साथ बोला- ''क्या वास्तव में ही यह खून चीते का नहीं, आदमी का है? लेकिन अगर आदमी का है - तो तुमने तो भाला चीते को ही मारा था। क्या आदमी भी भला कभी चीता बन सकता है?'' - 'हां.. ऐयार अगर होशियार हो तो चीता भी बन सकता है।'' शिकारी ने कुछ विचारते हुए कहा- ''लेकिन ऐसी ऐयारी के कमाल कोई छोटा-मोटा ऐयार नहीं दिखा सकता - बल्कि - कोई जबरदस्त ऐयार ही होना चाहिए।''

''क्यों.. अभी कुछ देर पहले तो तुम कहते थे कि तुम ऐयारी जानते ही नहीं!'' अग्निदत्त व्यंग्यात्मक स्वर में बोला।

यह समय मजाक का नहीं है अग्निदत्त। शिकारी ने गम्भीर स्वर में कहा- ''हमारे ख्याल से इतनी अच्छी ऐयारी हमारे गुरु भूतेश्वरनाथ के अलावा कोई दूसरा नहीं जानता है। साथ ही ये बात भी है कि भूतेश्वरनाथ अपने खास शागिर्द के अलावा यह ऐयारी और किसी को सिखाते भी नहीं हैं।''

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